हिंदी कहानी- पद की गरिमा

मोरल स्टोरी- पद की गरिमा

मोरल स्टोरी- पद की गरिमा। moral story

मोरल स्टोरी- पद की गरिमा एक motivational story है जो हमें पद के महत्व को समझाती है। ऐसी हिंदी कहानियां हमारा मनोरंजन करने के साथ-साथ हमें शिक्षा भी प्रदान करती हैं।

मोरल स्टोरी- पद की गरिमा
हिंदी कहानी- पद की गरिमा

मोरल स्टोरी- पद की गरिमा । moral story

राजा भोज धारा नगरी के राजा थे। वे बड़े दयालु, विद्वान, कलापारखी और स्वयं भी कई कलाओं में पारंगत थे। उनके दरबार में विद्वानों और कलाकारों का बहुत सम्मान होता था।

एक बार उनके दरबार में एक बहुरूपिया आया। वह तरह तरह के रूप धारण करने में पारंगत था। उसने राजा से पांच रुपये दान देने की प्रार्थना की।

राजा भोज ने उसे दान देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि वे कलाकारों को दान नहीं देते। बल्कि वे उनकी कला देखकर उन्हें पुरस्कार देते हैं। अगर वह अपनी कला का प्रदर्शन करे तो उसे पुरस्कार मिल सकता है।

बहुरूपिये ने राजा से अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए तीन दिन का समय मांगा। राजा ने उसे समय देते हुए कहा कि ठीक तीन दिन बाद वह दरबार में अपनी कला का प्रदर्शन करे।

अगले दिन राज्य की सीमा पर एक साधू का आगमन हुआ। साधू ने एक पेड़ के नीचे अपना आसन जमाया और ध्यानमग्न होकर बैठ गया। वहां गाय चरा रहे कुछ चरवाहों ने साधू को देखा।

वे साधू के पास गए और साधू से बोले, “महाराज ! यहां जंगल में आप क्यों बैठे हैं ? नगर में चलिए। वहां आपके भोजन और रहने की उचित व्यवस्था हो जाएगी। यहां आपको कुछ नहीं मिलेगा। जंगली जानवरों का भय अलग लगा रहेगा।”

साधू मौन ध्यानमग्न बैठा रहा। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। चरवाहों ने साधू से बार बार आग्रह किया। लेकिन साधू ने आंखें नहीं खोलीं। थक हारकर चरवाहे नगर में लौट गए।

नगर में उन्होंने उस विचित्र साधू के बारे में लोगों को बताया। अगले दिन साधू के पास लोगों का जमावड़ा लग गया। लोग उसके लिए तरह तरह के उपहार और फल फूल लेकर पहुंचे। लेकिन साधू ने आंखें नहीं खोली।

उस साधू की खबर जब नगर के व्यापारी और धनाढ्य लोगों को लगी तो वे भी सोना चांदी और धन लेकर साधू के पास गए कि शायद साधू आंख खोल कर उन्हें आशीर्वाद दे दे। लेकिन साधू ने फिर भी आंखें नहीं खोलीं।

यहां तक कि राजा के प्रधानमंत्री ने भी वहां जाकर बहुत प्रयत्न किए लेकिन साधू का ध्यान नहीं टूटा। जब राजा भोज को पता चला तो वे भी ऐसे चमत्कारी साधू के दर्शन के लिए व्यग्र हो उठे।

राजा भोज अपनी रानियों के साथ बहुत सी अशर्फियों और हीरे जवाहरात के साथ साधू के दर्शन के लिए पहुंचे। उन्होंने सारा धन साधू के चरणों में रखकर उनसे आंखें खोलकर आशीर्वाद देने की प्रार्थना की।

लेकिन साधू ध्यानमग्न ही रहे। तब राजा ने कहा, ” आप एक बार आंखें खोलकर आशीर्वाद दे दीजिए। इसके बदले मैं अपना सारा खजाना आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।”

लेकिन साधू पर इस अपार धन वैभव का कोई असर नहीं हुआ। हारकर राजा भोज साधू को प्रणाम करके वापस लौट गए।

तीन दिन बीत चुके थे। आज बहुरूपिये को राजा के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करना था। नियत समय पर बहुरूपिया दरबार में उपस्थित हुआ। सभी लोग उससे कला के प्रदर्शन की अपेक्षा कर रहे थे।

लेकिन बहुरूपिया बोला, ” महाराज मुझे मेरा पुरस्कार दिया जाय।” तो राजा ने कहा, “तुमने अभी अपनी कला का प्रदर्शन तो किया नहीं तो तुम्हे पुरस्कार किस लिए दिया जाय ?”

बहुरूपिये ने हँसकर कहा, “महाराज! मैं अपनी कला का प्रदर्शन कर चुका हूँ। नगर के बाहर जिस साधू के दर्शन के लिए आप गए थे। वह मैं ही था।”

राजा यह सुनकर दंग रह गए। वे बहुरूपये की कला से बहुत प्रभावित हुए, साथ ही उसकी मूर्खता पर क्रोधित भी। राजा ने कहा, “मूर्ख! वहां तेरे सामने पूरे राज्य का खजाना रखा था। उसे तूने छुआ भी नहीं और यहां पांच रुपये का पुरस्कार मांग रहा है।”

बहुरूपिये ने राजा को उत्तर दिया, “महाराज! मैं उस समय साधू के वेश में था। उस समय मुझे सच्चे साधू की तरह आचरण करना था। मुझे साधू के वेश और पद की गरिमा का मान रखना था। यही सच्चे कलाकार की निशानी होती है। परंतु इस समय मैं एक बहुरूपिया हूँ और अपना ईनाम चाहता हूँ।”

राजा उसके जवाब से बहुत प्रसन्न हुए और उसे सौ अशर्फियाँ देकर विदा किया।

कहानी से सीख। Moral of story

मोरल स्टोरी- पद की गरिमा हमें सिखाती है कि हमें अपने वेश और पद की गरिमा का सदैव ध्यान रखना चाहिए।

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