20+ surdas ke pad – सूरदास के पद हिंदी अर्थ सहित

surdas ke pad

दोस्तों आज हम आपके 20+ surdas ke padसूरदास के पद हिंदी अर्थ सहित नामक पोस्ट लेकर आये हैं। जिसमें सूरदास के 20 सर्वश्रेष्ठ पदों का अर्थ सहित संकलन किया गया है। जोकि रसिकजनों एवं class 10 के विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी हैं।

surdas ke pad (1) ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी

ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।
सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥
उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी॥
सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥
मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फिरत भिखारी॥
सूर श्याम मिलने की आसा छिन-छिन बीतत भारी॥

अर्थ– भगवान श्रीकृष्ण के कहने उद्धव गोपियों को निराकार ब्रम्ह का ज्ञान देने मथुरा आते हैं। वहां उल्टे गोपियाँ उन्हें भक्ति एवं प्रेम की सीख दे देती हैं। प्रस्तुत पड़ में एक गोपी कर्म सिद्धांत का वर्णन करते हुए कहती है कि–

है उद्धव, ये कर्म और भाग्य का खेल बड़ा न्यारा है। समुद्र नदियों के मीठे जल से भरता है। फिर भी उसका जल खारा रहता है। गुणहीन बगुले को विधि ने उज्ज्वल, श्वेत पंख दिए हैं। जबकि गुणवान कोयल को काली बनाया है। हिरन को सुंदर आंखें दी जो उजड़े हुए वन में घूमता है अर्थात जिनका उसके लिए कोई विशेष उपयोग नहीं। मूर्ख लोगो को राजा बना दिया और बुद्धिमान लोग निर्धन रह गए। सूरदासजी कहते हैं कि श्याम से मिलन की आशा में एक-एक क्षण बहुत मुश्किल से बीत रहा है।

सूरदास के पद (2) निसिदिन बरसत नैन हमारे

surdas ke pad
सूरदास के पद

निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे।।
अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भये कारे।
कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ, उर बिच बहत पनारे॥
आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे।
‘सूरदास’ अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे॥

अर्थ- गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि जब से श्रीकृष्ण जी ब्रज से गए हैं। तब से हमारी आंखों से लगातार आंसू बह रहे हैं। हमारे लिए तब से केवल एक ही ऋतु है बरसात। हमारी आंखों में आंसुओं के कारण काजल स्थिर नहीं रहता। जिसे पोंछते रहने से हमारे गाल और आंखें काली हो गयी हैं। आंसुओं धार हमारे हृदय क्षेत्र से होकर लगातार बहती रहती है। जिससे हमारी चोली का वस्त्र सदैव गीला ही रहता है। हमारा पूरा शरीर ही आंसुओं का जल बन गया है। हे कन्हैया ! इन आंसुओं में ब्रज डूबा जा रहा है, आकर इसे बचा क्यों नहीं लेते।

पद (3) जसुमति दौरि लिये हरि कनियां

जसुमति दौरि लिये हरि कनियां।
“आजु गयौ मेरौ गाय चरावन, हौं बलि जाउं निछनियां॥
मो कारन कचू आन्यौ नाहीं बन फल तोरि नन्हैया।
तुमहिं मिलैं मैं अति सुख पायौ,मेरे कुंवर कन्हैया॥
कछुक खाहु जो भावै मोहन.’ दैरी माखन रोटी।
सूरदास, प्रभु जीवहु जुग-जुग हरि-हलधर की जोटी॥

अर्थ- सूरदासजी वर्णन कर रहे हैं कि जब पहली बार श्रीकृष्ण जी गाय चराने गए और जब वापस लौटे। तो माता यशोदा उनसे कहा रही हैं कि आज पहली बार कान्हा गाय चराने गए हो। इसलिए मैं तुम पर बलिहारी हूँ।

