संस्कृत श्लोक- sanskrit shlok

60+संस्कृत श्लोक- Shlok in Sanskrit

दोस्तों ! आज हम आपके लिए 60+संस्कृत श्लोक- Shlok in Sanskrit नामक पोस्ट लेकर आए हैं। जिनमें नीति के श्लोक, संस्कृत सुभाषित, गीता के श्लोक, विद्यार्थियों के लिए श्लोक, शिवजी, सरस्वती जी, गणेश आदि पर हिन्दी अर्थ सहित श्लोक का संकलन है। ये sanskrit shlok with meaning आपको निश्चित ही पसंद आएंगें, ऐसा मुझे विश्वास है।

(1) संस्कृत श्लोक- sanskrit shlok in hindi

अन्यायोपार्जितं वित्तं दस वर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्ते चैकादशेवर्षे समूलं तद् विनश्यति।

अर्थ- अन्याय या गलत तरीके से कमाया हुआ धन दस वर्षों तक रहता है। लेकिन ग्यारहवें वर्ष वह मूलधन सहित नष्ट हो जाता है।

संस्कृत श्लोक- sanskrit shlok
संस्कृत श्लोक- sanskrit shlok

उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
यथा सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति न मुखेन मृगाः।।

अर्थ- कार्य उद्यम करने से पूर्ण होते हैं, मन में इच्छा करने से नहीं। जैसे सोते हुए शेर के मुंह में मृग अपने आप प्रवेश नहीं कर जाते।

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तंद्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।

अर्थ– कल्याण की कामना रखने वाले पुरुष को निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता इन छ: दोषों का त्याग कर देना चाहिए।

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वान्हे चापरान्हिकम्।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम्।।

अर्थ- कल किया जाने वाला काम आज और सायंकाल में किया जाने वाला काम प्रातःकाल में ही पूरा कर लेना चाहिए। क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखती कि इसका काम पूरा हुआ कि नहीं।

न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत।
यं तु रक्षितमिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्ति तम्।।

देवतालोग चरवाहों की तरह डंडा लेकर पहरा नहीं देते। उन्हें जिसकी रक्षा करनी होती है। उसे वे सद्बुद्धि प्रदान कर देते हैं।

60+संस्कृत श्लोक- sanskrit shlok with meaning

सत्यं रूपं श्रुतं विद्या कौल्यं शीलं बलं धनम्।
शौर्यं च चित्रभाष्यं च दशेमे स्वर्गयोनयः।।

अर्थ- स्तय, विनय, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और वाक्पटुता ये दस लक्षण स्वर्ग के कारण हैं।

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्।।

अर्थ- सभी प्रकार के संग्रह का अंत क्षय है। बहुत ऊंचे चढ़ने के अंत नीचे गिरना है। संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मरण है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।

अर्थ- जिस घर में स्त्रियों का आदर होता है, उस घर में देवता निवास करते हैं। जहां स्त्रियों का आदर नहीं होता, वहाँ सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।

मातृवत परदारांश्च परद्रव्याणि लोष्टवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति।।

अर्थ- पराई स्त्री को माता के समान, परद्रव्य को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखता है। वास्तव में उसी का देखना सफल है।

परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्शनम्।
सचह्रदामतिशङ्का च त्रयो दोषाः क्षयावहाः।।

अर्थ- दूसरों के धन का अपहरण, पर स्त्री के साथ संसर्ग और अपने हितैषी मित्रों के प्रति घोर अविश्वास ये तीनों दोष जीवन का नाश करने वाले हैं।

sanskrit shlok with meaning in hindi

स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च।
गुरुवृत्यनुरोधेन न किञ्चिदपि दुर्लभम्।।

अर्थ- गुरुजनों की सेवा से स्वर्ग, धन-धान्य, विद्या, पुत्र और सुख कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

व्यसने वार्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवितान्तगते।
विमृशंश्च स्वया बुद्ध्या धृतिमान नावसीदति।।

अर्थ- शोक में, आर्थिक संकट में या प्राणों का संकट होने पर जो अपनी बुद्धि से विचार करते हुए धैर्य धारण करता है। उसे अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ता।

मूढ़ैः प्रकल्पितं दैवं तत परास्ते क्षयं गताः।
प्राज्ञास्तु पौरुषार्थेन पदमुत्तमतां गताः।।

