kaka hathrasi- 10 प्रसिद्ध हास्य कविताएं

आज हम आपके लिए kaka hathrasi- 10 प्रसिद्ध हास्य कविताएं लेकर आये हैं। ये काका हाथरसी की हास्य- व्यंग्य की कविताएं जीवन की घटनाओं में हास्य उत्पन्न करती हैं। उनकी ये 10 प्रतिनिधि रचनाएँ बेहद प्रसिद्ध हैं।

kaka hathrasi- 10 प्रसिद्ध हास्य कविताएं

काका हाथरसी जीवन परिचय

काका हाथरसी का जन्म 18 सितम्बर 1906 को हाथरस में हुआ था। उनके पिता का नाम शिवलाल गर्ग और माता का नाम बर्फी देवी था। उनका नाम प्रभु गर्ग रखा गया। जन्म के कुछ समय बाद ही उनके पिता का निधन हो गया।

उनकी माताजी ने काका हाथरसी का पालन पोषण किया। सन 1946 में काका का पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। उसके बाद उनकी हास्य की कविताएं जनसामान्य में बहुत प्रसिद्ध हुईं। उनकी मृत्यु 18 सितम्बर सन 1995 को हुई।

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kaka hathrasi- हास्य कविताएं

1- नाम बड़े दर्शन छोटे

पहली कविता हिंदी जगत में अत्यंत प्रसिद्ध है। इस कविता में काका ने लोगों के नाम के विपरीत गुणों का वर्णन किया है। ये बेहद रोचक कविता है।

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर।
नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और॥
शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने।
बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने॥
कहं काका कवि, दयारामजी मारे मच्छर।
विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर॥

मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप।
श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप॥
जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट हैट में।
ज्ञानचंद छ्ह बार फेल हो गए टैंथ में॥
कह काका ज्वालाप्रसादजी बिल्कुल ठंडे।
पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे॥

देख, अशर्फीलाल के घर में टूटी खाट।
सेठ छदम्मीलाल के मील चल रहे आठ॥
मील चल रहे आठ, कर्म के मिटें न लेखे।
धनीरामजी हमने प्राय: निर्धन देखे॥
कह काका कवि, दूल्हेराम मर गए कंवारे।
बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बेचारे॥

दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल।
मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल॥
रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं।
ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भोंक रहे हैं॥
काका छ्ह फिट लंबे छोटूराम बनाए।
नाम दिगम्बरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए॥

पेट न अपना भर सके जीवन-भर जगपाल।
बिना सूंड के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल॥
मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज सम्हारी।
बैग कुली को दिया चले मिस्टर गिरिधारी॥
कहं ‘काका’ कविराय, करें लाखों का सट्टा॥
नाम हवेलीराम किराए का है अट्टा॥

दूर युद्ध से भागते, नाम रखा रणधीर।
भागचंद की आज तक सोई है तकदीर॥
सोई है तकदीर, बहुत-से देखे-भाले।
निकले प्रिय सुखदेव सभी, दु:ख देने वाले॥
कहं काका कविराय, आंकड़े बिल्कुल सच्चे।
बालकराम ब्रह्मचारी के बारह बच्चे॥

चतुरसेन बुद्धू मिले, बुद्धसेन निर्बुद्ध।
श्री आनन्दीलालजी रहें सर्वदा क्रुद्ध॥
रहें सर्वदा क्रुद्ध, मास्टर चक्कर खाते।
इंसानों को मुंशी, तोताराम पढ़ाते॥
कहं काका बलवीरसिंहजी लटे हुए हैं।
थानसिंह के सारे कपड़े फटे हुए हैं॥

बेच रहे हैं कोयला, लाला हीरालाल।
सूखे गंगारामजी, रूखे मक्खनलाल॥
रूखे मक्खनलाल, झींकते दादा-दादी।
निकले बेटा आसाराम निराशावादी॥
कहं काका कवि भीमसेन पिद्दी-से दिखते।
कविवर दिनकर छायावादी कविता लिखते॥

आकुल-व्याकुल दीखते शर्मा परमानंद।
कार्य अधूरा छोड़कर भागे पूरनचंद॥
भागे पूरनचंद, अमरजी मरते देखे।
मिश्रीबाबू कड़वी बातें करते देखे॥
कहं काका भण्डारसिंहजी रोते-थोते।
बीत गया जीवन विनोद का रोते-धोते॥