वहां से तुम मेरे लिए कुछ वन के फल फूल नहीं लाये। हे कन्हैया ! इतनी देर बाद तुमसे मिलकर मैं अत्यंत सुख महसूस कर रही हूँ। तुम्हें जो खाने का मन हो मुझे बताओ। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैया मुझे माखन रोटी खाने को दो। सूरदास जी कहते हैं कि यह कृष्ण-बलराम की जोड़ी जुग-जुग जिये।

surdas ke pad in hindi (4) संदेसो दैवकी सों कहियौ

संदेसो दैवकी सों कहियौ।
`हौं तौ धाय तिहारे सुत की, मया करति नित रहियौ॥
जदपि टेव जानति तुम उनकी, तऊ मोहिं कहि आवे।
प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्हहिं माखन-रोटी भावै॥
तेल उबटनों अरु तातो जल देखत हीं भजि जाते।
जोइ-जोइ मांगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करिकैं न्हाते॥
सूर, पथिक सुनि, मोहिं रैनि-दिन बढ्यौ रहत उर सोच।
मेरो अलक लडैतो मोहन ह्वै है करत संकोच॥

अर्थ- कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद माँ यशोदा देवकी के लिए संदेश भेजती हैं कि मैं तो तुम्हारे पुत्र की दाई हूँ। सदैव मुझपर अपनी दयादृष्टि बनाये रखियेगा। यद्यपि आप उनकी सब बात जानती हो, फिर भी मैं अपनी तरफ से बात रही हूँ।

तुम्हारे कान्हा को सुबह उठते ही माखन रोटी खाने पसंद है। तेल, उबटन और शीतल जल देखते ही वह भाग जाते हैं। बहुत लालच और मनुहार के बाद ही वह नहाते हैं। उस घर को पराया समझकर मेरा प्रिय मोहन बहुत संकोच करता होगा। इसी बात का मुझे रात दिन दुख रहता है।

पद (5) उधो, मन न भए दस बीस

उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥
सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥

अर्थ- जब उद्धव गोपियों को ब्रम्हज्ञान देते हैं तब गोपियाँ कहती हैं कि हे हमारे पास दस बीस मन नहीं हैं। एक ही था वह भी कृष्ण के साथ चल गया। अब ब्रम्ह की आराधना कैसे करें? हम उसी प्रकार शिथिल हो गयी हैं जैसे बिना शरीर के सिर निष्क्रिय हो जाता है।

अब तो ये सांसें इसी आशा में अटकी हैं कि वह श्यामसुंदर करोड़ों वर्षों तक जीवित रहें और हमेह फिर दर्शन दें। तुम तो कृष्ण के मित्र हो और सभी प्रकार के योग को जानने वाले हो।
सूरदास जी कहते हैं कि इन रसिक गोपियों की मनोकामना श्रीहरि अवश्य पूरी करें।

पद (6) निरगुन कौन देश कौ बासी

निरगुन कौन देश कौ बासी।
मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी।
कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥
पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥

अर्थ- गोपियाँ उद्धव से पूछती हैं कि जिस निर्गुण ब्रम्ह की बात तुम कर रहे हो। वह किस देश का रहने वाला है ? तुम्हें सौगंध है हम सच में पूछ रही हैं। यह कोई मजाक नहीं है। इस निर्गुण के माता पिता कौन हैं ? यह किस स्त्री का दास है? इसका रंग कैसा है ? वेश भूषा कैसी है? इसे क्या पसंद है ? इसे व्यंग्य मत समझो, यह सच्चाई है। गोपियों की यह बात सुनकर उद्धव ठगे से रह गए, उनकी सारी बुद्धि नष्ट हो गयी।

सूरदास के पद (7) कहां लौं कहिए ब्रज की बात

कहां लौं कहिए ब्रज की बात।
सुनहु स्याम, तुम बिनु उन लोगनि जैसें दिवस बिहात॥
गोपी गाइ ग्वाल गोसुत वै मलिन बदन कृसगात।
परमदीन जनु सिसिर हिमी हत अंबुज गन बिनु पात॥
जो कहुं आवत देखि दूरि तें पूंछत सब कुसलात।
चलन न देत प्रेम आतुर उर, कर चरननि लपटात॥
पिक चातक बन बसन न पावहिं, बायस बलिहिं न खात।
सूर, स्याम संदेसनि के डर पथिक न उहिं मग जात॥

अर्थ- ब्रज से वापस लौटकर उद्धव श्रीकृष्ण से ब्रज की हालत का वर्णन करते हुए कहते हैं कि ब्रज की बात कहां तक कहें। हे कृष्ण ! तुम्हारे बिना उनके दिन कितने कष्टपूर्ण बीत रहे हैं। गोपियाँ, गौएँ, ग्वाल और बछड़े सब मलिन और कमजोर शरीर वाले हो गए हैं।

