lahiri mahasaya- महायोगी श्यामाचरण लाहिड़ी की जीवनी

श्यामाचरण लाहिड़ी

लाहिड़ी महाशय एक चमत्कारी संत

श्रीमती अभया अपने पति के साथ कोलकाता से अपने गुरु महायोगी lahiri mahasayaश्यामाचरण लाहिड़ी के दर्शन हेतु काशी के लिए चलीं। रास्ते में भीड़ अधिक होने के कारण उन्हें स्टेशन पहुंचने में विलंब हो गया। जब वे स्टेशन पहुँची तो गाड़ी बस निकलने ही वाली थी। टिकट लेने का भी समय नहीं बचा था। अगर गाड़ी छोड़ देते तो अगली गाड़ी दूसरे दिन थी।
ऐसी अवस्था में अभया ने मन ही मन अपने गुरु से प्रार्थना की ” हे गुरुदेव, कृपा करके इस गाड़ी को रोक दीजिये। आपके दर्शन के लिए मैं कल तक प्रतीक्षा नहीं करना चाहती।

फिर एक अकल्पनीय चमत्कार हुआ। छुक छुक करती रेलगाड़ी के पहिये घूमते रहे लेकिन गाड़ी अपने स्थान से हिली नहीं। गार्ड, ड्राइवर और वहां उपस्थित सभी लोग हैरानी से यह दृश्य देख रहे थे। जब अभया और उनके पति टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गए ट्रेन तभी आगे चली। ऐसे चमत्कारी थे महान योगी shyama charan lahiri।

lahiri mahasaya का परिचय

भारत भूमि अनेक तपस्वी और चमत्कारी संतों की भूमि रही है। प्रत्येक युग और काल में इस पवित्र भूमि पर अवतारसदृश संतों, योगियों ने प्रकट होकर तत्कालीन समाज की आध्यात्मिक धारा को सही दिशा, दशा व गति प्रदान की।
प्राचीनकाल में ही लुप्त हो चुकी योगशास्त्र की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा क्रियायोग को पुनर्जीवित करनेवाले गृहस्थ संत श्यामाचरण लाहिड़ी जी के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं शिक्षाओं का वर्णन इस लेख में प्रस्तुत है।

lahiri mahasaya
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lahiri mahasaya की जीवनी

लाहिड़ी महाशय का जन्म 30 सितंबर 1828 ई0 को बंगाल के नदिया जिले में स्थित घुरणी ग्राम में एक धर्मपरायण ब्राम्हण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री गौरमोहन लाहिड़ी और माता का नाम श्रीमती मुक्तकाशी था। उनकी माता का देहांत बचपन में ही हो गया था।
उनका बचपन घुरणी ग्राम में ही बीता। चार पांच वर्ष की अवस्था मे ही वह बालू में अपना पूरा शरीर अंदर कर केवल सर बाहर कर के एक विशिष्ट योगासन में बड़ी देर तक बैठे रहते थे।

सन 1833 में उनके पिता जी काशी में आकर बस गए। लाहिड़ी जी ने काशी में ही संस्कृत, उर्दू, बंगाली, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा की पढ़ाई की। श्यामाचरण दयालु, विनम्र और साहसी स्वभाव के थे। उनका शरीर सुडौल, स्वस्थ और बलिष्ठ था।

सन 1846 में श्री देवनारायण सान्याल की पुत्री काशीमणि से उनका विवाह हुआ। इस विवाह से उन्हें दो पुत्रों और दो पुत्रियों की प्राप्ति हुई।
1851ई0 में लाहिड़ी महाशय 23 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार के मिलिटरी इंजीनियरिंग विभाग में लेखापाल के पद पर नियुक्त हुए। अपने सेवाकाल में इन्हें कई बार पदोन्नति मिली।

इस विभाग में समय समय पर उनके कई बार स्थानांतरण भी हुए। 33 वर्ष की आयु में सन 1861 में उनका ट्रांसफर रानीखेत हुआ। वहीं उन्हें उनके गुरु महावतार बाबा मिले।


बाबा ने उन्हें बताया कि उनकी प्रेरणा से ही लाहिड़ी महाशय का ट्रांसफर रानीखेत में हुआ है। उन्होंने कहा ” लाहिड़ी, तुम्हारी पिछले जन्म की साधना शेष रह गयी थी। जिसे अब पूर्ण करने का समय आ गया है।