शीला जीजी लड़ रही, सरला करती शोर।
कुसुम, कमल, पुष्पा, सुमन निकलीं बड़ी कठोर॥
निकलीं बड़ी कठोर, निर्मला मन की मैली।
सुधा सहेली अमृतबाई सुनीं विषैली॥
कहं काका कवि, बाबू जी क्या देखा तुमने?
बल्ली जैसी मिस लल्ली देखी है हमने॥

तेजपालजी मौथरे, मरियल-से मलखान।
लाला दानसहाय ने करी न कौड़ी दान॥
करी न कौड़ी दान, बात अचरज की भाई।
वंशीधर ने जीवन-भर वंशी न बजाई॥
कहं काका कवि, फूलचंदनजी इतने भारी।
दर्शन करके कुर्सी टूट जाय बेचारी॥

खट्टे-खारी-खुरखुरे मृदुलाजी के बैन।
मृगनैनी के देखिए चिलगोजा-से नैन॥
चिलगोजा-से नैन, शांता करती दंगा।
नल पर न्हातीं गोदावरी, गोमती, गंगा॥
कहं काका कवि, लज्जावती दहाड़ रही है।
दर्शनदेवी लम्बा घूंघट काढ़ रही है॥

कलियुग में कैसे निभे पति-पत्नी का साथ।
चपलादेवी को मिले बाबू भोलानाथ॥
बाबू भोलानाथ, कहां तक कहें कहानी।
पंडित रामचंद्र की पत्नी राधारानी॥
काका लक्ष्मीनारायण की गृहणी रीता।
कृष्णचंद्र की वाइफ बनकर आई सीता॥

अज्ञानी निकले निरे, पंडित ज्ञानीराम।
कौशल्या के पुत्र का रक्खा दशरथ नाम॥
रक्खा दशरथ नाम, मेल क्या खूब मिलाया।
दूल्हा संतराम को आई दुलहिन माया॥
काका कोई-कोई रिश्ता बड़ा निकम्मा।
पार्वतीदेवी है शिवशंकर की अम्मा॥

पूंछ न आधी इंच भी, कहलाते हनुमान।
मिले न अर्जुनलाल के घर में तीर-कमान॥
घर में तीर-कमान, बदी करता है नेका।
तीर्थराज ने कभी इलाहाबाद न देखा॥
सत्यपाल काका की रकम डकार चुके हैं।
विजयसिंह दस बार इलैक्शन हार चुके हैं॥

सुखीरामजी अति दुखी, दुखीराम अलमस्त।
हिकमतराय हकीमजी रहें सदा अस्वस्थ॥
रहें सदा अस्वस्थ, प्रभु की देखो माया।
प्रेमचंद में रत्ती-भर भी प्रेम न पाया॥
कहं काका जब व्रत-उपवासों के दिन आते।
त्यागी साहब, अन्न त्यागकार रिश्वत खाते॥

रामराज के घाट पर आता जब भूचाल।
लुढ़क जायं श्री तख्तमल, बैठें घूरेलाल॥
बैठें घूरेलाल, रंग किस्मत दिखलाती।
इतरसिंह के कपड़ों में भी बदबू आती॥
कहं काका गंभीरसिंह मुंह फाड़ रहे हैं।
महाराज लाला की गद्दी झाड़ रहे हैं॥

दूधनाथजी पी रहे सपरेटा की चाय।
गुरू गोपालप्रसाद के घर में मिली न गाय॥
घर में मिली न गाय, समझ लो असली कारण।
मक्खन छोड़ डालडा खाते बृजनारायण॥
काका प्यारेलाल सदा गुर्राते देखे।
हरिश्चंद्रजी झूठे केस लड़ाते देखे॥

रूपराम के रूप की निन्दा करते मित्र।
चकित रह गए देखकर कामराज का चित्र॥
कामराज का चित्र, थक गए करके विनती।
यादराम को याद न होती सौ तक गिनती॥
कहं काका कविराय, बड़े निकले बेदर्दी।
भरतराम ने चरतराम पर नालिश कर दी॥

नाम-धाम से काम का क्या है सामंजस्य?
किसी पार्टी के नहीं झंडाराम सदस्य॥
झंडाराम सदस्य, भाग्य की मिटें न रेखा।
स्वर्णसिंह के हाथ कड़ा लोहे का देखा॥
कहं काका कंठस्थ करो, यह बड़े काम की।
माला पूरी हुई एक सौ आठ नाम की॥