वे सब परम् दीन हैं जिस प्रकार शिशिर ऋतु के हिमपात से कमल बिना पत्तियों के रह जाते हैं। अगर किसी यात्री को दूर से आता हुआ देखते हैं तो उससे तुम्हारी कुशल क्षेम पूछने लगते हैं। प्रेम और उत्सुकतावश उसे जाने नहीं देते। उसके पैरों से लिपट जाते हैं। कोयल, चातक आदि पक्षी वन में नहीं रहते और कौवे बाली का अन्न नहीं खाते हैं। मथुरा सन्देश भेजने के डर से पथिकों ने उस रास्ते से जाना छोड़ दिया है।

सूर के पद (8) मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी

मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥

अर्थ- कृष्ण कन्हैया मां यशोदा से कहते हैं कि मैया मेरी चोटी कब बढ़ेगी ? तुम कहती हो कि दूध पीने से चोटी बढ़ती है। मैं कितने दिनों से दूध पी रहा हूँ। लेकिन यह आज भी छोटी ही है। आप तो कहती थीं कि मेरी चोटी भी बलदाऊ की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी।

कंघी करते, गुहते और नहाते समय नागिन की तरह जमीन पर लोटने लगेगी। इतनी बड़ी हो जाएगी। इसलिए मुझे बार बार जबरदस्ती कच्चा दूध पिलाती हो। माखन रोटी खाने नहीं देती हो। सूरदास कहते हैं कि यह कृष्ण बलराम की जोड़ी तीनों लोकों का मन मोह लेने वाली है।

surdas ke pad(9) मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥
कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात।
पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात॥
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै॥
सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत।
सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥

अर्थ- श्रीकृष्ण जी बलराम की शिकायत यशोदा जी से करते हुए कहते हैं कि हे मैया ! मुझे बलराम बहुत चिढ़ाते हैं। मुझसे कहते हैं कि तुम्हें यशोदा मैया ने जन्म नहीं दिया बल्कि मोल खरीदा है। अब क्या कहूँ, इसी क्रोध के कारण मैं खेलने नहीं जाता हूँ।

बार बार मुझसे कहते हैं कि तुम्हारे माता पिता कौन हैं ? यह भी कहते हैं कि नंद और यशोदा दोनों गोरे हैं तो तुम सांवले कैसे हो ? उनकी इस बात पर सभी ग्वाल-बाल चुटकी बजा-बजाकर हंसते, मुस्कुराते हुए नाचते हैं।

कान्हा कहते हैं कि तुम केवल मुझे ही मारना जानती हो। कभी दाऊ से गुस्सानहीँ होती हो। यशोदा जी मोहन के मुख से ये क्रोधभरी बातें सुनकर उन्हें प्रेम से मना रहीं हैं। वे कहती हैं कि बलराम तो जन्म से ही धूर्त हैं। मुझे गोधन की सौगंध है मैं ही तुम्हारी माता हूँ और तुम मेरे पुत्र हो।

पद (10) मैया! मैं नहिं माखन खायो

मैया! मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥
देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो।
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥
मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो।
डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥
बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्रताप दिखायो।
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो॥

अर्थ- एक बार माता यशोदा कृष्ण जी को मुख पर माखन लगाए हुए पकड़ लेती हैं एयर कहती हैं कि तुमने चोरी से माखन खाया है। तब कृष्ण जी उत्तर देते हैं कि मैया, मैंने माखन नहीं खाया है। मेरे मित्रों ने जबरन माखन मेरे मुंह पर लगा दिया है।

तुमने खुद छींके पर मटका इतना ऊंचे लटकाया हुआ है कि अपने छोटे छोटे हाथों से मैं उस तक नहीं पहुंच सकता। उसी समय उन्होंने अपने मुंह से दही पोंछ दिया और युक्तिपूर्वक दोना पीछे छुपा दिया।

उनके बाल विनोद से मोहित होकर यशोदाजी ने उन्हें कंठ से लगा लिया। भक्ति का प्रताप देखिए कि जो सुख यशोदाजी को मिल रहा है। उसे ब्रम्हा और शिव भी नहीं पा सकते।

