राम बड़े या कृष्ण

राम बड़े या कृष्ण

राम बड़े या कृष्ण यह जानने के लिए हमें दोनों के चरित्र का विश्लेषण करना होगा. भगवान विष्णु के अब तक 9 अवतार हो चुके हैं परंतु राम और कृष्ण दो ऐसे चरित्र हैं जो भारतीय जनमानस के हृदय में समाहित हैं।

भारतीय समाज में इन्ही दो चरित्रों का सर्वाधिक अनुकरण होता है। यह प्रायः विवाद का विषय होता है कि राम बड़े या कृष्ण। चलिए यह जानने का प्रयत्न करते हैं।

भगवान नारायण जगत के कल्याण और धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेते हैं। श्रीमदभगवदगीता के चतुर्थ अध्याय में भगवान अपने अवतार लेने के उद्देश्य के विषय में बताते हुए कहते हैं—-
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥
अर्थात जब जब संसार में धर्म घटता है, तब तब मैं अधर्म के नाश के लिये अवतार लेता हूँ। सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में अवतार लेता हूँ। इनके अतिरिक्त ईश्वरीय अवतार का अन्य प्रमुख उद्देश्य होता है भावी समाज के लिए एक अनुकरणीय आदर्श चरित्र की स्थापना करना।

जिसके आलोक में एक आदर्श समाज की स्थापना हो सके। प्रत्येक अवतार के चरित्र में तत्कालीन देश, काल और परिस्थिति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उस समय की सामाजिक और सांसारिक परिस्थितियां ही अवतार के चरित्र का निर्धारण करती हैं। आइये अब हम राम और कृष्ण दोनों के चरित्र का अलग अलग विश्लेषण करते है।

श्रीराम का चरित्र

श्रीराम का अवतार त्रेता युग में हुआ था। उनके अवतार का प्रमुख उद्देश्य आततायी राक्षसों का नाश कर जनसामान्य को निर्भय करना था। इसके अतिरिक्त एक आदर्श जीवन का प्रतिमान स्थापित करना था।
श्रीराम के जीवन चरित्र का विश्लेषण करने से पूर्व हमें तत्कालीन परिस्थितियों को भी जानना आवश्यक है। उस काल में समाज धर्म से विमुख नहीं था वरन राक्षसों द्वारा बलपूर्वक धर्मपालन से रोका जाता था। लोग संबंधों की मर्यादा का पालन करते थे।

राजा भी प्रजा का पालन समुचित रीति से करने का प्रयत्न करते थे। परंतु रावण के अत्याचार के विरुद्ध लोग एकजुट नहीं हो रहे थे। लोग व्यष्टि की चिंता एवं उन्नति के लिए समष्टि के प्रति उत्तरदायित्वों के निर्वहन के प्रति उदासीन थे। इन परिस्थितियों में आवश्यकता थी एक ऐसे आदर्श चरित्र की जो जो पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन सके।

श्रीराम का चरित्र इन सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है। श्रीराम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन एक साधारण सांसारिक व्यक्ति की भांति व्यतीत किया। किसी कार्य हेतु अपनी दैवीय शक्तियों का प्रयोग नहीं किया। पितृभक्ति और भ्रातृप्रेम का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया। वन के कष्टों को भी सहजतापूर्वक सहन कर परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने का संदेश प्रस्तुत किया।

रावण से युद्ध के लिए उन्होंने अयोध्या से सहायता नहीं मांगी वरन स्वयं सेना की व्यवस्था की। वानर भालुओं की सेना लेकर रावण जैसे त्रैलोक्य विजयी से युद्ध किया। यही नहीं एक पत्नीव्रत लेकर उन्होंने तत्कालीन बहुपत्नी प्रथा को भी दूर किया। सामाजिक बहिष्कार से पीड़ित अहिल्या को मान्यता दी। एक राजा के रूप में ऐसे आदर्श रामराज्य का उदाहरण प्रस्तुत किया जिसकी परिकल्पना आज तक कि जाती है।

कुल मिलाकर राम का चरित्र एक आदर्श जीवन चरित्र है। जो समष्टि के कल्याण हेतु व्यष्टि के सुखों का त्याग करने की प्रेरणा देता है।