2- पुलिस-महिमा- hasya kavita in hindi by kaka hathrasi

पुलिस वालों के क्रिया-कलाप और जनता पर उनके प्रभावका वर्णन इस कविता में व्यंग्यपूर्ण ढंग से किया गया है-

पड़ा – पड़ा क्या कर रहा , रे मूरख नादान।
दर्पण रख कर सामने , निज स्वरूप पहचान॥
निज स्वरूप पहचान , नुमाइश मेले वाले।
झुक – झुक करें सलाम , खोमचे – ठेले वाले॥
कहँ काका कवि , सब्ज़ी – मेवा और इमरती।
चरना चाहे मुफ़्त , पुलिस में हो जा भरती॥

कोतवाल बन जाये तो , हो जाये कल्यान।
मानव की तो क्या चले , डर जाये भगवान॥
डर जाये भगवान , बनाओ मूँछे ऐसीं।
इँठी हुईं , जनरल अयूब रखते हैं जैसीं॥
कहँ काका जिस समय करोगे धारण वर्दी।
ख़ुद आ जाये ऐंठ – अकड़ – सख़्ती – बेदर्दी॥

शान – मान – व्यक्तित्व का करना चहो विकास।
गाली देने का करो , नित नियमित अभ्यास॥
नित नियमित अभ्यास , कंठ को कड़क बनाओ।
बेगुनाह को चोर , चोर को शाह बताओ॥
काका सीखो रंग ढंग पीने खाने के।
रिश्वत लेना पाप लिखा बाहर थाने के॥

3-सुरा समर्थन

प्रस्तुत कविता में काका हाथरसी ने शराब की महत्ता का व्यंग्यपूर्ण वर्णन किया है। यह भी उनकी उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है-

भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान।
देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान॥
किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर।
जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं कायर॥
कहँ काका कवि बच्चन ने पीकर दो प्याला।
दो घंटे में लिख डाली, पूरी मधुशाला॥

भेदभाव से मुक्त यह, क्या ऊँचा क्या नीच।
अहिरावण पीता इसे, पीता था मारीच॥
पीता था मारीच, स्वर्ण- मृग रूप बनाया।
पीकर के रावण सीता जी को हर लाया॥
कहँ काका कविराय, सुरा की करो न निंदा।
मधु पीकर के मेघनाद पहुँचा किष्किंधा॥

ठेला हो या जीप हो, अथवा मोटरकार।
ठर्रा पीकर छोड़ दो, अस्सी की रफ़्तार॥
अस्सी की रफ़्तार, नशे में पुण्य कमाओ।
जो आगे आ जाये, स्वर्ग उसको पहुँचाओ॥
पकड़ें यदि सार्जेंट, सिपाही ड्यूटी वाले।
लुढ़का दो उनके भी मुँह में, दो चार पियाले॥

पूरी बोतल गटकिये, होय ब्रह्म का ज्ञान।
नाली की बू, इत्र की खुशबू एक समान॥
खुशबू एक समान, लड़्खड़ाती जब जिह्वा।
‘डिब्बा’ कहना चाहें, निकले मुँह से दिब्बा॥
कहँ काका कविराय, अर्ध-उन्मीलित अँखियाँ।
मुँह से बहती लार, भिनभिनाती हैं मखियाँ॥

प्रेम-वासना रोग में, सुरा रहे अनुकूल।
सैंडिल-चप्पल-जूतियां, लगतीं जैसे फूल॥
लगतीं जैसे फूल, धूल झड़ जाये सिर की।
बुद्धि शुद्ध हो जाये, खुले अक्कल की खिड़की॥
प्रजातंत्र में बिता रहे क्यों जीवन फ़ीका।
बनो पियक्कड़चंद स्वाद लो आज़ादी का॥

एक बार मद्रास में देखा जोश-ख़रोश।
बीस पियक्कड़ मर गये, तीस हुये बेहोश॥
तीस हुये बेहोश, दवा दी जाने कैसी।
वे भी सब मर गये, दवाई हो तो ऐसी॥
चीफ़ सिविल सर्जन ने केस कर दिया डिसमिस।
पोस्ट मार्टम हुआ, पेट में निकली वार्निश॥