अर्थ- भाग्य की कल्पना मूर्ख लोग ही करते हैं। बुद्धिमान लोग तो अपने पुरूषार्थ, कर्म और उद्द्यम के द्वारा उत्तम पद को प्राप्त कर लेते हैं।

अबन्धुर्बन्धुतामेति नैकट्याभ्यासयोगतः।
यात्यनभ्यासतो दूरात्स्नेहो बन्धुषु तानवम्।।

अर्थ- बार बार मिलने से अपरिचित भी मित्र बन जाते हैं। दूरी के कारण न मिल पाने से बन्धुओं में स्नेह कम हो जाता है।

shlok in sanskrit with hindi meaning
shlok in sanskrit

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।

अर्थ- प्रिय वचन बोलने से सभी जीव प्रसन्न हो जाते हैं। मधुर वचन बोलने से पराया भी अपना हो जाता है। अतः प्रिय वचन बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

सरल श्लोक- easy sanskrit shlok

स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्।
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते।।

अर्थ- संसार में जन्म मरण का चक्र चलता ही रहता है। लेकिन जन्म लेना उसका सफल है। जिसके जन्म से कुल की उन्नति हो।

यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्रानुशासिता।
मज्जन्ति तेवशा राजन् नद्यामश्मप्लवा इव।।

अर्थ- जहां का शासन स्त्री, जुआरी और बालक के हाथ में होता है। वहां के लोग नदी में पत्थर की नाव में बैठने वालों की भांति विवश होकर विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं।

धृतिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा।
मित्राणाम् चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः।।

अर्थ- धैर्य, मन पर अंकुश, इन्द्रियसंयम, पवित्रता, दया, मधुर वाणी और मित्र से द्रोह न करना ये सात चीजें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली हैं।

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद् भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत्।।

अर्थ- जो विश्वसनीय नहीं है, उस पर कभी भी विश्वास न करें। परन्तु जो विश्वासपात्र है, उस पर भी आंख मूंदकर भरोसा न करें। क्योंकि अधिक विश्वास से भय उत्पन्न होता है। इसलिए बिना उचित परीक्षा लिए किसी पर भी विश्वास न करें।

आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम्।
दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत्।।

अर्थ- आयु, धन, घर के दोष, मन्त्र, मैथुन, दवा, दान, मान और अपमान यह किसी से नहीं कहना चाहिए।

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम्।।

अर्थ- मूर्खों को दिया गया उपदेश उनके क्रोध को शांत न करके और बढ़ाता ही है। जैसे सर्पों को दूध पिलाने से उनका विष ही बढ़ता है।

यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्।।

अर्थ- यौवन, धन संपत्ति, प्रभुता और अविवेक इनमें से एक भी अनर्थ करने वाला है। लेकिन जिसके पास ये चारों हों, उसके विषय में कहना ही क्या !

न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान् नरः।
एतदेवातिपाण्डित्यं यत्स्वल्पाद् भूरिरक्षणम्।।

अर्थ- थोड़े के लिए अधिक का नाश न करे, बुद्धिमत्ता इसी में है। बल्कि थोड़े को छोड़कर अधिक की रक्षा करे।

कवचिद् रुष्टः क्वचित्तुष्टो रुष्टस्तचष्टः क्षणे क्षणे।
अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादो अपि भयंकरः।।

अर्थ- जो कभी नाराज होता है, कभी प्रसन्न होता है। इस प्रकार क्षण क्षण में नाराज और प्रसन्न होता रहता है। उस चंचल चित्त पुरुष की प्रसन्नता भी भयंकर है।

जिव्हा दग्धा परान्नेन करौ दग्धौ प्रतिगृहात्।
मनो दग्धं परस्त्रीभिः कार्यसिद्धिः कथं भवेत्।।

अर्थ- दूसरे का अन्न खाने से जिसकी जीभ जल चुकी है। दूसरे का दान लेने से जिसके हाथ जल चुके हैं। दूसरे की स्त्री का चिंतन करने से जिसका मन जक चुका है। उसे पूजा पाठ जप तप से सिद्धि कैसे मिल सकती है।

परान्नं च परद्रव्यं तथैव च प्रतिग्रहम्।
परस्त्रीं परनिन्दां च मनसा अपि विवर्जयेत।।

