प्रेरक प्रसंग : स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद के प्रेरक प्रसंग

स्वामी विवेकानंद के प्रेरक प्रसंग prerak prasag in hindi

स्वामी विवेकानंद जी भारत के एक ऐसे महान संत थे. जिन्होंने भारत को एक नई दृष्टि और ऊर्जा प्रदान की. स्वामी विवेकानंद के प्रेरक प्रसंग आज भी युवावर्ग को उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति में लग जाओ के सूत्रवाक्य की याद दिलाते रहते हैं। विशेष तौर से युवा वर्ग पर आज भी उनका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. उनके जीवन के अनेक ऐसे प्रसंग हैं. जो आज के समय में हमें प्रेरक प्रसंग के रूप में प्रेरणा प्रदान करते हैं. ऐसे ही कुछ चुनिन्दा प्रसंगों का वर्णन प्रस्तुत है—

स्वामी विवेकानंद के प्रेरक प्रसंग
प्रेरक प्रसंग : स्वामी विवेकानंद

वस्त्र नहीं चरित्र महत्वपूर्ण है

एक बार स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में थे। किसी कार्यवश वे बाज़ार जा रहे थे। स्वामी जी भगवा कुर्ता, धोती और सिर पर पगड़ी पहने थे। उनका यह पहनावा अमेरिकी लोगों के लिए कौतूहल का विषय था। जो भी उन्हें देखता कुछ न कुछ कमेंट ज़रूर करता।

एक जगह पर उनके पीछे चल रही महिला ने अपने साथी से कहा- “जरा इन महाशय के कपड़े तो देखो। ये सभ्य पुरुषों का पहनावा नहीं है। स्वामी विवेकानंद उसकी बात सुनकर पीछे पलटे और उत्तर दिया, “देवी! आपके देश मे सभ्यता और सज्जनता दर्ज़ी तय करते होंगे। मैं जिस देश से आता हूँ, वहाँ मनुष्य की सभ्यता और सज्जनता उसके कपड़ों से नहीं चरित्र से आंकी जाती है।”
यह सुनकर वह महिला बहुत शर्मिंदा हुई और उसने स्वामी जी से माफ़ी माँगी।

स्वामी विवेकानंद जी के जीवन का यह प्रेरक प्रसंग हमें शिक्षा देता है की हम लोगों को अपने पहनावे से ज्यादा अपने चरित्र का ध्यान रखना चाहिए.

मूर्तिपूजा का सम्मान

सन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी विवेकानंद पूरे भारत में घूम घूम कर अपनी शिक्षाओं का प्रचार कर रहे थे। इसी क्रम में वे घूमते हुए राजस्थान के अलवर मे पहुँचे। अलवर के दीवान को जब स्वामी जी के आगमन की बात पता चली। तो वे स्वामी जी को लेकर महाराज के पास पहुँचे। महाराज ने स्वामी जी की आवभगत की।

अलवर के महाराज आधुनिक विचारों वाले और पश्चिमी सभ्यता के प्रशंसक थे। स्वामीजी से बातचीत के दौरान महाराज मूर्तिपूजा की आलोचना करने लगे। इसके सम्बंध मे उन्होंने कई तर्क दिए और मूर्तिपूजा का मज़ाक़ उड़ाया।स्वामीजी शांतिपूर्वक सुनते रहे। जब महाराज अपनी बात खतम कर चुके तो स्वामी जी ने दीवान से दरबार की एक दीवार पर टंगे महाराज के चित्र को उतारने के लिए कहा।

दीवान ने चित्र उतार लिया तो स्वामीजी ने उनसे पूछा, “यह किसका चित्र है?” दीवान ने उत्तर दिया, “महाराज का।” तब स्वामीजी ने कहा, “इसपर थूक दो।” यह सुनकर दीवान जी चौंक कर बोले, “यह आप क्या कह रहे हैं? यह तो महाराज का अपमान है।” इसपर स्वामीजी ने उत्तर दिया, “ इसमें महाराज का अपमान कैसे होगा? महाराज इस चित्र के अंदर तो हैं नहीं। यह तो काग़ज़ पर रंगों से बना मात्र एक चित्र है।”

दीवान ने फिर भी इंकार कर दिया। तब स्वामीजी ने महाराज से कहा, “जिस प्रकर इस चित्र मे आपके न होते हुए भी आपकी छवि होने कारण इसका सम्मान भी आपके ही समान है। उसी प्रकार सामान्य जन मूर्ति मे भगवान के न होने के बावजूद उनकी छवि देखते हैं। यह उनकी आस्था और ध्यान को केन्द्रित करता है.