सूरदास के हिन्दी पद (11) जसोदा तेरो भलो हियो है माई

जसोदा तेरो भलो हियो है माई।
कमलनयन माखन के कारन बांधे ऊखल लाई॥
जो संपदा दैव मुनि दुर्लभ सपनेहुं द न दिखाई।
याही तें तू गरब भुलानी घर बैठें निधि पाई॥
सुत काहू कौ रोवत देखति दौरि लेति हिय लाई।
अब अपने घर के लरिका पै इती कहा जड़ताई॥
बारंबार सजल लोचन ह्वै चितवत कुंवर कन्हाई।
कहा करौं बलि जां छोरती तेरी सौंह दिवाई॥
जो मूरति जल-थल में व्यापक निगम न खोजत पाई।
सो महरि अपने आंगन में दै-दै चुटकि नचाई॥
सुर पालक सब असुर संहारक त्रिभुवन जाहि डराई।
सूरदास प्रभु की यह लीला निगम नेति नित गाई॥

अर्थ- एक बार यशोदा क्रोधवश बालकृष्ण को ऊखल से बांध देती हैं। तब कवि हृदय सूरदासजी यशोदा माता को उलाहना देते हुए कहते हैं कि तुम्हारा हृदय कैसा है ! तुमने माखन के कारण कमलनयन बालकृष्ण को ऊखल से बांध दिया है।

ईश्वर रूपी जो बाल धन देवताओं और ऋषियों को भी दुर्लभ है। वह तुम्हें अनायास ही प्राप्त हो गया है। इसीलिए तुम अभिमानवश यह भूल कर रही हो। कोई बालक रोते हुए देखते ही उसे झट से अपने हृदय से लगा लेती हो।

लेकिन अपने बालक के लिए तुम इतनी निष्ठुर हो गयी हो। देखो, कान्हा आंखों में आंसू भरे बार-बार तुम्हें देख रहे हैं। तुम्हें सौगन्ध है, उनको छोड़ दो। जो रूप जल-थल सर्वत्र व्यापक है। जो देवताओं के पालक और असुरों के संहारक हैं। वेद, पुराण जिसका वर्णन नहीं कर सकते। हे माता ! तुम उसे अपने आंगन में नचाती हो। सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु की इस लीला का बखान वेद, पुराण करते हैं।

पद (12) सोभित कर नवनीत लिए

सोभित कर नवनीत लिए ।
घुटुरुनि चलत रेनु तन-मंडित, मुख दधि लेप किये ।
चारू कपोल , लोल लोचन, गोरोचन-तिलक दिये ।
लट-लटकनि मनु मधुप-गन मादक मधूहिं पिए ।
कठुला-कंठ, ब्रज केहरि-नख, राजत रुचिर हिए ।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख, का सत कल्प जिए ॥1॥

अर्थ- बालकृष्ण की छवि का वर्ण करते हुए सूरदास जी कहते हैं कि उनके हाथ में माखन सुशोभित है। घुटनों के बल चल रहे हैं। पूरा शरीर धूल से भरा हुआ है और मुंह पर दही लगा हुआ है। सुंदर गाल, गोल आंखे और गोरोचन का तिलक, गले में कठुला, हृदय पर बाघ का नख शोभायमान है। अगर छवि दर्शन का ऐसा सुख एक पल के लिए भी मिल जाये तो कल्प भर जीने से भी बढ़कर है।

soor ke pad(13) किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिंब पकरिबैं धावत ।
कबहुँ निरखि हरी आपु छाँह कौं, कर पकरन चाहत ।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि अवगाहत ।
कनक-भूमि पर कर-पग-छाया, यह उपमा इन राजति ।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ।
बाल दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नन्द बुलावति ।
अँचरा तर लै ढ़ाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति ॥

अर्थ- श्रीकृष्ण की बाल लीला का वर्णन करते हुए सूर कहते है कि कृष्ण जी किलकारी मारते हुए नन्द के स्वर्णिम मणिमय आंगन में अपने प्रतिबिम्ब को पकड़ने के लिए दौड़ रहे हैं। हंसते समय उनके दो दांत सुंदर दिखते हैं। बालक की यह दशा देखकर आनंदमग्न यशोदा नंदजी को बार बार बुला रही हैं। फिर वे कृष्ण को अपने आँचल में ढक कर दूध पिलाने लगती हैं।