अर्थ- पराया अन्न, पराई संपत्ति, दान, पराई स्त्री और दूसरे की निंदा इनकी मन से भी इच्छा नहीं करनी चाहिए।

60+संस्कृत श्लोक- Shlok in Sanskrit

निवसन्ति हि यत्रैव सन्तः सद्गुणभूषणाः।
तन्मंगल्यं मनोज्ञं च तत्तीर्थं तत्तपोवनम्।।

अर्थ- सतगुणी सज्जनपुरुष जहां निवास करते हैं। वही स्थान मनोरम एवं मंगलमय है। वही तपोवन है और वही तीर्थ है।

लोके यशः परत्रापि फलमुत्तमदानतः।
भवतीति परिज्ञाय धनं दीनाय दीयताम्।।

अर्थ- दिए गए दान का फल इस लोक में यश और मृत्यु के बाद उत्तम लोकों की प्राप्ति है। इसलिए दीनों के निमित्त दान करना चाहिए।

विभवे भोजने दाने तिष्ठन्ति प्रियवादिनः।
विपत्ते चागते अन्यत्र दृश्यन्ते खलु साधवः।।

अर्थ- मनुष्य के सुख- समृद्धि के समय, खान- पान और मान के समय चिकनी चुपड़ी बातें करने वालों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन विपत्ति के समय केवल सज्जन पुरुष ही साथ दिखाई पड़ते हैं।

भवन्ति नम्रास्तरवः फलागमै-
र्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्।

अर्थ- फल लगने पर पेड़ झुक जाते हैं। जल से भरे बादल नीचे आ जाते हैं। सज्जन लोग धन पाकर विनम्र हो जाते हैं। यही परोपकारियों का स्वभाव है।

वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति।।

अर्थ- महापुरुषों के मन की थाह कौन पा सकता है। जो अपने दुखों में वज्र से भी कठोर और दूसरों के दुखों के लिए फूल सभी अधिक कोमल हो जाता है।

दुष्कृतं हि मनुष्याणां अन्नमाश्रित्य तिष्ठति।
अश्नाति यो हि यस्यान्नं स तस्याश्नाति किल्बिषम्।।

अर्थ- मनुष्य के दुष्कृत्य या पाप उसके अन्न में रहते हैं। जो जिसका अन्न खाता है। वह उसके पाप को भी खाता है।

यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यंचों अपि सहायताम्।
अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोपि विमुञ्चति।।

अर्थ- धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने वाली की संसार के सभी प्राणी सहायता करते हैं। जबकि अन्याय के मार्ग पर चलने वाले को उसका सगा भाई भी छोड़ देता है।

शुभाशुभं कृतं कर्म भुंजते देवता अपि।
सविता हेमहस्तोभूद् भगो अन्धः पूषकोद्विजः।।

अर्थ- मनुष्य ही नहीं, देवताओं को भी अपने किये किये शुभ-अशुभ कर्मों का फल भोगने पड़ता है। सविता देवता का हाथ कट जाने पर उन्हें स्वर्ण का कृत्रिम हाथ लगाने पड़ा था। भगदेवता अपने कर्म से अंधे हुए और पूषा देवता दंतहीन हो गए।

प्रभोरपि धिगर्थित्वं रूपहानिं करोति यत्।
मेघातिथिं यदायाचदिन्द्रो मेषोभवत् ततः।।

अर्थ- मांगने से मनुष्य का रूप स्वरूप घटता है। याचना यदि भगवान से भी की जाय, तो उचित नहीं है। जिस प्रकार मेघातिथिं ऋषि से सोमयाचना करने के कारण इंद्र को बैल बनना पड़ा।

मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे।
तयोः फलं तु तुल्यं हि भावग्राही जनार्दनः।।

अर्थ- मूर्ख कहता है विष्णाय नमः जोकि अशुद्ध है और ज्ञानी कहता है विष्णवे नमः जो व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है। लेकिन दोनों का फल एक ही है। क्योंकि भगवान शब्द नहीं भाव देखते हैं।

कनिष्ठाः पुत्रवत् पाल्या भ्रात्रा ज्येष्ठेन निर्मलाः।
प्रगाथो निर्मलो भ्रातुः प्रागात् कण्वस्य पुत्रताम्।।

अर्थ- बड़े भाई को अपने छोटे भाइयों का पुत्रवत् पालन करना चाहिए। जैसे महर्षि कण्व ने अपने छोटे भाई प्रगाथ का पुत्रवत् पालन पोषण किया था।