महाराज स्वामीजी के इस द्रष्टान्त से बहुत प्रभावित हुए। मूर्तिपूजा के प्रति उनका पूर्वाग्रह इसके बाद समाप्त हो गया। स्वामी विवेकानंद ने जिस निर्भयता और सरलता से अलवर के महाराज को मूर्तिपूजा का महत्व समझाया वह अतुलनीय है।

यह प्रेरक प्रसंग यह सिखाता है कि हमें सभी की आस्था का सम्मान करना चाहिए.

ईश्वर सबका पालन करते हैं

विवेकानंद जी के जीवन में एक बार ऐसी घटना घटी. जिससे उनका विश्वास ईश्वर में और दृढ़ हो गया. स्वामी विवेकानंद एक बार रेलयात्रा कर रहे थे। गर्मियों के दिन थे। उस समय उनके पास खाने पीने को कुछ नहीं था। पैसे भी पास नहीं थे कि कुछ ख़रीद कर खा सकें। उनके सामने की सीट पर एक धनी व्यापारी बैठा था। उसे साधू सन्यासियों से चिढ़ थी।

वह बार बार स्वामीजी को दिखा कर कुछ खाने पीने की चीजें निकाल कर खा रहा था। साथ ही ताना भी मार रहा था की अगर तुम भी मेरी तरह कमाते तो भूखे प्यासे नहीं रहते। स्वामीजी चुपचाप शांत बैठे थे। स्टेशन पर उतरने के बाद स्वामीजी बाहर एक दुकान के सामने पेड़ के नीचे बैठ गये।

संयोग से वह दुकान उसी व्यापारी की थी। स्वामीजी को देखकर उसने फिर व्यंग किया। तभी एक सेठ स्वामीजी के पास आया। उसका नौकर भोजन और ठंडा पानी लिए था। सेठ ने आसन बिछाया और स्वामी जी से भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद जी ने उससे कहा, “ आपको कोई ग़लतफ़हमी हो गयी है। मैं वह नहीं हूँ जिसे आप ढूँढ रहे हैं।”

सेठ ने बताया, “महाराज आप वही हैं। आज दोपहर मे मैं भोजन के बाद सो रहा था। तब मेरे सपने में रामजी आए और उन्होंने आपकी ओर इशारा करके कहा कि इस सन्यासी के भोजन का प्रबंध करो। मैं इसे स्वप्न समझकर फिर सो गया। तो दोबारा रामजी ने आकर वही बात दोहरायी। आपकी कृपा से सपने में ही सही मुझे रामजी के दर्शन हो गये। इसलिए मैं आपके लिए यह भोजन लाया हूँ। इसे ग्रहण कीजिए।”

विवेकानंदजी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया और भोजन ग्रहण किया। यह देखकर वह व्यापारी शर्म से पानी पानी हो गया और स्वामीजी से क्षमा माँगने लगा।

गीता मे भगवान ने कहा है कि जो लोग मेरे सहारे रहते हैं उनके लिए सारे प्रबंध मैं स्वयं करता हूँ।

नर्तकी की सीख- स्वामी विवेकानंद के प्रेरक प्रसंग

एक बार स्वामी विवेकानंद खेतड़ी के महाराज के अतिथि थे। दरबार में राज्य की प्रसिद्ध नर्तकी का नृत्य का कार्यक्रम था। उसमें स्वामीजी को भी बुलाया गया। लेकिन उन्होंने यह कहकर जाने से मना कर दिया कि सन्यासी होने के कारण उनका इस तरह के कार्यक्रम में जाना उचित नहीं।

यह बात नर्तकी को बहुत बुरी लगी। उसने कार्यक्रम में सूरदास का एक पद गाया-

“प्रभु मेरे अवगुन चित न धरो।”

इस पद को सुनकर स्वामीजी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने महसूस किया कि सन्यासी होने के कारण उनके लिए सब बराबर हैं। उन्होंने उस नर्तकी से क्षमा मांगी। वह नर्तकी उनकी शिष्या बन गयी और उसने नृत्य का काम छोड़ दिया।

लक्ष्य पर ध्यान

एक बार स्वामी विवेकानंद अमेरिका में भ्रमण कर थे। उन्होंने देखा कि एक पुल के पास कुछ लड़के नदी में तैर रहे अंडों के छिलकों पर निशाना लगा रहे थे। लेकिन किसी का निशाना सही नहीं लग रहा था। यह देखकर स्वामीजी ने एक लड़के से बंदूक ली और खुद निशाना लगाने लगे। उन्होंने पहला निशाना लगाया जोकि एकदम सटीक लगा।

उसके बाद स्वामी विवेकानंद ने एक के बाद एक बारह निशाने लगाए। सभी एकदम सटीक लगे। लड़कों ने पूछा, “आपने यह कैसे किया? स्वामीजी ने उत्तर दिया यह सब ध्यान की शक्ति से संभव हुआ है। उन्होंने लड़कों को सीख दी कि हमेशा एकाग्रचित्त होकर केवल लक्ष्य पर ध्यान दो। तभी लक्ष्यभेद संभव है।

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