कृष्ण का चरित्र

कृष्ण के अवतार के समय सामाजिक परिस्थितियां पूर्णतया भिन्न थीं। सामाजिक एवं नैतिक पतन आरम्भ हो चुका था। सत्ता एवं धन की लोलुपता अपेक्षाकृत रूप से बढ़ से बढ़ गयी थी। कलियुग का आरम्भ निकट था। धर्म, न्याय, कर्तव्य, प्रेम की परिभाषाएं बदल चुकी थीं।

ऐसे समय में श्रीराम के आदर्श जीवन चरित्र का पालन अत्यंत कठिन था। अब आवश्यकता थी एक ऐसे चरित्र की जो आदर्श से अधिक व्यवहारिक हो। तब जन्म होता है भगवान श्रीकृष्ण का। जिनका चरित्र हमें धर्म की दुरूह और कठिन परिभाषाओ से बचाता है और कर्म ही पूजा है के नवीन सिद्धान्त को प्रतिपादित करता है।

श्रीकृष्ण का चरित्र हमें परिस्थितियों के अनुरूप कर्म करना सिखाता है।परिस्थितियां अनुकूल न हों तो रणक्षेत्र से हट जाना कायरता नहीं अपितु बुद्धिमत्ता है।धर्म की स्थापना के लिए थोड़े बहुत अनुचित साधनों का प्रयोग भी उचित है। उनका कथन है कि साध्य महत्त्वपूर्ण है साधन नहीं। कृष्ण ने सिखाया कि चरित्र की अपेक्षा आपके कर्म और कर्म का उद्देश्य अधिक महत्वपूर्ण है।

कृष्ण और राम में अंतर

राम बड़े या कृष्ण दोनों की इस आधार पर तुलना उचित नहीं. राम की राजनीति जहाँ पूर्णतया नीति और सिद्धान्तों पर आधारित थी वहीं कृष्ण की राजनीति पूरी तरह व्यावहारिक। जो अच्छे कार्य के लिए अनुचित साधनों के प्रयोग को भी अनुमोदित करती है।

इसका उदाहरण हमें महाभारत के युद्ध में देखने को मिलता है। राम का चरित्र आदर्श एवं अनुकरणीय है तो कृष्ण का चरित्र कई सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ता है। राम अपने आदर्श चरित्र के कारण मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम कहलाये तो कृष्ण अपनी शिक्षाओं के कारण जगतगुरू और योगेश्वर कहलाये।

राम ने सिखलाया कि त्याग, तपस्या, सदाचार, नैतिकता और मर्यादाओं के पालन से साधारण से साधारण मनुष्य भी मर्यादापुरुषोत्तम और जननायक बन सकता है। जबकि कृष्ण ने सिखाया कि किसी जनकल्याणकारी कार्य हेतु नैतिकताओं और मर्यादाओं को तोड़कर केवल कर्म के बल पर भी मनुष्य जगद्गुरु और योगेश्वर बन सकता है।

कैवल्य अथवा ईश्वर प्राप्ति हेतु राम ने भक्तिमार्ग को अनुमोदित किया जबकि कृष्ण ने योग को। श्रीकृष्ण ने सिखाया कि कर्मों में लिप्त हुए बिना अच्छे बुरे सभी संसारिक कर्मों को करते हुए भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। संत देवरहा बाबा के  विषय में जानने के लिए पढ़ें–

भारत के संत- भाग -1 देवरहा बाबा

निष्कर्ष

निष्कर्षतः दोनों में कोई बड़ा छोटा नहीं है। वस्तुतः राम का चरित्र अनुकरणीय है और कृष्ण की शिक्षाएँ। राम और कृष्ण दोनों ने अपने अपने समय के अनुरूप समाज के लिए अपने अपने चरित्र के माध्यम से दो विकल्प प्रस्तुत किये। अब चयन का विकल्प आपके पास है। मेरे स्वयं के विचार से वर्तमान समय में राम और कृष्ण के चरित्र का मिश्रण अधिक प्रासंगिक है।

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