sant ravidas- संत रविदास का जीवन परिचय

sant ravidas

प्रतिवर्ष माघ माह की पूर्णिमा (माघी पूर्णिमा) को sant ravidas-संत रविदास की जयंती (ravidas jayanti) मनाई जाती है। संत रैदास भक्तिमार्ग के महान संतों में से एक थे। मीराबाई भी उनके शिष्यों में से एक थीं।

भारत में उनके अनुयायियों की संख्या काफी अधिक है। विशेषरूप से उत्तर भारत में बड़ी मात्रा में उनके अनुयायी हैं। आज हम संत रविदास के जीवन पर विस्तारपूर्वक चर्चा इस लेख में करेंगे।

sant ravidas का जीवन परिचय

प्रारंभिक जीवन

संत रैदास raidas का जन्म सम्वत 1433 (सन 1377) की माघ पूर्णिमा को बनारस में हुआ था। उनके पिता का नाम संतोख दास और माता का नाम कर्मा देवी था। वे चर्मकार जाति से थे। अतः जूते बनाना उनका पैतृक व्यवसाय था।

ravidas बचपन से ही शांत एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। बचपन में ही उनपर ईश्वरीय कृपा हो गयी थी। इसका प्रमाण उनके बचपन में घटी एक चमत्कारिक घटना से मिलता है।

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एक बार उनके एक घनिष्ट मित्र की मृत्यु हो गयी। घर वाले उसकी मृत देह को रखकर विलाप कर रहे थे। उसे श्मशान ले जाने की तैयारी हो रही थी। तभी रविदास को इस घटना का पता चला। वे भागकर उसके घर पहुंचे।

अपने मित्र के शव के पास पहुंचकर बोले, “उठो, हमारे खेलने का समय हो गया है।” उनका मित्र तुरंत उठकर बैठ गया।

संत रविदास जी की शिक्षा एवं आजीविका

संत रविदास पढ़े लिखे नहीं थे। परंतु व्यवहारिक शिक्षा में निपुण थे। अपने पैतृक व्यवसाय को ही उन्होंने अपनी आजीविका का साधन बनाया। जूते बनाने के अपने काम को वे बड़ी लगन और ईमानदारी से करते थे। कभी किसी से अनुचित अथवा अधिक पैसे नहीं लेते थे।

साधू संतों और जरूरतमंदों को वे बिना मूल्य लिए ही जूते दे देते थे। जिस कारण उनके पिता उनसे नाराज रहते थे।

वैवाहिक जीवन

कम उम्र में ही उनका विवाह हो गया था। उनकी पत्नी भी सरल स्वभाव की महिला थीं। वे अपने पति के कार्यों एवं भक्ति के मार्ग की पूर्ण सहयोगी थीं। उनकी दान की आदत से तंग आकर रैदास के पिता ने उन्हें पत्नी सहित घर से निकाल दिया।

उनका सोचना था कि जब घरेलू जिम्मेदारी पड़ेगी तो raidas सुधर जाएंगे। बिना मूल्य के जूते दान करना बंद कर देंगे और सही ढंग से अपने व्यवसाय का संचालन करेंगे। किन्तु संत रविदास तो फक्कड़ संत थे।

उन्होंने गांव के बाहर एक छोटी सी कुटिया बनाई और पत्नीसहित रहने लगे। उनके स्वभाव में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं आया।

व्यक्तित्व

guru ravidas बहुत ही सज्जन और सरल स्वभाव के थे। वस्तुतः उन्होंने इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी। लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार आदि विकार उन्हें छूकर भी नहीं गए थे। लिए गए काम को नियत समय पर पूर्ण करना उनकी विशेषता थी।

वे कर्म और पूजा में अंतर नहीं करते थे। जीवन भर उन्होंने कर्म को पूजन का ही एक अंग माना। यही शिक्षा उन्होंने अपने शिष्यों को भी दी।

आध्यात्मिक जीवन- guru ravidas

संत रविदास बचपन से आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। उम्र बढ़ने के साथ साथ ईश्वर के प्रति उनकी भक्ति और निष्ठा बढ़ती ही गयी। संत शिरोमणि कबीरदास जी के कहने पर उन्होंने रामानंद जी से दीक्षा ली।

अपने पैतृक व्यवसाय को करते हुए उन्होंने ईश्वर भक्ति को नई परिभाषा प्रदान की। आध्यात्मिकता के उच्चतम शिखर पर आसीन होकर भी वे सरल और साधारण जीवन जीते रहे।

वे एक पहुंचे हुए संत थे। दिखने में वे एक जूते बनाने वाले साधारण मोची थे। परंतु ज्ञानी लोगों की नजर में वे वास्तविक रूप से ब्रम्हज्ञानी थे। भगवान कृष्ण की प्रसिद्ध भक्त मीराबाई इन्हीं की शिष्या थीं।

वैसे तो sant ravidas चमत्कारों से दूर रहते थे। फिर भी उनके एक प्रसिद्ध चमत्कार का वर्णन प्रस्तुत है। एक बार गंगा स्नान के पर्व पर एक ब्राम्हण गंगा स्नान के लिए जाते समय उनके पास जूते लेने आये।