4- स्त्रीलिंग, पुल्लिंग- kaka hathrasi ki kavita

काका जी की यह कविता भी अत्यंत प्रसिद्ध है। इसमें उन्होंने व्याकरण के पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्द प्रयोग के द्वारा हास्य का सुंदर सृजन किया है-

काका से कहने लगे ठाकुर ठर्रा सिंग,
दाढ़ी स्त्रीलिंग है, ब्लाउज़ है पुल्लिंग।

ब्लाउज़ है पुल्लिंग, भयंकर ग़लती की है,
मर्दों के सिर पर टोपी पगड़ी रख दी है।

कह काका कवि पुरूष वर्ग की क़िस्मत खोटी,
मिसरानी का जूड़ा, मिसरा जी की चोटी।

दुल्हन का सिन्दूर से शोभित हुआ ललाट,
दूल्हा जी के तिलक को रोली हुई अलॉट।

रोली हुई अलॉट, टॉप्स, लॉकेट, दस्ताने,
छल्ला, बिछुआ, हार, नाम सब हैं मर्दाने।

पढ़ी लिखी या अपढ़ देवियाँ पहने बाला,
स्त्रीलिंग ज़ंजीर गले लटकाते लाला।

लाली जी के सामने लाला पकड़ें कान,
उनका घर पुल्लिंग है, स्त्रीलिंग दुकान।

स्त्रीलिंग दुकान, नाम सब किसने छाँटे,
काजल, पाउडर, हैं पुल्लिंग नाक के काँटे।

कह काका कवि धन्य विधाता भेद न जाना,
मूँछ मर्दों को मिली, किन्तु है नाम जनाना।

ऐसी-ऐसी सैंकड़ों अपने पास मिसाल,
काकी जी का मायका, काका की ससुराल।

काका की ससुराल, बचाओ कृष्णमुरारी,
उनका बेलन देख काँपती छड़ी हमारी।

कैसे जीत सकेंगे उनसे करके झगड़ा,
अपनी चिमटी से उनका चिमटा है तगड़ा।

मन्त्री, सन्तरी, विधायक सभी शब्द पुल्लिंग,
तो भारत सरकार फिर क्यों है स्त्रीलिंग?

क्यों है स्त्रीलिंग, समझ में बात ना आती,
नब्बे प्रतिशत मर्द, किन्तु संसद कहलाती।

काका बस में चढ़े हो गए नर से नारी,
कण्डक्टर ने कहा आ गई एक सवारी।

5- एअर कंडीशन नेता

आजकल के नेताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व को बताती यह कविता काका के राजनीतिक व्यंग्य का सटीक उदाहरण है-

वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय।
काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय॥

मैं अपनी त्याग-तपस्या से जनगण को मार्ग दिखाता हूँ।
है कमी अन्न की इसीलिए चमचम-रसगुल्ले खाता हूँ॥

गीता से ज्ञान मिला मुझको, मँज गया आत्मा का दर्पण।
निर्लिप्त और निष्कामी हूँ, सब कर्म किए प्रभु के अर्पण॥

आत्मोन्नति के अनुभूत योग, कुछ तुमको आज बताऊँगा।
हूँ सत्य-अहिंसा का स्वरूप, जग में प्रकाश फैलाऊँगा॥

आई स्वराज की बेला तब, सेवा-व्रत हमने धार लिया।
दुश्मन भी कहने लगे दोस्त! मैदान आपने मार लिया॥

जब अंतःकरण हुआ जाग्रत, उसने हमको यों समझाया।
आँधी के आम झाड़ मूरख क्षणभंगुर है नश्वर काया॥

गृहणी ने भृकुटी तान कहा-कुछ अपना भी उद्धार करो।
है सदाचार क अर्थ यही तुम सदा एक के चार करो॥

गुरु भ्रष्टदेव ने सदाचार का गूढ़ भेद यह बतलाया।
जो मूल शब्द था सदाचोर, वह सदाचार अब कहलाया॥

गुरुमंत्र मिला आई अक्कल उपदेश देश को देता मैं।
है सारी जनता थर्ड क्लास, एअरकंडीशन नेता मैं॥

जनता के संकट दूर करूँ, इच्छा होती, मन भी चलता।
पर भ्रमण और उद्घाटन-भाषण से अवकाश नहीं मिलता॥

