janmashtami 2021-श्री कृष्ण जन्माष्टमी

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पूरे भारतवर्ष में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। janmashtami के अवसर पर लगभग हर घर में नंदगोपाल का जन्मोत्सव मनाया जाता है। सुंदर झांकियां सजाई जाती है। आज हम आपके लिए janmashtami 2021-श्री कृष्ण जन्माष्टमी नामक लेख लेकर आए हैं। जन्माष्टमी कैसे मनानी चाहिए? व्रत एवं पूजा की विधि क्या है? ऐसे सभी प्रश्नों का उत्तर इस लेख में देने का प्रयास करेंगे।

janmashtami
बाल कृष्ण

janmashtami क्या है?

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन व्रत, उपवास आदि करने की परंपरा है। रात्रि में सुंदर झांकियां सजाकर भगवान का जन्मदिन मनाया जाता है। यह पर्व भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में मनाया जाता है.

जन्माष्टमी क्यो मनाते हैं?

श्रीकृष्ण जी का जन्म हिन्दू पंचाग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। दिन बुधवार, रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि का समय था। इसीलिए प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्णजन्मोत्सव या janmashtami मनाया जाता है। भगवान कृष्ण हिंदुओं के आराध्य हैं। उन्होंने विश्व को कर्मयोग का अभूतपूर्व सिद्धान्त दिया।

तत्कालीन समय और आने वाले समाज को जीवन जीने के सही तरीके का ज्ञान उन्होंने दिया. उन्होंने बताया की जीवन में कर्म ही सबसे महत्वपूर्ण है. प्रत्येक मनुष्य अपने निर्धारित कर्म का पालन करते हुए भी आध्यात्मिकता के उच्चतम शिखर को प्राप्त कर सकता है. उन्होंने विश्व को गीता जैसा ज्ञान दिया। जो युगों युगों तक लोगों का पथप्रदर्शन करता रहेगा। अन्यायी और आतातायी लोगों का संहार किया।

इसीलिए उनके अनुयायी उनके जन्मदिवस को धूमधाम से मनाते हैं। इसलिए उनके जन्मदिवस को krishna janmashtami के रूप में मनाया जाता है.

श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2021 में कब है? janmashtami date in 2021

सन 2021 में जन्माष्टमी का पर्व 30 अगस्त को मनाया जाएगा जन्माष्टमी कब मनानी चाहिए? इसके संबंध में विभिन्न ग्रंथों में इस प्रकार वर्णन है-

अग्निपुराण के अनुसार “सप्तमी युक्त अष्टमी में व्रत नहीं रहना चाहिए।” पद्मपुराण में भी कहा गया है कि “सप्तमी से युक्त अष्टमी दूषित होती है।” अतः सप्तमी से युक्त अष्टमी नहीं मनानी चाहिए।

कौशतुभ, हेमाद्रि एवं माधव मत के अनुसार भी जिस दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक अष्टमी हो। उसी दिन जन्माष्टमी मनाना उत्तम है। पूर्ण रूप से अष्टमी न मिलने पर नवमी युक्त अष्टमी भी ग्राह्य है। मुख्यतः मध्यरात्रि में अष्टमी होनी चाहिए।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2021 का यह योग 30 अगस्त को बन रहा है। अतः इस बार janmashtami 30 अगस्त को ही मनाई जाएगी।

janmashtami व्रत का महत्व एवं फल

स्वयं श्रीकृष्ण जी युधिष्ठिर को इस व्रत का फल बताते हुए कहते हैं- इस दिन व्रत को करने से सात जन्म के पापों का नाश हो जाता है। इस व्रत के करने से संतानहीन दंपतियों को उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। मेरे जन्मोत्सव को विधिपूर्वक मनाने वाला व्यक्ति इस जन्म में सभी भोगों को भोगता है। मृत्यु उपरांत वह विष्णुलोक को प्राप्तकर मेरे सानिध्य में निवास करता है।

इस व्रत को करने वाले को स्त्री, पुत्र, धन-संपत्ति, ऐश्वर्य की कमी नहीं होती। वह सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है।

जन्माष्टमी- व्रत एवं पूजा विधि

व्रत से एक दिन पूर्व रात्रि में अल्पभोजन करे। ब्रह्मचर्य का पालन करे। भूमि अथवा तख्त पर शयन करे। janmashtami के दिन प्रातः काल उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नान करे। फिर ताम्रपात्र में जल लेकर इस प्रकार संकल्प करें-