यहां उनके गुरु महावतार बाबा का संछिप्त परिचय देना आवश्यक है। महावतार बाबा 35 साल के तेजस्वी युवक की तरह दिखते हैं। कई बड़े साधकों के द्वारा उनके बारे में समय समय पर प्रकाश डाला गया है।

परमहंस योगानंद की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक योगीकथामृत जो कि एन ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी का हिंदी रूपांतरण है उसमें उनका विस्तृत विवरण है। पुस्तक में कहा गया है कि वे कई युगों से विद्यमान हैं और उच्च कोटि के साधकों को दर्शन और मार्गदर्शन देते हैं।

उन्हीं महावतार बाबा के द्वारा लाहिड़ी महाशय को क्रियायोग की दीक्षा दी गयी। क्रियायोग के विषय में कहा गया है कि यह योग की एक अत्यंत उत्कृष्ट विधा है, जो कि बहुत पूर्व ही लुप्त हो गयी थी।


श्रीकृष्ण के गीता के उपदेश में भी क्रियायोग का उल्लेख मिलता है। क्रियायोग की साधना से मनुष्य प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है। जिसके बाद वह कुछ भी करने में समर्थ हो जाता है।

लाहिड़ी महाशय के अनुरोध पर उनके गुरु ने उन्हें यह गुप्त विद्या सभी जिज्ञासु मनुष्यों को प्रदान करने की अनुमति दी थी। साथ ही उन्हें गृहस्थ जीवन में रहकर समाज के मार्गदर्शन और योग प्रचार का दायित्व सौपा था।


गुरु की कृपा से ही अगले दिन उनका ट्रांसफर पुनः उनके पूर्व स्थान पर हो गया। उसके बाद वे आजीवन क्रियायोग के द्वारा समाज का कल्याण करते रहे। उन्होंने साधारण मनुष्यों को भी क्रियायोग की दीक्षा दी। उनके कई शिष्य उच्च आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त कर योगसाधना के क्षेत्र में प्रसिद्ध हुए।

लाहिड़ी महाशय का व्यक्तित्व

योगी श्यामाचरण लाहिड़ी बहुत विनम्र और मिलनसार स्वभाव के थे। इतने बड़े योगी होकर भी वे जिस सहजता से लोगों से मिलते थे. उसे देखकर मिलने वाला उनसे प्रभावित हो जाता था। इसी वजह से लोग उन्हें लाहिड़ी महाशय कहने लगे थे। वे लोगों को अपने पैर छूने से रोक देते थे। कभी कभी वो मिलने वाले के पैर खुद ही छू लेते थे।
उनके शिष्यों में यह प्रसिद्ध था कि वे कभी किसी को डांटते नहीं थे। कड़वी बातें भी वे इतने मृदु ढंग से कह देते थे कि कोई बुरा नहीं मानता था।

कृतित्व- lahiri mahashay

उन्होंने मुक्तभाव से लोगों को दुर्लभ क्रियायोग की दीक्षा दी। उनके शिष्यों में सभी धर्मों के लोग थे। उन्होंने कभी जाति, धर्म, भाषा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया। उनके शिष्यों में बड़ी संख्या में महिलाएँ भी थीं। यहां तक कि परमहंस योगानंद जी के पिता भी लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे।

योगानंद जी के गुरु युक्तेश्वरगिरी भी योगी श्यामाचरण लाहिड़ी के ही शिष्य थे। उनके शिष्यों में काशी के प्रख्यात स्वामी भास्करानंद सरस्वती तथा देवघर के अत्यंत उच्च कोटि के तपस्वी बालानंद ब्रम्हचारी भी थे। काशी के महाराजा और उनके पुत्र भी लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे।

आध्यात्मिक कर्तव्यों के अलावा शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने कई कार्य किये। काशी के कई घरों में उन्होंने छोटी छोटी पाठशालाएँ खुलवाई। साप्ताहिक सभाओं में जो बाद में “गीता सभा” के नाम से प्रतिष्ठित हुईं, उनमें वे अनेक जिज्ञासुओं को शास्त्रों का अर्थ समझाते थे।

श्यामाचरण लाहिड़ी जी की शिक्षाएँ – lahiri mahasaya quotes

लाहिड़ी महाशय कहते थे “यह याद रखो की तुम किसी के नहीं हो और कोई तुम्हारा नहीं है। इस पर विचार करो कि किसी दिन तुम्हे इस संसार का सब कुछ छोड़ कर चल देना है। इसलिए अभी से ईश्वर को जान लो।”