पद (14) महरि तें बड़ी कृपन है माई

महरि तें बड़ी कृपन है माई ।
दूध-दही बहु बिधि कौ दीनौ, सुत सौं धरति छपाई ।
बालक बहुत नहीं री तेरैं एकै कुँवर कन्हाई ।
सोऊ तौ घरही घर डोलतु, माखन खात चोराई ।
वृद्ध बयस, पूरे पुन्यनि तैं, बहुतै निधि पाई ।
ताहूँ के खैबे-पीबे कौं, कहा करति चतुराई ।
सुनहुँ न वचन चतुर नागरि के जसुमति नन्द सुनाई ।
सूर स्याम कौं चोरी कैं मिस देखन है यह आई ॥

अर्थ- एक गोपी यशोदा माता को उलाहना देते हुए कहती है कि हे माता तुम बड़ी कंजूस हो। तुम्हें भाग्य ने बहुत दूध, दही दिया है। फिर भी तुम उसे अपने एकमात्र बालक से छुपाकर रखती हो। इसलिए वह दूसरों के घर से माखन चुराकर खाता है।

पुण्यप्रभाव से तुम्हें यह निधि मिली है, फिर भी उसके खाने पीने में तुम चतुराई दिखाती हो। यशोदा जी नंद जी को सुनाते हुए कहती है कि इस नारी की बातों का ध्यान न दो। यह चोरी के बहाने कृष्ण जी को देखने आई है।

surdas ke pad(15) सुदामा गृह कौं गमन कियौ

सुदामा गृह कौं गमन कियौ ।
प्रगट बिप्र कौं कछु न जनायौ, मन मैं बहुत दियौ ॥
वेई चीर कुचील वहै बिधि, मोकौं कहा भयौ ।
धरिहौं कहा जाय तिय आगैं, भरि भरि लेत हियौ ॥
सो संतोष मानि मन हीं मन, आदर बहुत लियौ ।
सूरदास कीन्हे करनी बिनु, को पतियाइ बियौ ॥6॥

अर्थ- कृष्ण जी से भेंट करके सुदामा वापस अपने घर को चलते है। भगवान ने सामने तो सुदामा को कुछ नहीं दिया। किन्तु मन में उन्हें बहुत कुछ दे दिया। वही वस्त्र, भोजन और वही भाग्य है। मैं अपनी पत्नी को क्या दिखाऊंगा, जिसे पाकर वह प्रसन्न हो जाय। एक ही संतोष है कि उन्होंने सम्मान बहुत दिया। सच ही है कि बिना कर्म के कुछ नहीं मिलता।

कूट पद (16) कहत कत परदेशी की बात

कहत कत परदेशी की बात।
मंदिर अरध अवधि बदि हमसों हरि अहार चलि जात।
ससिरिपु बरस, सूररिपु जुग बर, हररिपु कीन्हो घात।
मघपंचक लै गयो सांवरो, तातै अति अकुलात।
नखत, बेद, ग्रह जोरि अर्ध करि सोइ बनत अब खात।
सूरदास बस भईं बिरह के कर मींजै पछतात।।

अर्थ- यह सूरदास का एक बहुत ही प्रसिद्ध कूटपद है। जिसमें गोपियाँ कूट भाषा में कहती हैं –
उस परदेशी (कृष्ण) बात क्या करना। वह हमसे मंदिर अर्ध (मंदिर का अर्थ घर और घर का आधा पाख यत् पक्ष यानी एक पखवारा) अर्थात एक पखवारे में आने की बात कह कर गए थे लेकिन अब तक हरि अहार (हरि मतलब शेर और उसका आहार मतलब मांस यानी मास) यानी एक मास बीत गया है।

(शशि मतलब चन्द्रमा उसका रिपु या दुश्मन यानी सूर्य अर्थात दिन और इसी प्रकार सूररिपु मतलब रात) दिन वर्षों की तरह और रात युगों की बीत रही है। (हररिपु मतलब शंकरजी के शत्रु कामदेव) काम ने हमें कष्ट दे रहा है।

(मघपंचक मतलब मघा नक्षत्र से पांचवां नक्षत्र चित्रा यानी चित्त) हमारा चित्त श्रीकृष्ण जी ले गए हैं इस कारण से हम व्याकुल हैं। (नखत-नक्षत्र- 28, वेद-4, ग्रह-9 बराबर 40 उसका आधा 20 यानी विष) अब हमारे पास विष खाने के अलावा कोई चारा नहीं है। सूरदास कहते हैं कि सभी गोपियाँ विरह के वश में होकर हाथ मलकर पछता रही हैं।

