कर्तव्यनिष्ठा- कहानी

दोस्तों हिंदी कहानियों की श्रृंखला में हम आज आपके लिए एक moral story कर्तव्यनिष्ठा- कहानी लेकर आये हैं। जो रोचक होने के साथ साथ नैतिक मूल्यों के महत्व को दर्शाती है।

कर्तव्यनिष्ठा- कहानी

एक राजा था। एक बार उसने अपने मंत्री से कहा कि मुझे एक योग्य व्यक्ति की जरूरत है। अगर तुम्हें कोई सही लगे तो उसे लेकर आना। मंत्री ने खोज शुरू की। बहुत खोजबीन के बाद एक युवक मंत्री को जंचा। उसका नाम सुमंत्र था।

वह युवक एक अच्छी नौकरी कर रहा था। मंत्री ने उसे राजा के यहां उससे भी अच्छे काम का आश्वासन देकर नौकरी छुड़ा दी। वह सुमंत्र को लेकर राजा के पास पहुंचा।

मंत्री ने राजा से कहा, “महाराज, आपके कथनानुसार मैं एक युवक खोजकर लाया हूँ। यह आपके कार्य के लिए पूर्णतः योग्य है।” लेकिन राजा भूल चुका था कि उसे किस कार्य के लिए एक व्यक्ति की आवश्यकता थी।

उसने मंत्री से कहा, “तब मुझे किसी कार्य के लिए एक व्यक्ति की आवश्यकता रही होगी। लेकिन अब मुझे वह बात याद नहीं।” तब मंत्री बोला, “महाराज, मैं इस युवक की नौकरी छुड़ा कर लाया हूँ। अब यह क्या करेगा ?”

कर्तव्यनिष्ठा- कहानी
कर्तव्यनिष्ठा- कहानी

इस पर राजा ने कहा, “ठीक है, मैं इसे अपने कार्यालय में नौकरी दे देता हूँ। वैसे भी काफी समय से कार्यालय में कोई मुलाजिम नहीं है।” मंत्री ने संतुष्टि से हामी भरी और सुमन्त्र को लेकर कार्यालय पहुंचा।

कार्यालय की हालत देखकर मंत्री दंग गया। वह पूरी तरह से कबाड़घर बना हुआ था। उसकी हालत देखकर कहीं से नहीं लगता था कि यह शाही कार्यालय है। मंत्री को बड़ी निराशा हुई।

उसने सुमन्त्र से क्षमा मांगी। लेकिन सुमन्त्र को दुख नही हुआ। उसने मंत्री से कहा, “आप मेरे लिए दुखी मत हो। मुझे यह काम पसंद है। इस काम के माध्यम से मैं अपने राजा की सेवा कर सकता हूँ। आप निश्चिंत होकर जाइये।”

मंत्री के जाने के बाद सुमन्त्र ने कार्यालय का निरीक्षण किया। उसने देखा कि कार्यालय में बेकार शाही पत्रों का ढेर लगा हुआ है। जो राजा को अलग अलग राज्यों और व्यापारियों द्वारा भेजे गए थे।

उसने पूरे कार्यालय की अच्छी तरह से साफ सफाई की। उसने सारे पत्रों को एक जगह इकठ्ठा किया। उन पत्रों में सोने के धागे की कसीदाकारी थी। सुमन्त्र ने एक कारीगर लगाकर सारे सोने के धागे निकलवा लिए।

उन धागों को एक सोने की दुकान पर बेच दिया। इससे उसे काफी रुपये मिल गए। उसने बेचे गए सोने के धागों की पक्की रसीद भी ली। उसके बाद उसने उन पैसों से कार्यालय के लिए फर्नीचर और अन्य स्टेशनरी खरीद लिया। सारे समान की उसने पक्की रसीद ली।

