प्रधान राजज्योतिषी- कहानी

हिंदी कहानियों की श्रृंखला में आज हम आपके लिए प्रधान राजज्योतिषी- कहानी लेकरआये हैं। जो रोचक और मनोरंजक होने के साथ साथ शिक्षाप्रद भी है।

प्रधान राजज्योतिषी- कहानी

राजधानी से सटे गांव में एक वृद्ध व्यक्ति और उसकी पत्नी रहते थे। एक दिन वृद्धा नदी में स्नान करने करने गयी तो वहां राजा के सिपाहियों ने उसे रोक दिया। कारण पूछने पर पता चला कि राज्य के प्रधान राजज्योतिषी की पत्नी स्नान कर रही हैं।

इसलिए वहां किसी और को स्नान करने की इजाजत नहीं है। बुढ़िया के आत्मसम्मान को ठेस लगी उसने मन ही मन निश्चय किया कि मुझे भी प्रधान राजज्योतिषी की पत्नी बनना है।

प्रधान राजज्योतिषी- कहानी
प्रधान राजज्योतिषी- कहानी

घर आकर उसने अपने पति से कहा कि प्रधान राजज्योतिषी की पत्नी के बड़े ठाठ हैं। वह भी राजज्योतिषी बने। बूढ़े ने उसे समझाया कि यह कोई खेल नहीं है। इसके लिए ज्योतिष की पढ़ाई करनी पड़ती है।

लेकिन बुढ़िया तो कुछ भी सुनने को राजी नहीं थी। उसने साफ कह दिया कि अगर घर में रहना है तो यह करना ही पड़ेगा। बेचारे बूढ़े ने हां कर दी। बूढ़ा बुद्धिमान था। उसे ज्योतिष का ज्ञान तो नहीं था। परंतु उसे व्यवहारिक ज्ञान बहुत था।

वह बाजार से एक पंचांग खरीद लाया। साथ ही उसने ज्योतिषियों वाले वस्त्र पहनना और टीका लगाना शुरू कर दिया। हर मिलने वाले से उसने बताना शुरू कर दिया कि वह ज्योतिष सीख रहा है।

जब उसका थोड़ा बहुत प्रचार हो गया तो वह राजधानी के प्रमुख बाजार में बैठने लगा और लोगों का भविष्य बताने लगा। अपने व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर वह लोगों का भविष्य बताता था। जिसके कारण उसकी काफी बातें सही निकलती थी।

फलस्वरूप थोड़े ही दिनों में उसकी चर्चा होने लगी। यह चर्चा राजदरबार तक भी पहुंच गई। उन्हीं दिनों एक घटना घटी। एक बार सुदूर क्षेत्र से राजा के सैनिक कर संग्रह करके वापस लौट रहे थे। उनके साथ कर के रूप में मिले बारह घोड़े भी थे।

लेकिन राजदरबार में पहुंचने पर केवल ग्यारह घोडे ही बचे। एक घोड़ा रास्ते में कहीं गायब हो गया। राजा ने इसे कर चोरी का मामला माना। प्रधान राजज्योतिषी सहित कई अन्य ज्योतिषियों से पूछा गया लेकिन कोई घोड़ों के विषय में भविष्यवाणी नहीं कर पाया।

राजा के एक मंत्री ने बताया कि राज्य में एक नया ज्योतिषी आया है। जिसकी चर्चा चारों ओर फैली है। उसे बुलाकर पूछा जाए हो सकता है कि उसके पास उत्तर हो। राजा ने उसे बुलाने के लिए कहा। नए ज्योतिषी को दरबार में बुलाया गया और उससे घोड़ों के बारे में पूछा गया।

पहले तो वह बूढ़ा बहुत घबराया। किंतु बाद में उसने अपने व्यावहारिक ज्ञान से अंदाजा लगाया की घोड़े कहीं रास्ते में छूट गए होंगे। उसने सैनिकों से पूछा कि तुम लोग यहां आते समय रास्ते में कहीं रुके थे ?