आटा महँगा, भाटे महँगे, महँगाई से मत घबराओ।
राशन से पेट न भर पाओ, तो गाजर शकरकन्द खाओ॥

ऋषियों की वाणी याद करो, उन तथ्यों पर विश्वास करो।
यदि आत्मशुद्धि करना चाहो, उपवास करो, उपवास करो॥

दर्शन-वेदांत बताते हैं, यह जीवन-जगत अनित्या है।
इसलिए दूध, घी, तेल, चून, चीनी, चावल, सब मिथ्या है॥

रिश्वत अथवा उपहार-भेंट मैं नहीं किसी से लेता हूँ।
यदि भूले भटके ले भी लूँ तो कृष्णार्पण कर देता हूँ॥

ले भाँति-भाँति की औषधियाँ, शासक-नेता आगे आए।
भारत से भ्रष्टाचार अभी तक दूर नहीं वे कर पाए॥

अब केवल एक इलाज शेष, मेरा यह नुस्खा नोट करो।
जब खोट करो, मत ओट करो, सब कुछ डंके की चोट करो॥

6- सारे जहाँ से अच्छा

देश की हालत का हास्य- व्यंग्य पूर्ण सटीक वर्णन किया है प्रस्तुत कविता में-

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा,
हम भेड़-बकरी इसके यह गड़रिया हमारा।

सत्ता की खुमारी में, आज़ादी सो रही है,
हड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही है।
लेकर के कर्ज़ खाओ यह फर्ज़ है तुम्हारा,
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा।

चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैं,
ईमान के मुसाफिर राशन को तरशते हैं।
वोटर से वोट लेकर वे कर गए किनारा,
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा।

जब अंतरात्मा का मिलता है हुक्म काका,
तब राष्ट्रीय पूँजी पर वे डालते हैं डाका।
इनकम बहुत ही कम है होता नहीं गुज़ारा,
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा।

हिन्दी के भक्त हैं हम, जनता को यह जताते,
लेकिन सुपुत्र अपना कांवेंट में पढ़ाते।
बन जाएगा कलक्टर देगा हमें सहारा,
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा।

फ़िल्मों पे फिदा लड़के, फैशन पे फिदा लड़की,
मज़बूर मम्मी-पापा, पॉकिट में भारी कड़की।
बॉबी को देखा जबसे बाबू हुए अवारा,
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा।

जेवर उड़ा के बेटा, मुम्बई भागता है,
ज़ीरो है किंतु खुद को हीरो से नापता है।
स्टूडियो में घुसने पर गोरखा ने मारा,
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा।

7- कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ- kaka hathrasi

आजकल लोगों की सोच बदलती जा रही है। केवल दिखावे के प्रचलन बढ़ रहा है। इसी का वर्णन करती है यह कविता-

प्रकृति बदलती क्षण-क्षण देखो,
बदल रहे अणु, कण-कण देखो|
तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो |
भाग्य वाद पर अड़े हुए हो|

छोड़ो मित्र ! पुरानी डफली,
जीवन में परिवर्तन लाओ |
परंपरा से ऊंचे उठ कर,
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

जब तक घर मे धन संपति हो,
बने रहो प्रिय आज्ञाकारी |
पढो, लिखो, शादी करवा लो ,
फिर मानो यह बात हमारी |

माता पिता से काट कनेक्शन,
अपना दड़बा अलग बसाओ |
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

करो प्रार्थना, हे प्रभु हमको,
पैसे की है सख़्त ज़रूरत |
अर्थ समस्या हल हो जाए,
शीघ्र निकालो ऐसी सूरत |

हिन्दी के हिमायती बन कर,
संस्थाओं से नेह जोड़िये |
किंतु आपसी बातचीत में,
अंग्रेजी की टांग तोड़िये |

इसे प्रयोगवाद कहते हैं,
समझो गहराई में जाओ |
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

कवि बनने की इच्छा हो तो,
यह भी कला बहुत मामूली |
नुस्खा बतलाता हूँ, लिख लो,
कविता क्या है, गाजर मूली |

कोश खोल कर रख लो आगे,
क्लिष्ट शब्द उसमें से चुन लो|
उन शब्दों का जाल बिछा कर,
चाहो जैसी कविता बुन लो |