ममाखिलपापप्रशमनपूर्वकसर्वाभीष्टसिद्धये श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रतमहं करिष्ये।

या हिंदी में अपना नाम गोत्र का उच्चारण करके “मैं सभी पापों से निवृत्ति के लिए और सभी मनोकामनाओं की सिद्धि के लिए श्री कृष्णजन्माष्टमी का व्रत करूंगा।”

इतना कहकर जल जमीन पर छोड़ दे। इसके बाद पूरा दिन नियम संयम पूर्वक रहे। कृष्ण जन्म के निमित्त एक कमरे में सूतिकागृह का निर्माण करे। कमरे को अच्छी प्रकार से सजाएं। उसमें बाल कृष्ण, बलराम, नंद, यशोदा, वासुदेव, देवकी, दुर्गा या कात्यायनी देवी के चित्र स्थापित करे। एक पलँग पर देवकी माता का श्रीकृष्ण को स्तनपान कराता हुआ चित्र स्थापित करे।

मध्यरात्रि में कृष्णजन्म के समय ढोल, मंजीरा आदि वाद्ययंत्रों के साथ भजन, सोहर आदि गीत गाते हुए भगवान के जन्म की खुशियां मनाए। चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, फल आदि से विधिवत माता देवकी और बालकृष्ण का पूजन करे।

उसके बाद माता देवकी और श्रीकृष्ण को ताम्रपात्र में जल, चन्दन आदि से अर्घ्य प्रदान करे। रोहिणी और चंद्रमा को भी अवश्य अर्घ्य प्रदान करे। पूजा के बाद उपस्थित सभी लोगों को प्रसाद वितरित करे। उसके बाद भजन, कीर्तन एवं श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का गान करते हुए जन्माष्टमी में रात्रिजागरण करे।

दूसरे दिन व्रत का पारण(भोजन) करे। इस विधि से व्रत करने से निश्चित ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

व्रत में क्या करना चाहिए और क्या नहीं? व्रत के नियम जानने के लिए अवश्य पढ़ें–

व्रत के नियम

जन्माष्टमी व्रत कथा

व्रत की कथा में श्रीकृष्ण जन्म एवं बाल लीलाओं को सुनना और सुनाना चाहिए।

मथुरा के राजा उग्रसेन बहुत धर्मात्मा थे। परंतु उनका पुत्र कंस अत्यंत दुष्ट और शक्तिशाली था। उसने अपने पिता को कारागार में डाल दिया और खुद राजा बन गया। उसके बाद वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा।

उसने अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को भी कारागार में डाल दिया। संसार को पाप और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान ने देवकी के गर्भ से अवतार लिया। जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ तो देवकी और वसुदेव की हथकड़ियां खुल गईं। पहरेदार सो गए और कारागार के ताले खुल गए।

कंस से पुत्र की रक्षा के लिए वसुदेव कृष्ण को एक टोकरी में रखकर यमुनापार गोकुल में नंद जी के यहां ले गए। वहां नंद की पत्नी यशोदा ने एक पुत्री को जन्म दिया था। वह प्रसवपीड़ा से बेसुध थीं। वसुदेव ने कृष्ण को उनके पास लिटाया और कन्या को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए। जब कंस को देवकी के पुत्र जन्म का समाचार मिला तो वह उसे मारने के लिए आया।

लेकिन कन्या उसके हाथ से निकल कर आकाश में चली गयी। साथ ही उसने भविष्यवाणी की कि उसका मारने वाला गोकुल में जन्म ले चुका है। तब कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए अनेक राक्षस गोकुल भेजे। लेकिन भगवान कृष्ण ने सबका वध कर दिया। गोकुल में उन्होंने अनेक लीलाएं कीं। उसके बाद मथुरा जाकर कंस का वध किया। उसके बाद महाराज उग्रसेन को पुनः राजा बनाया।

कालांतर में महाभारत के युद्ध में पांडवों की मदद की। यहीं पर अर्जुन को गीता का दिव्य ज्ञान प्रदान किया। युद्ध में पापियों का नाश करवाकर धर्म की स्थापना की।

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