ईश्वरानुभूति के गुब्बारे में प्रतिदिन उड़कर मृत्यु की भावी सूक्ष्म यात्रा के लिए अपने को तैयार करो। माया के प्रभाव में तुम अपने को हाड़ मांस की गठरी मान रहे हो। यही दुखों का कारण है।

अनवरत ध्यान करो। जिससे तुम अपने आप को और अपनी अन्तर्निहित शक्तियों को पहचान सको। अपने अंदर स्थित ईश्वर को पहचान सको। क्रिया योग की गुप्त कुंजी के द्वारा देह कारागार से मुक्त होकर परमतत्व में भाग निकलना सीखो।”

वे कहते थे “मुसलमान को प्रतिदिन पांच बार नमाज पढ़नी चाहिये। हिन्दू को दिन में कई बार ध्यान में बैठना चाहिए। ईसाई को रोज घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना करके बाइबिल का पाठ करना चाहिए।”

वे कहते ” केवल वही बुद्धिमान है जो प्राचीन दर्शन का केवल पठन पाठन करने के बजाय उनकी अनुभूति करने का प्रयास करता है।”

उनका स्वयं का जीवन भी उन लोगों के लिए शिक्षाप्रद था। जो यह कहते हैं कि नौकरी, व्यवसाय और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बाद आध्यात्मिक साधना के लिए समय ही कहाँ बचता है।


उन्होंने ऐसे लोगों के सामने अपने स्वयं के जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए साधना के उच्चतम शिखर को स्पर्श किया।

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योगी श्यामाचरण लाहिड़ी के चमत्कार- shyama charan lahiri mirecles

लाहिड़ी जी के चमत्कारों की संख्या इतनी अधिक है कि सबका वर्णन करना संभव नहीं है। तथापि कुछ घटनाओं का वर्णन दिया जा रहा है।
एक बार लाहिड़ी महाशय अपने शिष्यों को गीता का रहस्य समझा रहे थे। अचानक वह हांफते हुए चिल्ला उठे- “जापान के समुद्र तट के पास मैं अनेक लोगों के शरीर के माध्यम से डूब रहा हूँ।”
कुछ दिन बाद समाचारपत्रों में जापान के निकट समुद्र में एक जहाज में यात्रा कर रहे लोगों के डूबने का समाचार छपा।

lahiri mahasaya के शरीर में प्रायः सामान्य मानवों की भांति लक्षण नही दिखते थे। जैसे घण्टों तक बिना पलक झपकाए आंखों का खुला होना, नाड़ी और हृदय की धड़कन का रुका होना। महायोगी अपनी बैठक में कई कई दिनों तक एक ही आसन पर बैठे बैठे लोगों से मिलते रहते थे।
दिन रात उनके यहां मिलने वालों का तांता लगा रहता था। लेकिन कभी किसी ने उन्हें आराम करते या सोते नहीं देखा था।

परमहंस योगानन्द जी के गुरु श्री युक्तेश्वर जी ने योगी कथामृत में एक घटना का वर्णन किया है कि एक बार लाहिड़ी महाशय ने उनके एक मित्र को मृत्यु के लगभग चौबीस घण्टे बाद जीवित कर दिया था।


अपने सेवाकाल में एक बार एक अंग्रेज अधिकारी की बीमार पत्नी जो कि इंग्लैण्ड में थी, उसकी सूचना उसके पति को भारत में दे दी थी। कुछ माह बाद वह महिला जब अपने पति के पास आई। तो यहां लाहिड़ी महाशय को देखकर श्रद्धा से नत हो गयी। उसने बताया कि लाहिड़ी महाशय को उसने अपनी रोगशय्या के पास देखा था। उसी दिन से वह स्वस्थ हो गयी।

इस तरह के अनेकों चमत्कार योगी श्यामाचरण लाहिड़ी जी ने अपने जीवनकाल में किये थे। योगसाधना को जनसामान्य तक पहुंचाने वाले योगावतार महायोगी श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने 26 सितंबर 1895 को इस नश्वर देह को त्याग दिया। परन्तु उनकी यशगाथा चिरकाल तक भारत के आध्यात्मिक जगत का मार्गदर्शन करती रहेगी।

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