श्रोता जिसका अर्थ समझ लें,
वह तो तुकबंदी है भाई |
जिसे स्वयं कवि समझ न पाए,
वह कविता है सबसे हाई |

इसी युक्ति से बनो महाकवि,
उसे नई कविता बतलाओ |
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

चलते चलते मेन रोड पर,
फिल्मी गाने गा सकते हो |
चौराहे पर खड़े खड़े तुम,
चाट पकोड़ी खा सकते हो |

बढ़े चलो उन्नति के पथ पर,
रोक सके किस का बल बूता?
यों प्रसिद्ध हो जाओ जैसे,
भारत में बाटा का जूता |

नई सभ्यता, नई संस्कृति,
के नित चमत्कार दिखलाओ |
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ |

पिकनिक का जब मूड बने तो,
ताजमहल पर जा सकते हो |
शरद-पूर्णिमा दिखलाने को,
‘उन्हें’ साथ ले जा सकते हो |

वे देखें जिस समय चंद्रमा,
तब तुम निरखो सुघर चाँदनी |
फिर दोनों मिल कर के गाओ,
मधुर स्वरों में मधुर रागिनी |
तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी ..

आलू छोला, कोका-कोला,
‘उनका’ भोग लगा कर पाओ |
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ|

8-कालिज स्टूडैंट

छोटे गांव कस्बों से पढ़ने के लिए शहर आये लड़के किस तरह से बिगड़ रहे हैं। इसका वर्णन इस कविता में काका हाथरसी ने किया है-

फादर ने बनवा दिये तीन कोट, छै पैंट,
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट, हुए होस्टल में भरती,
दिन भर बिस्कुट चरें, शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय, बुद्धि पर डाली चादर,
मौज कर रहे पुत्र, हडि्डयां घिसते फादर।

पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं, दिन भर खेलो खेल,
होते रहु दो साल तक फर्स्ट इयर में फेल।
फर्स्ट इयर में फेल, जेब में कंघा डाला,
साइकिल ले चल दिए, लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय, गेटकीपर से लड़कर,
मुफ़्त सिनेमा देख, कोच पर बैठ अकड़कर।

प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल,
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल, चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें काका कवि राय, भयंकर तुमको देता,
बन सकते हो इसी तरह बिगड़े दिल नेता।

9- व्यर्थ

भोगवाद के जीवन पर व्यंग्य करती यह कविता उनकी प्रतिनिधि रचनाओं में से एक है-

काका या संसार में, व्यर्थ भैंस अरु गाय ।
मिल्क पाउडर डालकर पी लिपटन की चाय ॥
पी लिपटन की चाय साहबी ठाठ बनाओ ।
सिंगल रोटी छोड़ डबल रोटी तुम खाओ ॥

कहँ काका कविराय, पैंट के घुस जा अंदर ।
देशी बाना छोड़ बनों अँग्रेजी बन्दर ॥
जप-तप-तीरथ व्यर्थ हैं, व्यर्थ यज्ञ औ योग ।
करज़ा लेकर खाइये नितप्रति मोहन भोग ॥

नितप्रति मोहन भोग, करो काया की पूजा ।
आत्मयज्ञ से बढ़कर यज्ञ नहीं है दूजा ॥
कहँ काका कविराय, नाम कुछ रोशन कर जा ।
मरना तो निश्चित है करज़ा लेकर मर जा॥

10- चोरी की रपट- kaka hathrasi

पुलिस व्यवस्था और घूसखोरी पर तगड़ा व्यंग करती काका की यह कविता –

घूरे खाँ के घर हुई चोरी आधी रात ।
कपड़े-बर्तन ले गए छोड़े तवा-परात ॥
छोड़े तवा-परात, सुबह थाने को धाए ।
क्या-क्या चीज़ गई हैं सबके नाम लिखाए ॥

आँसू भर कर कहा महरबानी यह कीजै ।
तवा-परात बचे हैं इनको भी लिख लीजै ॥
कोतवाल कहने लगा करके आँखें लाल ।
उसको क्यों लिखवा रहा नहीं गया जो माल ॥

नहीं गया जो माल, मियाँ मिमियाकर बोला ।
मैंने अपना दिल हुज़ूर के आगे खोला ॥
मुंशी जी का इंतजाम किस तरह करूँगा ।
तवा-परात बेचकर रपट लिखाई दूँगा ॥

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