भारत सोने की चिड़िया

भारत सोने की चिड़िया सचमुच था?

भारत सोने की चिड़िया सचमुच था ?

भारत सोने की चिड़िया सचमुच था या नहीं यह बड़ा ही जटिल प्रश्न है. वर्तमान समय में भारत एक विकासशील देश है। आर्थिक रूप से समृद्ध देशों की तुलना में भारत बहुत पीछे है। यहां की 35 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे निवास करती है।
भारत सोने की चिड़िया
हमारे देशवासी अभी आधारभूत और मौलिक सुविधाओं के लिए संघर्षरत हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या हम हमेशा से ही गरीब रहे हैं या हमारी यह स्थिति बाद में हुई है?
     हम हमेशा से यह सुनते रहे हैं कि भारत को एक समय सोने की चिड़िया कहा जाता था। क्या यह सच है या केवल आत्मश्लाघा? हम इसी का तथ्यात्मक विश्लेषण करने का प्रयत्न करेंगे। आर्थिक इतिहासकार एंगस मेडिसन  के अनुसार पहली सदी से लेकर दसवीं सदी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी।
पहली सदी में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) सम्पूर्ण विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 32.9 प्रतिशत था। सन 1000 ई0 में यह 28.9 प्रतिशत और 1700 ई0 में 24.4 प्रतिशत था। इसका सीधा सा अर्थ है कि अंग्रेजों के आने के पहले भारत निःसंदेह सोने की चिड़िया था।
        अगर हम प्राचीन भारतीय इतिहास को देखें तो हमें तत्कालीन भारत के विशाल वैभव और समृद्धि का बोध होगा। चाहे वह सिंधु घाटी सभ्यता की नगरीय और व्यापार आधारित अर्थव्यवस्था हो या गुप्त और मौर्य कालीन अर्थव्यवस्था। भारत व्यापार, कुटीर उद्योग एवम कृषि के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी था।
मौर्य साम्राज्य के बाद के 1500 वर्षों तक राष्ट्रकूट, होयसल और गंग वंशों के कालखण्ड तक भारत हर प्रकार से विश्व में अग्रणी रहा। प्राचीन भारत से लेकर मध्ययुग की 17वीं शताब्दी तक विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित रहा। इसका एक उदाहरण यह है कि तत्कालीन विश्व की कुल सम्पत्ति का लगभग एक तिहाई से एक चौथाई भाग मराठों के पास था।
        आर्थिक इतिहासकार अंगस मैडिसन की पुस्तक द वर्ल्ड इकोनॉमी: ए मिलेनियम पर्सपेक्टिव के अनुसार – भारत विश्व का सबसे धनी देश था और 17वी शताब्दी तक विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था।
           सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का कारण भारत का व्यापार, कुटीर उद्योग और कृषि के क्षेत्र में अग्रणी होना था। भारत उद्योगों के क्षेत्र में अत्यंत समृद्ध था। भारतीय वस्तुओं की विदेशों में बहुत मांग थी। विशेषतः भारत के कपड़े विश्व के प्रायः हर देश में जाते थे। ढाका की मलमल विश्वप्रसिद्ध थी। यूरोपीय यात्रियों ने अपने यात्रावृत्तांत में इसकी भूरिभूरि प्रसंशा की है। कश्मीर के शाल, कम्बल और पश्मीना प्रसिद्ध थे।
बंगाल में सिल्क के कपडों और सिल्क निर्यात विदेशों को किया जाता था। इस प्रकार यूरोप के कपड़ों की मांग का बड़ा भाग भारत से निर्यात होता था। आभूषणों के निर्माण और उपयोग दोनों में भारत अग्रणी था। बहुमूल्य रत्नों का आयात विदेशों से होता था। इसके अलावा हमारे देश में भी दक्षिण भारत की खानों से हीरे आदिवरत्नों की खुदाई होती थी।
टेवेनियर हीरे का एक प्रसिद्ध व्यापारी था। उसने दक्षिण भारत की खानों का वर्णन किया है। इसके अलावा मुगल शासनकाल में कई विश्वप्रसिद्ध इमारतों का निर्माण हुआ। जिनमें लालकिला, ताजमहल आदि अनेक भवन हैं। बाबर के शब्दों में- मेरे यहाँ आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा कोल के भवनों के निर्माण में 1499 पत्थर काटने वाले प्रतिदिन कार्य करते थे। यह कथन तत्कालीन आर्थिक वैभव को परिलक्षित करता है। इससे भी पूर्व गुप्तकाल को भारत का स्वर्णकाल कहा जाता है। उस समय सोने के सिक्के सामान्य प्रचलन में थे।
         इसी वैभव को देखकर और भारतीय राजाओं की आपसी फूट को देखकर अनेक विदेशी लुटेरों ने भारत को लूटा। अंग्रेजों ने तो भारत का पूर्णतः शोषण और दोहन कर के भारत को आर्थिक रूप से खंडहर बना दिया। जिसके बाद भारत गरीबों का देश कहा जाने लगा। हम पूर्ण विकसित से गरीब और फिर विकासशील बन गए।
              इस प्रकार भारत न केवल ज्ञान विज्ञान में बल्कि आर्थिक रूप से भी विश्व का सिरमौर रहा है। परंतु तत्कालीन शासकों की अदूरदर्शिता और आपसी वैमनस्यतापूर्ण निर्णयों के कारण हम अर्श से फर्श पर आ गए।
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