रस की परिभाषा,

रस की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण

दोस्तों ! हिंदी भाषा ज्ञान के अंतर्गत आज हम रस की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण (ras ki paribhasha) नामक पोस्ट लेकर आये हैं। जिसमें हिंदी भाषा के सभी रसों की परिभाषा विस्तृत व्याख्या सहित, रस के अंग, भाव और उदाहरण आदि सभी अंगों को सरल भाषा में समझाने का प्रयत्न किया है।

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद रस ( ras) संबंधित आपकी सभी जिज्ञासाओं का समाधान हो जाएगा। यह लेख विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं को तैयारी करने वाले छात्रों के लिए भी बहुत उपयोगी है।

रस की परिभाषा # ras ki paribhasha

रस का शाब्दिक अर्थ होता है- आनन्द। किसी काव्य को पढ़ने या सुनने के बाद हमें जो आनंद प्राप्त होता है। वही रस कहलाता है। “रस्यते इति रसः” के अनुसार रस का अर्थ स्वाद से है। जैसे विभिन्न प्रकार के भोजन से हमें अलग अलग स्वाद मिलता है।

उसी प्रकार अलग अलग काव्य के श्रवण या पठन से जो स्वाद मिलता है। वही रस कहलाता है। सरल भाषा में कहें तो काव्य को पढ़कर हमारे मन में जो भाव उत्पन्न होते हैं, वही रस हैं।

सर्वप्रथम आचार्य भरत मुनि ने पहली शताब्दी में अपने ग्रंथ “नाट्य शास्त्र” में रस के संबंध में विवेचना की। इसीलिए उन्हें रस सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। उनके अनुसार रस की परिभाषा निम्नवत है–

विभावानुभाव व्यभिचारि संयोगाद् रस निष्पतिः।

अर्थात विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है।

नाना भावोपगमाद् रस निष्पतिः। नाना भावोपहिता अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्ति।

अनेक भावों के मिलने से रस की उत्पत्ति होती है। अनेक भावों से युक्त स्थायी भाव रस की अवस्था को प्राप्त करते हैं।

रस सम्प्रदाय के महान आचार्य मम्मट ने 11वीं सदी में काव्य के आनन्द को ब्रम्हानंद के समान माना है।

आचार्य विश्वनाथ ने कहा है कि–

वाक्यम् रसात्मकं काव्यं।

अर्थात रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार–

लोक हृदय में व्यक्ति हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशा है।

इस प्रकार सरल भाषा में कुछ पढ़कर हमारे मन में खुशी, दुख, क्रोध आदि जो भाव उत्पन्न होते हैं, वही रस कहलाते हैं। रस को काव्य की आत्मा कहा गया है।

रस के अंग

रस के चार अंग कहे गए हैं। स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी या व्यभिचारी भाव।

स्थायी भाव #रस की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण

रस की उत्पत्ति मन की भिन्न भिन्न स्थितियों से होती है। विभिन्न प्रकार की स्थितियों से अलग अलग रसों की उत्पत्ति होती है। मन की इन्हीं स्थितियों या प्रवृत्तियों को ही स्थायी भाव कहा जाता है। यह भाव काव्य के प्रारंभ से अंत तक स्थायी रहता है।

इसीलिए इसे स्थायी भाव कहते हैं। स्थायी भाव रस का आधार होता है। भरतमुनि ने आठ ही स्थायी भाव माने थे। इसीलिए उन्होंने केवल आठ रसों को ही मान्यता दी थी।

आचार्य अभिनव गुप्त ने “नवमो अपि शान्तो रसः” कहकर निर्वेद स्थायी भाव और शांत रस को मान्यता प्रदान कर रसों की संख्या नौ कर दी। काव्य में इन्हें नवरस भी कहा जाता है। रसों के स्थायी भावों की संख्या नौ है–

1- रति 2- हास 3- शोक 4- रौद्र 5- उत्साह 6- भय 7- जुगुप्सा 8- विस्मय 9- निर्वेद

कालांतर में दो अन्य स्थायी भावों को मान्यता प्रदान की गई।

10- स्नेह या वात्सल्य 11- अनुराग या भगवद रति

इस कारण से रसों की संख्या भी 11 हो गयी। यद्यपि बाद में जोड़े गए दोनों रस श्रृंगार रस के अंतर्गत आ जाते हैं। अतः सर्वमान्य रूप से रसों की गणना 9 ही उचित है।

विभाव

स्थायी भावों को जगाने वाले कारक विभाव कहलाते हैं। अर्थात “जो पदार्थ, व्यक्ति या अन्य कारण हृदय में भाव उत्पन्न करते हैं। उन कारणों को विभाव कहते हैं।” विभाव दो प्रकार के होते हैं–

आलम्बन विभाव

जिसका सहारा लेकर मन में स्थायी भाव जागृत होते हैं। उसे आलम्बन विभाव कहा जाता है। जैसे काव्य में नायक नायिका परस्पर आलम्बन विभाव हैं। आलम्बन विभाव के भी दो भेद हैं-