रविदासजी ने उनको प्रेम सहित जूते दिए तो ब्राम्हण ने पूछा, “संतजी, क्या आप स्नान करने नही जाएंगे।” रैदासजी ने उत्तर दिया, “मेरे पास काम बहुत है। इसलिए मैं ज्ञे में असमर्थ हूँ।” ब्राम्हण ने कहा, “आप तो संत हैं फिर भी सांसारिक माया मोह में बंधकर पुण्यकर्म से मुंह मोड़ रहे हैं।”

sant ravidas ने हंसकर कहा, “आप जा रहे हैं तो मेरी तरफ से यह सिक्का आप गंगाजी में डाल दीजिएगा। जिससे मुझे भी कुछ पुण्य प्राप्त हो जाएगा।”

ब्राम्हण ने सिक्का ले लिया। स्नान और पूजन के बाद उसने रैदासजी का दिया सिक्का गंगाजी में डाल दिया। उस समय ब्राम्हण के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। जब स्वयं गंगाजी ने प्रकट होकर उस सिक्के को लिया और बदले में आशीर्वाद स्वरूप एक पाजेब ब्राम्हण को दी।

ब्राम्हण वापस आकर संत रविदास के चरणों में नतमस्तक हो गया और वह पाजेब उन्हें दे दी। इस चमत्कार की खबर पूरे काशी में फैल गयी। उनके विरोधियों ने इसे झूठ बताते हुए कहा कि अगर रविदास वैसी ही दूसरी पाजेब गंगाजी से लेकर दिखाएं तब वह मानेंगे।

शिष्यों के बार बार कहने पर रविदासजी ने जूते धोने की कठौती के जल में गंगाजी का आवाहन किया। गंगाजी उसी जल से प्रकट हुईं और वैसा ही दूसरा पाजेब प्रदान किया। तभी से यह कहावत प्रचलित हो गयी-

मन चंगा तो कठौती में गंगा।

संत रविदास की रचनाएँ- raidas ke pad

संत रविदास भक्ति में सराबोर होकर निर्गुण पद या भजन गाते थे। उनके भजन सरल भाषा में होते थे। उनमें भक्ति भाव के अतिरिक्त सामाजिक और धार्मिक बुराइयों के बारे में भी स्पष्ट उल्लेख होता था। उनके लिखे 40 पद सिख धर्मग्रंथ गुरु ग्रथ साहब में भी मिलते हैं।

रैदास के कुछ प्रमुख पद या भजन निम्न हैं-

1- प्रभुजी तुम चंदन हम पानी।
2- प्रभुजी तुम संगति सरन तिहारी।
3- ऐसी भगति न होई रे भाई।
4- रामहिं पूजा कहाँ चढ़ाऊँ।
5- माटी को पुतरा कैसे नचत है।
6- पार गया चाहै सब कोई।
7- बपुरौ सति रैदास कहै।
8- माधौ भ्रम कैसे न बिलाइ।
9- हरि हरि हरि न जपहि रसना।
10- पांडे कैसी पूजि रची रे।

उन्होंने कुछ दोहों की रचना भी की है। जो ईश्वर भक्ति और सामाजिक संदेश प्रदान करते हैं-

कहि रैदास तेरी भगति दूर है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक ह्वै चुनि खावै।।

अर्थात अभिमान को दूर करके ही ईश्वर की भक्ति प्राप्त हो सकती है।

हरि सा हीरा छाड़ि के, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषे रविदास।।

ईश्वर भक्ति छोड़कर जो दूसरी चीजों में ध्यान लगाते हैं। वे निश्चय ही नरक में जाते हैं।

संत रविदास की शिक्षाएं- sant ravidas teachings

ऊंच-नीच, जाति प्रथा, धार्मिक दिखावे की निंदा उन्होंने अपने पदों में की है-

जाति जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष न जुड़ सकै, जब तक जाति न जात।।

ऊंची जाति या उच्च कुल के बजाय गुणों की पूजा करनी चाहिए-

ब्राम्हण को मत पूजिये, जो होवे गुणहीन।
पूजिये चरण चांडाल को, जो होवे गुण प्रवीन।।

संत रविदास भी कबीरदासजी की तरह निर्गुण ब्रम्ह के उपासक थे। वे सभी तरह के धार्मिक और सामाजिक पाखंडों का विरोध करते थे। उन्होंने मधुर भजनों की रचना की। जिनमें उन्होंने सभी धर्मों और सभी पंथों को एक ही ईश्वर तक पहुंचाने का मार्ग बताया-

कृष्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लगि एक न पेखा।
वेद, कतेब, कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

उनके अनुसार हिन्दू और मुसलमानों में कोई अंतर नहीं है। सभी एक ही हाड़ मांस से बने हैं-

रैदास कनक अरु कंगन माहिं, जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसोइ अंतर नहिं, हिंदुअन तुरकन माहिं।।

उनके अनुसार सच्चे मन से भावपूर्ण की गई भक्ति को ईश्वर स्वीकार करते हैं-

मन चंगा तो कठौती में गंगा।

उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि ईश्वर प्राप्ति के लिए सब कुछ छोड़कर सन्यासी हो जाना ही एकमात्र साधन नहीं है। बल्कि गृहस्थ जीवन में रहकर भी अपने निर्धारित कर्मों को करते हुए भी उच्च आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

मृत्यु

जनसामान्य के प्रिय संत रविदास की मृत्यु सन 1520 ई0 में हुई थी। किन्तु उनके भजन, उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। जो आज भी एक वृहद जनसामान्य का मार्गदर्शन करती हैं। माघी पूर्णिमा को प्रतिवर्ष संत रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है।

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