पद 17# मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

अर्थ- मेरे मन को अन्यत्र कहीं किसी की पूजा में सुख नहीं प्राप्त नहीं होता है। जिस प्रकार अनंत समुद्र में जहाज पर रहने वाला पक्षी घूम फिरकर फिर जहाज पर ही लौट आता है। कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर मन किसी और देवता का ध्यान करता है।

जिस प्रकार गंगाजी के पवित्र जल को छोड़कर कोई मूर्ख कुंआ खोदता है। जिस भ्रमर ने कमल का रस चख लिया है। उसे करेले का रस कहाँ पसंद आएगा। जब कामधेनु गाय उपलब्ध हो तो बकरी का दूध कौन दुहेगा ?

पद 18# चरन कमल बंदौ हरिराई

चरन कमल बंदौ हरिराई ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे,अंधे को सब कछु दरसाई ॥
बहरो सुने मूक पुनि बोले,रंक चले सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुणामय, बारबार बंदौ तिहिं पाई ॥

अर्थ- मैं श्रीहरि भगवान कृष्ण के चरण कमल की वंदना करता हूँ। जिनकी कृपा से लंगड़ा भी पर्वत को पार कर जाता है और अंधा भी देखने में सक्षम हो जाता है। बहरा सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है।

निर्धन धनवान हो जाता है। सूरदास जी कहते हैं कि भगवान बड़े दयालु हैं। मैं बार बार उनकी बंदना करता हूँ।

पद 19# अबिगत गति कछु कहति न आवै।

अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल को रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं, तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥

अर्थ- निराकार ब्रम्ह की गति कही नहीं जाती। जिस प्रकार गूंगा मीठे फल का स्वाद बता नहीं पाता। निराकार का परम आनन्द मन में अमित संतोष उत्पन्न करता है।

किन्तु मन और वाणी के लिए अगम्य और अगोचर होने के कारण जो इसे प्राप्त करता है। वही इसके बारे में जान सकता है। जो स्वरूप, गुण, जाति विहीन है ऐसे निरालंब ईश्वर की ओर मन कैसे जा सकता है।

इस प्रकार सभी तरह से कठिन जानकर सूरदास सगुण ब्रम्ह की लीला का वर्णन करते हैं।

पद 20# मो सम कौन कुटिल खल कामी

मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥

अर्थ- सूरदास कहते हैं कि मेरे समान दूसरा कोई पापी, कुटिल, दुष्ट और इच्छाओं का दास नहीं है। मै ऐसा नमकहराम हूँ कि जिस ईश्वर ने यह शरीर दिया है, मैं उसी को भूल गया हूँ।

ग्रामीण सुअर की भांति मैं जीभर कर विषय वासनाओं की ओर दौड़ता हूँ। संतों, सज्जनों की संगति छोड़कर, दुष्टों की गुलामी करता हूँ।

मुझसे बड़ा पापी और कौन होगा ? मैं सबसे अधिक बदनाम पापी हूँ। सूरदासजी कहते हैं कि हे प्रभु आपके अलावा पापियों के लिए कौन आश्रय है ?

पद 20# जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।
यह ब्योपार तिहारो ऊधौ, ऐसोई फिरि जैहै॥
यह जापे लाये हौ मधुकर, ताके उर न समैहै।
दाख छांडि कैं कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै॥
मूरी के पातन के कैना को मुकताहल दैहै।
सूरदास, प्रभु गुनहिं छांड़िकै को निरगुन निरबैहै॥

अर्थ- गोपियां कहती हैं हे उद्धव ! तुम्हारी यह योग की ठग विद्या ब्रज में नहीं बिकेगी। तुम्हारा यह व्यापार ऐसे ही वापस लौट जायेगा। जिनके लिए तुम यह सौदा लाये हो। उनके मन को यह नहीं पसंद आएगा।

तुम्ही बताओ, मीठे अंगूरों को छोड़कर कौन नीम की निम्बौरी खायेगा। मूली के कड़वे पत्तों के बदले कौन मूर्ख मोती देगा। सूरदास कहते हैं कि सगुण, साकार ईश्वर को छोड़कर कौन निराकार ब्रम्ह का निर्वाह करेगा।

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