आश्रयालम्बन # रस की परिभाषा,

जिसके मन में भाव जाग्रत हों। जैसे- सीता को देखकर राम के मन में प्रेम उतपन्न हुआ। यहां राम आश्रयालम्बन हैं।

विषयालम्बन

जिसके कारण हृदय में भाव जाग्रत हों। जैसे उपर्युक्त उदाहरण में सीता विषयालम्बन हैं।

उद्दीपन विभाव

जो विषय, वस्तु या परिस्थिति स्थायी भावों को उद्दीप्त करे अर्थात तेजी प्रदान करे। उसे उद्दीपन विभाव कहते हैं। जैसे- चांदनी, रमणीक स्थल, सुहाना मौसम, बसन्त ऋतु, नायक नायिका के कृत्य आदि श्रृंगार रस के स्थायी भाव रति के उद्दीपन विभाव हैं।

अनुभाव

आलम्बन और उद्दीपन विभावों के कारण जो शारीरिक चेष्टाएँ उत्पन्न होती हैं। उन्हें अनुभव कहते हैं। जैसे- शर्म से चेहरा लाल होना, नाराजगी से मुँह फूलना, प्रेम से होठों के थरथराना आदि।

अनुभाव भी दो प्रकार के होते हैं- 1-सात्विक अथवा अयत्नज 2- कायिक अथवा यत्नज

सात्विक अनुभाव # ras ki paribhasha

विभाव के कारण हमारे शरीर में जो चेष्टाएँ अपने आप उत्पन्न होती हैं। उन्हें सात्विक अनुभाव कहते हैं। ये निम्न आठ प्रकार की होती हैं-
1- स्वेद- लाज, प्रेम या भय के कारण पसीना आना।
2- रोमांच- भय, प्रेम, काम, हर्ष आदि के कारण रोंगटे खड़े हो जाना।
3- वैवर्ण्य- भय, काम, लज्जा, दुख आदि के कारण चेहरे का रंग फीका पड़ जाना।
4- कंपन- अत्यधिक प्रसन्नता, भय, काम आदि के कारण शरीर में कम्पन होना।
5- अश्रु- खुशी, दुख, प्रेम आदि कारणों से अश्रुप्रवाह होना।
6- स्वर-भंग- हर्ष, शोक, भय आदि के कारण अटक-अटक कर बोलना।
7- स्तम्भन- भय, लज्जा, प्रेम आदि के कारण गतिहीन हो जाना।
8- प्रलय- अत्यंत दुख, भय या प्रेम में इन्द्रियों का संज्ञाशून्य हो जाना।

वर्तमान में सात्विक भावों के अंतर्गत जम्हाई (ज्रम्भा) को भी शामिल किया गया है। इन्हीं सात्विक भावों को ही तनसंचारी भाव भी कहते हैं।

कायिक अनुभाव

विभावों के कारण जो मनोभाव हमारी शारीरिक क्रियाओं के द्वारा प्रकट हो जाते हैं। वे कायिक अनुभाव के अंतर्गत आते हैं। जैसे-
डरकर भागना, प्रेम में आलिंगन, चुम्बन, क्रोध में भला बुरा कहना आदि।

संचारी या व्यभिचारी भाव

ये भाव स्थायी भावों के सहायक होते हैं। काव्य के भावों के अनुसार ये मन में आते जाते रहते हैं। परिस्थितियों के अनुसार ये घटते बढ़ते रहते हैं। भरत मुनि ने इनकी तुलना पानी में उठने वाले बुलबुलों से की है। इनकी संख्या 33 है–

1- हर्ष 2- विषाद 3- त्रास (भय, व्यग्रता) 4- लज्जा 5- ग्लानि 6- चिंता 7- शंका 8- असूया (ईर्ष्या) 9- अमर्ष 10- मोह 11- गर्व 12- उत्सुकता 13- उग्रता 14- चपलता 15- दीनता 16- जड़ता 17- आवेग 18- निर्वेद 19- धृति 20- मति 21- बिबोध 22- वितर्क 23- श्रम 24- आलस्य 25- निद्रा 26- स्वप्न 27- स्मृति 28- मद 29- उन्माद 30- अवहित्था 31- अपस्मार 32- व्याधि 33- मरण

इस प्रकार इन चारों भावों के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है। रसों का विवरण निम्नवत है–

रस की परिभाषा,
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श्रृंगार रस की परिभाषा

काव्य में नायक, नायिका के प्रेम के वर्णन को श्रृंगार रस कहते हैं। इसका स्थायी भाव रति है। श्रृंगार रस दो प्रकार का है-

संयोग श्रृंगार

जब नायक और नायिका के मिलन का वर्णन होता है। अर्थात प्रेम की उस अवस्था और क्रिया कलापों का वर्णन जो नायक और नायिका के मिलन से उत्पन्न होता है। उदाहरण-