विद्यार्थी के लिए श्लोक- shlok in sanskrit on vidya

अभिवादनशीलस्य च नित्य वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।

अर्थ- प्रणाम करने और वृद्धों की सेवा करने वाले कि चार चीजें बढ़ती हैं- आयु, विद्या, यश और बल।

काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणम्।।

अर्थ- कौवे जैसी फुर्ती, बगुले जैसा ध्यान, कुत्ते की तरह सोना, अल्पाहारी, गृहत्याग करने वाला ये विद्यार्थी के पांच लक्षण हैं।

विद्या ददाति विनयं विनयात याति पात्रताम्।
पात्रत्वात धनमवाप्नोति धनात धर्मः ततः सुखम्।।

अर्थ- विद्या विनयं देती है। विनय से योग्यता और योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

मातरं पितरं विप्रमाचार्यं चावमन्यते।
स पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं गतः।।

अर्थ- जो व्यक्ति माता पिता ब्राम्हण और गुरु का अपमान करता है। वह यमराज के वश में होकर उस पाप का फल भोगता है।

पितरौ हि सदा वन्द्यौ न त्यजेदपराधिनौ।
पित्रा बद्धः शुनःशेपो ययाचे पित्रदर्शनम्।।

अर्थ- माता पिता सदा ही पूजनीय हैं। भले ही वे अपराधी क्यों न हों। शुनःशेप को उसके पिता ने यूप में बांध दिया था। फिर भी उसने मुक्ति के बाद पिता के ही दर्शन की इच्छा की।

गीता श्लोक- geeta shlok in sanskrit

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि।।

अर्थ- तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उनके फलों में नहीं। इसलिए कर्मफल की चिंता न करके केवल कर्म करो।

geeta shlok
geeta shlok in sanskrit

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

अर्थ- गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति अनन्य भाव से मेरा चिंतन करता है, भजन करता है। ऐसे नित्य निरंतर अनुरागी पुरुषों के योगक्षेम का वहन मैं करता हूँ अर्थात सभी प्रकार से उनका ध्यान रखता हूँ।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषते।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।

अर्थ- श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन ! तू न सोच करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक कर रहा है। ज्ञानी पुरुषों की तरह तर्क कर रहा है। जबकि ज्ञानी पुरुष जीवित अथवा मृत किसी के लिए शोक नहीं करते हैं।

य एनं वेत्ति हंतारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।

अर्थ- जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मर हुआ समझता है। वे दोनों सत्य नहीं जानते। क्योंकि आत्मा न तो किसी को मारती है और न किसी के द्वारा मारी जाती है।

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतो अयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

अर्थ- यह आत्मा न तो किसी काल में जन्म लेती है और न ही मरती है। न ही यह उत्पन्न होकर फिर से होने वाली है। यह तो अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। यह शरीर के मारे जाने पर भी कभी नहीं मरती है।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवो जन्ममृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।

अर्थ- जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जिसकी मृत्यु हुई है। उसका जन्म भी निश्चित है। इसलिए इस निरुपाय विषय में तेरा शोक करना व्यर्थ है।

शिव श्लोक- shiv shlok in sanskrit

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं।
सदावसंतं ह्रदयारविन्दे भवंभवानी सहितं नमामि।।

अर्थ- जो कपूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, दया के अवतार हैं। संसार के साररूप, सर्पों की माला पहने हैं। वे भगवान शिव मां पार्वती के साथ सदैव हमारे हृदय रूपी कमल में निवास करें।

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वंदे पार्वती परमेश्वरौ।।

अर्थ- जो शब्दों की भांति अलग अलग होते हुए भी शब्दों के अर्थ की भाँति एक हैं। उन संसार के माता पिता स्वरूप शंकर पार्वती को मैं प्रणाम करता हूँ।

अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।
सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेस्तु रुद्ररूपेभ्यः।।

अर्थ- जो अघोर हैं, घोर हैं, घोर से भी घोरतर हैं। जो सर्वसंहारकारी रुद्ररूप हैं। आपके उन सभी रूपों को मेरा नमस्कार है।

प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गंगाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम्।
खटवाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम्।।