सैनिकों ने उत्तर दिया कि हम लोग थोड़ी देर एक घास के मैदान के पास आराम करने के लिए रुके थे। बूढ़े ने सोचा की हो ना हो घोड़े वहीं कहीं घास चरने निकल गए होंगे और सैनिक ध्यान नहीं दे पाए होंगे।

उसने थोड़ी देर तक पंचांग देखने का नाटक किया और फिर बताया की घोड़े उसी घास के मैदान के पास झाड़ियों में हैं। राजा ने तुरंत सैनिकों को वहां भेजा और सचमुच घोड़े वही घास चरते हुए मिले।

उसके बाद उस बूढ़े को बहुत प्रशंसा मिली और उसे राज ज्योतिषी बना दिया गया। जब उसने यह खबर बुढ़िया को सुनाई तो वह बहुत खुश हुई। उसे लगा कि अब प्रधान राजज्योतिषी की पत्नी बनने का सपना जल्द ही पूरा होगा।

लेकिन बूढ़ा बहुत भयभीत था। वह सोचता था कि इस तरह के तुक्के ज्यादा दिन नहीं चलेंगे। जिस दिन राजा को सच्चाई पता चल गई। उस दिन उसे भारी दंड दिया जाएगा। उसने कई बार राजा को सच्चाई बताने के बारे में सोचा। लेकिन ऐसा करने की उसकी हिम्मत नहीं हुई।

एक दिन नहाते हुए उसके मन में विचार आया कि अगर मैं इसी हालत में राजा के पास जाऊं और उल्टी सीधी हरकतें करूं। तो अवश्य ही राजा मुझे पागल समझकर राजज्योतिषी के पद से हटा देगा।

यह सोचकर वह केवल अधोवस्त्र में ही राजा के महल पहुंच गया। वहां उसने राजा का हाथ पकड़ा और उन्हें जबर्दस्ती खींचता हुआ लेकर महल से बाहर आ गया। ठीक उसी समय एक अनोखा चमत्कार हुआ।

तेज भूकम्प आया और महल का वह हिस्सा, जहां राजा थोड़ी देर पहले खड़ा था, भरभराकर गिर गया। राजा भी आश्चर्यचकित हो गया। उसने दोनों हाथ जोड़कर बूढ़े से कहा, “आपको कैसे पता चला कि भूकम्प आने वाला है?”

बूढ़े ने उत्तर दिया, “मैं नहा रहा था तभी मुझे आभास हुआ इसलिए मैं उसी हालत में तुरंत चला आया।” राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसे प्रधान राजज्योतिषी बना दिया। अब तो बुढ़िया बहुत प्रसन्न हुई।

उसे वह सारी सुविधाएं मिलने लगीं। जो वह चाहती थी। लेकिन बूढ़ा बहुत चिंतित था। वह जानता था कि कभी न कभी उसका भेद खुल जायेगा। उसने सोचा कि किसी भी तरह उसे राजा को सच्चाई बतानी ही होगी।

एक दिन राजा महल के बगीचे में टहल रहे थे। तभी उन्हें फूल पर बैठा एक कीड़ा दिखाई दिया। जिसे उन्होंने अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया। फिर उन्हें प्रधान राजज्योतिषी की परीक्षा लेने की सूझी। बूढ़े को बुलाया गया।

राजा ने उससे कहा कि बताओ मेरी मुट्ठी में क्या है ? बूढ़ा भयभीत हो गया। उसने कहा, “दो बार बच गया, लेकिन तीसरी बार में पकड़ गया।” राजा ने प्रसन्न होकर कहा, “बहुत सही ! यह कीड़ा दो बार मेरी पकड़ से बचा लेकिन तीसरी बार में पकड़ में आ ही गया।”

बूढ़ा एक बार फिर बच गया। लेकिन इस बार उसने हिम्मत करके राजा को सच्चाई बात दी। पहले तो राजा बहुत हंसा फिर उसने बूढ़े को बहुत सारा धन देकर प्रधानराजज्योतिषी के पद से मुक्त कर दिया।

Moral- सीख

झूठ के सहारे किया गया कार्य ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता है।

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