जो थोड़े पैसे बचे, उसे उसने कोषागार में जमा कर दिया और वहां से भी रसीद ले ली। अब कार्यालय का कायापलट हो चुका था। वह शाही कार्यालय जैसा दिखने लगा था। लेकिन दरबार के कुछ लोगों को सुमन्त्र का यह काम पसंद नहीं आया।

उन्होंने राजा से शिकायत करना शुरू किया कि नया कर्मचारी सरकारी धन उड़ा रहा है। कई लोगों से सुमन्त्र की शिकायत सुनकर एक दिन राजा सच्चाई जानने के लिए कार्यालय पहुंचे।

कार्यालय की हालत देखकर वह भी दंग रह गए। कार्यालय एकदम साफ सुथरा था। हर चीज व्यवस्थित थी साथ ही नए फर्नीचर और कार्यालय उपयोग की हर वस्तु वहां उपस्थित थी।

राजा ने थोड़ा गुस्से से पूछा, “यह सब खरीदारी तुमने कहाँ से की ?” सुमन्त्र ने सारी बात बताई और राजा को रसीदें भी दिखाईं। राजा बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने सुमन्त्र को राज्य का वित्तमंत्री बना दिया।

अब तो सुमन्त्र के विरोधियों को महान कष्ट हुआ। वे उसे राजा की नजरों में गिराने का मौका ढूंढने लगे। उन्होंने राजा से उसकी बुराई करने का सिलसिला और तेज कर दिया। उन्होंने कहा कि जब से सुमन्त्र वित्तमंत्री बना है, वह कोई काम नहीं करता। बस रास रंग में डूब गया है।

लगातार सुनते सुनते एक दिन राजा ने परीक्षा लेने का निर्णय लिया। रात के दो बजे उन्होंने सेनापति को बुलाया और कहा, “अभी इसी वक्त जाइये और राज्य के सारे मंत्रियों को यहां ले आइए। इस बात का ध्यान रखना कि जो जिस हालत में हो उसे उसी हालत में उठाकर लाना है।”

“यदि कोई बिस्तर पर सो रहा हो तो उसे बिस्तर सहित उठाकर लाना है। यदि कोई चौपड़ खेल रहा हो तो उसे उसे उसी हालत में ले आना है।” आज्ञा सुनकर सेनापति सैनिकों सहित चला गया।

लगभग एक घण्टे बाद राजा के सारे मंत्री एक विशेष कक्ष में उपस्थित थे। एक दो को छोड़कर सभी मंत्री नशे में थे। वित्तमंत्री सुमन्त्र धोती और बनियान पहने एक चौकी पर बैठे थे और दीपक के प्रकाश में कोई कागज देख रहे थे।

राजा ने उनसे पूछा, “इतनी रात में आप कौन सा हिसाब किताब देख रहे हैं, मन्त्रिवर।” वित्तमंत्री ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, “महाराज, राज्य के सुदूर क्षेत्र से इस बार के कर संग्रह के हिसाब में एक पैसा कम है। उसी को देख रहा हूँ।”

राजा ने अपने पास से एक पैसा देते हुए कहा, “लीजिए अपना हिसाब सही कर लीजिए और आराम कीजिये।” सुमन्त्र ने मुस्कुराते हुए विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “महाराज ! पैसा तो मैं भी मिला सकता हूँ। लेकिन यह देखना आवश्यक है कि कहीं यह किसी लापरवाही का नतीजा तो नहीं है। अन्यथा इससे अफसरों में कार्य के प्रति लापरवाही की भावना पैदा होगी।”

राजा सुमन्त्र की कर्तव्यनिष्ठा से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सुमन्त्र को राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया।

Moral- सीख

यह कहानी हमे सिखाती है कि कर्तव्यनिष्ठा, लगन और ईमानदारी के बल पर मनुष्य बड़ा से बड़ा पद प्राप्त कर सकता है। अपना काम सही ढंग से और पूरी ईमानदारी से करने वाले का विरोधी कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

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