shani chalisa- शनि चालीसा एवं पाठ विधि

शनि ग्रह के दुष्प्रभावों से पीड़ित लोगों के लिए shani chalisa रामबाण की तरह है। यदि आप भी शनि की साढ़ेसाती, ढैया या जन्मकुंडली में शनि के दुष्प्रभाव से पीड़ित हैं। तो शनि चालीसा की यह पोस्ट आपके लिए ही है।

शनि देव का संछिप्त परिचय

शनिदेव भगवान सूर्य और छाया के पुत्र हैं। भगवान शिव ने इन्हें न्यायाधीश का पद दिया है। ये काले रंग के, कुरूप और मंदगति से चलने वाले हैं।

ये जिस पर दृष्टि डालते हैं। वह नष्ट हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भी शनि ग्रह का बड़ा महत्व है। शनि के विषय में बहुत सी भ्रांतियां प्रचिलित हैं।

shani chalisa
शनि सिंगनापुर

वास्तव में शनि स्वयं किसी का बुरा नहीं करते। बल्कि वह तो न्यायाधीश होने के कारण केवल न्याय करते हैं। शनि अपनी दशा में केवल मनुष्य के किये गए कर्मों का फल प्रदान करते हैं।

तात्पर्य यह है कि अगर आपके अच्छे कर्म हैं। तो आपको शनि की दशा में अच्छा फल मिलेगा। बुरे कर्म हैं तो बुरा फल प्राप्त होगा।

शनि की साढ़ेसाती या ढैया में इसीलिए सावधानीपूर्वक कर्म करने की सलाह दी जाती है। क्योंकि इस दौरान किये गये अच्छे या बुरे कर्मों का फल तत्काल मिल जाता है।

शनि की बुरी दशा में जोड़ों एवं घुटनों में दर्द, ऋण, रोग, कार्यों में असफलता, कार्यों में विलम्ब, आदि अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इस प्रकार अगर हम चाहें तो इस समय का लाभ भी उठा सकते हैं। सदाचरण और सत्कर्मों द्वारा। फिर भी यदि कोई शनि देव के कारण परेशान है तो इसका सरलतम उपाय है shani chalisa (शनि चालीसा) का पाठ।

shani chalisa पाठ विधि

शनि चालीसा का पाठ अगर रोज किया जाए तो अति उत्तम है। अगर यह सम्भव न हो तो शनिवार के दिन शनि मंदिर या पीपल वृक्ष के नीचे या शिव मंदिर में शनि चालीसा का पाठ करने से तत्काल लाभ मिलता है।

उपरोक्त स्थानों पर पाठ करना सम्भव न हो तो घर के पूजाघर में शनिदेव की फोटो के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाकर पूरी श्रद्धा से shani chalisa का पाठ करने से शनि ग्रह के सभी दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है।

शनिदेव प्रसन्न होते हैं और व्यक्ति के सभी कार्य पूर्ण होने लगते हैं।

shani chalisa in hindi

दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करन कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल।।
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।।

चौपाई

जयति जयति शनिदेव कृपाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला।।
चारिभुजा, तनु श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छबि छाजै।।

परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।।
कुंडल श्रवण चमाचम चमके।
हिये माल मुक्तन मणि दमके।।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा।।
पिंगल, कृष्णो, छाया नंदन।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन।।

सौरी, मन्द, शनी दसनामा।
भानुपुत्र पूजहिं सब कामा।।
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वै जाहीं।
रंकहुँ राउ करहिं क्षण माहीं।।

पर्वतहू तृण होई निहारत।
तृणहू को पर्वत करि डारत।।
राज मिलत बन रामहिं दीन्हो।
कैकेई की मति हरि लीन्हो।।

बनहूँ में मृग कपट दिखाई।
मातु जानकी गई चुराई।।
लखनहिं शक्ति बिकल करि डारा।
मचिगा दल में हाहाकारा।।

रावण की गति मति बौराई।
रामचंद्र सों बैर बढ़ाई।।
दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग बीर की डंका।।

नृप बिक्रम पर तुहि पग धारा।
चित्र मयूर निगलि गा हारा।।
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी।।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।
तेलिहि घर कोल्हू चलवायो।।
विनय राग दीपक मँह कीन्हो।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हो।।

हरिश्चंद्र नृप नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम घर पानी।।
तैसे नल पर दशा सिरानी।
भूंजी मीन कूदि गई पानी।।

श्री शंकरहिं गहेहु जब जाई।
पारवती को सती कराई।।
तनिक बिलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा।।

पांडव पर भई दशा तुम्हारी।
बची द्रौपदी होत उघारी।।
कौरव के भी गति मति मारयो।
युद्ध महाभारत करि डारयो।।

रवि कँह मुंह मँह धरि तत्काला।
लेकर कूदि परयो पाताला।।
शेष देव लखि बिनती लाई।
रबि को मुख ते दियो छुड़ाई।।

वाहन प्रभु के सात सुजाना।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।।
जम्बुक सिंह आदि नखधारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पति उपजावैं।
गर्दभ हानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा।।

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै।।
जब आवैं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी।।

तैसहि चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लौह चांदी अरु तामा।।
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन जन सम्पति नष्ट करावैं।।

समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सुख मंगलकारी।।
जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुँ न दशा निकृष्ट सतावै।।

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करें शत्रु कै नस बल ढीला।।
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।।

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।
दीपदान दै बहु सुख पावत।।
कहत राम सुंदर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।।

दोहा

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार।।

shani chalisa के पाठ से लाभ

नियमपूर्वक चालीस दिन तक लगातार शनिदेव चालीसा का पाठ करने से शनि ग्रह से संबंधित सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। शनि चालीसा के पाठ के साथ साथ पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाना और सरसों के तेल का दीपक जलाने से चमत्कारिक परिणाम प्राप्त होते हैं।

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