अर्थ- जो संसार के भय को हरने वाले और देवताओं के स्वामी हैं। जो गंगा को धारण करते हैं और बैल जिनका वाहन है। जो अम्बा के ईश हैं एवं जिनके हाथ में खटवाङ्ग, त्रिशूल, वरद और अभयमुद्रा है। उन संसाररोग को हरने वाले अद्वितीय औषधि रूप महादेव को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।

नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं नमामि सर्वज्ञमपारभावम्।
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा नमामि।।

अर्थ- मैं पुराणपुरुष शम्भु को नमस्कार करता हूँ। जिनकी असीम सत्ता का पर नहीं है, उन सर्वज्ञ शिव को मैं नमस्कार करता हूँ। अविनाशी प्रभु रुद्र और सबका संहार करने वाले शर्व को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।

गणेश श्लोक- ganpati shlok in sanskrit

गजाननंभूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बू फलचारुसेवितम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।।

अर्थ- जिनका मुख हाथी के समान है। भूतगण जिनकी सेवा करते हैं। कैथ और जामुन के फल जिन्हें प्रिय हैं। शोक का नाश करने वाले पार्वती के पुत्र, विघ्नेश्वर गणेश के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ।

ganpati shlok
ganpati shlok in sanskrit

प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं
सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम्।
उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड-
माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम्।।

अर्थ- अनाथों के बंधु, सिंदूर से शोभायमान दोनों गण्डस्थल वाले, प्रबल विघ्न का नाश करने में समर्थ एवं इन्द्रादि डिवॉन से पूजित श्रीगणेश का में प्रातःकाल स्मरण करता हूँ।

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय
लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय
गौरीसुताय गणनाथ नमोनमस्ते।

अर्थ- विघ्नों का नाश करने वाले, वर देने वाले, देवताओं के प्रिय, लम्बोदर, सम्पूर्ण जगत का उद्धार करने वाले, टेढ़े मुख वाले, श्रुति यज्ञ से शोभायमान गौरी के पुत्र गणेश जी को नमस्कार है।

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोपशान्तये।।

अर्थ- जो श्वेत वस्त्र धारण किये हुए हैं, चन्द्रमा के समान जिनका रंग है। चार भुजाओं वाले, प्रसन्न मुख, सभी विघ्नों का नाश करने वाले ऐसे गणपति का मैं ध्यान करता हूँ।

वक्रतुण्डमहाकाय कोटिसूर्यसमप्रभः।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

अर्थ- टेढ़े मुख वाले, महाकाय, करोड़ों सूर्यों के समान जिनकी चमक है। ऐसे देव गणेश मेरे सभी कामों को सदैव निर्विघ्न पूर्ण करें।

सरस्वती के श्लोक- sanskrit shlok of saraswati

घंटाशूलहलानि शंङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं।
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्।।

अर्थ- जो अपने करकमलों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं। शरदऋतु के चन्द्रमा के समान जिनकी कांति है। जो तीनों लोकों की आधारभूत और शुम्भ आदि दैत्यों के नाश करने वाली हैं। जो गौरी के शरीर से उत्पन्न हुई हैं। उन महासरस्वती देवी का मैं निरंतर भजन करता हूँ।

करेण वीणा परिवादयन्तीम् तथा जपन्तीमपरेण मालाम्।
मरालपृष्ठाम् सन्सन्निविष्टाम् सरस्वतीम् ताम् सिरसा नमामि।।

अर्थ- एक हाथ में वीणा धारण किये हैं और दूसरे हाथ में माला। मोर की पीठ पर सुशोभित मां सरस्वती को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ।

या कुन्देन्दु तुषारहार धवला, या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमंडित करा, या श्वेतपद्मासनाः।।
या बम्हाच्युतशंकर प्रभृतिभिः देवैः सदा वन्दितः।
सा माम् पातु भगवती सरस्वती, निःशेषजाड्यापहा।।

अर्थ- जो देवी शारदा कुंद के फूल, बर्फ के हार और चन्द्रमा के समान श्वेत और श्वेत वस्त्रों से सुशोभित हैं। जिनके हाथों में वीणा का दंड शोभित है। जो श्वेत कमल पर आसीन हैं और जिनकी स्तुति ब्रम्हा, विष्णु, महेश आदि देवता सदा ही किया करते हैं। वे भगवती सरस्वती अज्ञान के अंधकार से मेरी रक्षा करें।

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