कहूँ बाग तड़ाग तरंगिनी तीर तमाल की छांह बिलोकि भली।
घटिका इक बैठती है सुख पाप बिछाय तहाँ कुस काल थली।।
मग को श्रम श्रीपति पूर करे सिय को शुभ वाकल अंचल सो।
श्रम तेऊ हरे तिनको कहि केशव अचल चारु द्रगंचल सो।।

वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार # रस की परिभाषा,

हां काव्य में नायक-नायिका के वियोग की अवस्था का वर्णन होता है। वहां वियोग श्रृंगार होता है। उदाहरण-

देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि उर उपजावा।।

करुण रस

किसी प्रिय के अलगाव अथवा मरण आदि से जो शोक या दुख का भाव उत्पन्न होता है। उसे करुण रस कहते हैं। जैसे–

धोखा न दो भइया मुझे, इस भांति आकर के यहां।
मंझधार में मुझको बहाकर, तात जाते हो कहां।।
सीता गयी तुम भी चले, मैं भी न जीऊंगा यहां।
सुग्रीव बोले साथ में, सब जाएंगे बानर वहां।।

हास्य रस

इसका स्थायी भाव है। आकार, वाणी, वेश भूषा, चेष्टा आदि के वर्णन से उत्पन्न हास्य की स्थिति को हास्य रस कहते हैं। भरत मुनि ने हास्य के आठ भेद कहे हैं- स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अवहसित, अतिहसित, आत्मस्थ, परस्थ। हास्य रस का उदाहरण है-

तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप,
साज मिले पंद्रह मिनट, घण्टा भर आलाप।
घण्टा भर आलाप, राग में मारा गोता,
धीरे धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता।।

वीर रस # रस की परिभाषा,

इसका स्थायी भाव उत्साह है। जब काव्य में वीरता का वर्णन हो। तब उत्साह नामक स्थायी भाव विभावादि के संयोग से वीर रस में परिणत होता है। वीर रस के चार भेद होते हैं- युद्धवीर, दानवीर, धर्मवीर और दयावीर
उदाहरण-

मानव समाज में अरुण पड़ा, जल जंतु बीच हो वरुण पड़ा।
इस तरह भभकता राणा था, मानो सर्पों में गरुण पड़ा।।

रौद्र रस

इसका स्थायी भाव क्रोध है। जब क्रोध की अधिकता का वर्णन होता है। तब वहां रौद्र रस होता है। उदाहरण–

जौ राउर अनुशासन पाऊं। कंदुक इव ब्रम्हांड उठाऊं।
कांचे घट जिमि डारौं फोरी। सकौं मेरु मूले इव तोरी।।

अदभुत रस# ras ki paribhasha

जब काव्य में आश्चर्य जनक वर्णन किया जाता है। तो वहां अदभुत रस होता है। इसका स्थायी भाव विस्मय या आश्चर्य है। उदाहरण-

देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया।
क्षण भर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी कोमल काया।।

भयानक रस

जब काव्य में किसी भयानक दृश्य का वर्णन होता है। तो वहां भयानक रस की उत्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव भय है। उदाहरण–

बालधी विशाल, विकराल, ज्वाल जाल मानौ, लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है।
कैधौं व्योम बीद्दिका.भरे हैं भूरि धूमकेतु, वीर रस वीर तलवार सी उघारी है।

वीभत्स रस

जब काव्य में किसी ऐसे दृश्य का वर्णन हो। जिससे मन में घृणा उत्पन्न हो। वहां वीभत्स रस होता है। इसका स्थायी भाव जुगुप्सा या घृणा है। उदाहरण–

सिर पर बैठ्यो काग आंख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अति आनन्द उर धारत।
गीध जांघ को खोदि खोदि कै मांस उपारत।
स्वान आंगुरिन काटि काटि कै खात विदारत।

शांत रस # रस की परिभाषा,

जब काव्य में ऐसा वर्णन हो कि जिससे मन में वैराग्य की उत्पत्ति हो। तब वहां शांत रस होता है। इसका स्थायी भाव निर्वेद है। उदाहरण–

मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूंद बिनसि जाय छिन में, गरब करे क्या इतना।।

इस प्रकार ये काव्य में प्रयुक्त नौ रस हैं। बाद में दो अन्य रसों को भी मान्यता प्रदान की गई। जोकि इस प्रकार हैं–

वात्सल्य रस

छोटे बालकों के क्रिया कलापों का ऐसा वर्णन जिससे मन में वात्सल्य युक्त प्रेम की उत्पत्ति हो। इसका स्थायी भाव वत्सल है। उदाहरण–

किलकत कान्ह घुटुरवन आवत।
मनिमय कनक नंद के आंगन, बिम्ब पकरिबे धावत।।

भक्ति रस # ras ki paribhasha

इस रस में ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति का वर्णन होता है। इसका स्थायी भाव भगवत विषयक रति या अनुराग है। उदाहरण–

उलटा नाम जपत जग जाना।
बाल्मीकि भे ब्रम्ह समाना।।

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