सच्ची प्रार्थना- मोरल स्टोरी

सच्ची प्रार्थना- मोरल स्टोरी

कहानियां हमारा मनोरंजन करने के साथ हमें सिखाती भी हैं। सच्ची प्रार्थना- मोरल स्टोरी ऐसी ही एक मोरल स्टोरी है। यह हमें सच्ची प्रार्थना का महत्व बताती है। साथ ही यह कहानी हमें यह भी बताती है। कि दुर्व्यसन कितने नुकसानदायक हो सकते हैं। आइये शुरू करते हैं-

सच्ची प्रार्थना- मोरल स्टोरी

एक छोटे शहर में एक मेडिकल स्टोर था। उसका मालिक हरिराम नामक एक व्यक्ति था। जो पिछले बीस वर्षों से मेडिकल स्टोर चलाता था। उसे दवाओं की अच्छी जानकारी थी। अपने काम में वह पूर्ण निपुण था।

स्वभावतः वह एक सच्चा, ईमानदार और दयालु व्यक्ति था। लेकिन वह ईश्वर और पूजा-पाठ में विश्वास नहीं करता था। हरिराम एक नास्तिक था। घर वालों के बहुत प्रयास के बावजूद वह नास्तिक ही रहा।

सच्ची प्रार्थना- मोरल स्टोरी
सच्ची प्रार्थना- मोरल स्टोरी

उसकी एक बुरी आदत भी थी। खाली समय में या छुट्टी के दिन वह दोस्तों के साथ ताश खेलता था। ताश की महफ़िल वह कहीं भी लगा लेता था। कभी कभी वह दुकान में भी ताश खेलने लगता था।

एक बार शाम के समय तेज बारिश हो रही थी। पूरा शहर बारिश की वजह से सुनसान था। उसकी दुकान पर भी कोई ग्राहक नहीं था। बारिश की वजह से बिजली भी चली गयी थी।

ऐसे में हरिराम को लगा कि यह ताश खेलने का अच्छा मौका है। उसने अपने दोस्तों को बुलाया और मोमबत्ती के उजाले में महफ़िल जम गई।

थोड़ी देर बाद एक बारह तेरह साल का लड़का बारिश में भीगता हुआ उसकी दुकान पर आया। उसने बताया, “मेरी माँ बहुत बीमार है। डॉक्टर ने एक दवा लिखी है जिससे मां को आराम मिलेगा। लेकिन दवा की सारी दुकानें बंद हैं। पूरे शहर में घूमने के बाद केवल आपकी दुकान ही खुली मिली।”

“कृपया आप दवा दे दीजिए।” हरिराम पूरी तरह ताश के खेल में रमा हुआ था। वह उठना नहीं चाहता था। लेकिन वह बच्चे को मना भी नहीं कर सकता था। आखिर किसी के जीवन का मामला था।

अनमने भाव से उसने दवा का पर्चा देखा। अंधेरे में अंदाजे से उसने एक दवा शीशी उठाकर उस लड़के को दे दी। लड़का दवा लेकर भागता हुआ चला गया। थोड़ी देर में दुकान बंद करने का टाइम होने पर ताश के खेल बन्द हुआ। सारे दोस्त अपने अपने घर चले गए।

तभी बिजली भी आ गयी। हरिराम दुकान बंद करने लगा था कि उसका ध्यान उस रैक की ओर चला गया। जिससे उसने लड़के को दवा निकाल कर दी थी। उसकी धड़कन बढ़ गयी। ये कैसा अनर्थ हो गया?

बीस सालों में पहली बार उससे चूक हुई। वो भी इतनी खतरनाक! दरअसल जल्दबाजी और बेध्यानी में उसने लड़के को चूहे मारने की दवा दे दी थी। अगर लड़के ने अपनी माँ को वह दवा पिला दी तो अनर्थ हो जाएगा।

वह अपने को धिक्कारने लगा। ताश के चक्कर में ये क्या हो गया? उसने प्रण किया कि आज के बाद मैं कभी ताश नहीं खेलूंगा। लेकिन जो गलती हुई है, उसे कैसे सुधारा जाए। लड़के का नाम पता कुछ उसके पास नहीं था। उसे ढूढ़े भी तो कैसे?

एक एक पल कीमती था और उसे समझ में नहीं आ रहा था क्या किया जाय? तभी उसकी नजर दुकान में कोने की तरफ लगे कृष्ण भगवान के फोटो पर पडी। यह फोटो उसके पिताजी ने दुकान के उदघाटन के दिन अपने हाथ से लगाया था।

भगवान में विश्वास न होने के बावजूद उसने पिताजी के सम्मान में उसे नहीं हटाया था। आज जीवन में पहली बार उसने कृष्ण जी के सामने हाथ जोड़े। हरिराम ने सच्चे मन से उस लड़के की मां के लिए प्रार्थना की।

वह वहीं हाथ जोड़े खड़ा था और उसकी आँखों से आंसू गिर रहे थे। तभी उसने किसी के पुकारने की आवाज सुनी। हरिराम ने आंखें खोलकर देखा तो वही लड़का खड़ा था।

लड़के ने कहा, “आपकी दी हुई दवा लेकर मैं अपने घर पहुंच गया था। लेकिन आंगन में पानी भरा होने के कारण मैं फिसल कर गिर गया और दवा की शीशी टूट गयी। क्या आप मुझे वही दवा फिर दे सकते हैं।”

यह सुनकर हरिराम बहुत खुश हुआ। उसके मन का बोझ उतर गया। उसने खुशी खुशी लड़के को दूसरी दवा की शीशी दी। लड़के ने कहा उसके पास और पैसे नहीं हैं। वह बाद में पैसे दे देगा।

हरिराम ने कहा, “दोबारा पैसे देने की कोई जरूरत नहीं है। तुम जाकर अपनी माँ को दवा दो।” लड़के के जाने के बाद हरिराम ने भगवान को धन्यवाद दिया। जीवन में पहली बार उसे ईश्वर में विश्वास हुआ था।

आज उसे पता चला कि सही काम के लिए सच्चे मन से प्रार्थना की जाय। तो ईश्वर जरूर सुनते हैं।

कहानी की सीख moral

सच्ची प्रार्थना- मोरल स्टोरी हमें दुर्व्यसनों से दूर रहने की सीख देती है। साथ ही यह हमें सिखाती है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना ईश्वर जरूर सुनते हैं।

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