75+ कबीरदास के दोहे- Kabir ke dohe

 

दोस्तों ! आज हम आपके लिए  75+ कबीरदास के दोहे- kabir ke dohe  नामक पोस्ट लेकर आए  हैं। कबीरदास जी भक्तिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से हैं। कबीरदास के दोहे जनसामान्य में खूब प्रचलित हैं। यहां तक कि एक अनपढ़ व्यक्ति भी कबीर के दोहे सुना देता है। कबीरदास के 75 प्रसिद्द दोहों का संग्रह अर्थसहित किया गया है।

क्योंकि उनके दोहे जीवन के लिए प्रेरणादायक हैं।वे हमारा परिचय जीवन की कड़वी सच्चाइयों से कराते हैं।कबीरदासजी पढ़े लिखे नहीं थे। एक जगह उन्होंने कहा है—

मसि कागज छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।

लेकिन उनके दोहों, भजनों का संग्रह उनके शिष्यों द्वारा किया गया है। कबीरदासजी निराकार ब्रम्ह के उपासक थे। अपने दोहों में उन्होंने सामाजिक बुराइयों, पाखण्ड आदि का घोर विरोध किया है। कबीरदास जी के 75 प्रसिद्ध दोहे (75 famous dohe of kabir) यहां पर अर्थ सहित प्रस्तुत हैं—

कबीरदास के दोहे
कबीरदास के दोहे

 

संक्षिप्त परिचय

 

नाम- कबीरदास
जन्म– 1455 विक्रमी
मृत्यु– 1575 विक्रमी
प्रमुख ग्रंथ– साखी, शबद, रमैनी।

 

75+Kabirdas ke dohe in hindi- कबीरदास के दोहे

 

दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।

जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥

अर्थ– दुख में ईश्वर का सुमिरन सभी करते हैं, लेकिन सुख में कोई नहीं करता। अगर सुख में सुमिरन कर लिया जाय तो दुख आएगा ही नहीं।

जंत्र – मंत्र सब झूठ है, मत भरमो जग कोय |

सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय ।।2।।

अर्थ- इस संसार में यन्त्र, मंत्र सब झूठ हैं। इनके चक्कर में मत पड़ो। सही तत्व को जाने बिना कौवा हंस नहीं बन सकता।

या दुनिया में आय के, छाड़ि दे तू ऐंठ |

लेना होय सो लेइ ले, उठी जात है पैंठ ||

अर्थ- इस दुनिया में आने के बाद अभिमान छोड़ देना चाहिए। संसार बस छूटने ही वाला है। इसलिए जो भी ग्रहण कर सकते हो कर लो।

या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत |

गुरु चरनन चित लाइये, जो पूरन सुख हेत ||

अर्थ- ये दुनिया दो दिनों की है। इससे प्रीति न करो। गुरु के चरणों में मन लगाओ। जिससे सच्चा और पूर्ण सुख मिलता है।

तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।

कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥

अर्थ– कोई कितना ही गिरी स्थिति में हो, कभी उसका अपमान नहीं करना चाहिए।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।

कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥

अर्थ– दिखावटी माला जपने से कोई लाभ नहीं होता। इसलिए पूजापाठ मन से करना चाहिए। 

सुख में सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद ।

कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

अर्थ- अगर सुख में अपने हितैषियों या ईश्वर को याद नहीं करोगे। तो दुख पड़ने पर कौन तुम्हारी मदद करेगा।

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय ।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

अर्थ– मनुष्य को ज्यादा का लालच नहीं करना चाहिए। केवल उतने की इच्छा रखनी चाहिए। जितने में परिवार और अतिथि का पालन हो सके।

जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥

अर्थ– योग्यता और गुणों का सम्मान करना चाहिए।

जाति, धर्म का नहीं।

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।

जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥

अर्थ- जहां दया होती है, वहां धर्म होता है। जहां क्रोध और लालच होता है। वहां पाप होता है। जहां क्षमा होती है, वहां ईश्वर होते है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

अर्थ- सभी कार्य धीरे धीरे अपने समय पर होते हैं। जिस प्रकार माली द्वारा सौ घड़े पानी से सींचने के बाद भी पेड़ में फल अपने समय पर ही लगते हैं।

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।

एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥

अर्थ- दिन रात में कुल आठ प्रहर होते है। जिनमें पांच व्यापार में और तीन सोने में निकल गए। एक प्रहर भी ईश्वर का नाम नहीं लिया तो मुक्ति कैसे होगी।

कबीर जी के दोहे- kabirdas ke dohe

 

कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।

जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥

अर्थ- कबीर कहते हैं कि तू व्यर्थ ही इस शरीर के सुख के लिए सो रहा है। एक दिन मृत्यु आकर तुझे ले जाएगी। यह शरीर रूपी म्यान यहीं पड़ी रहेगी।

शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।

तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥

अर्थ- चरित्र सबसे बड़ा रत्न है। तीनों लोकों की संपत्ति चरित्रवान को ही मिलती है।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गया शरीर ।

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

अर्थ– इस जन्म मृत्यु के चक्कर में बार बार केवल शरीर ही मरता है। माया, मोह, आशा और इच्छाएं नहीं मरती। इनको मारने से इस चक्कर में छुटकारा सम्भव है।

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥

अर्थ- जिस मिट्टी को गूंथ कर कुम्हार बर्तन बनाता है। वही मिट्टी कहती है कि आज तू मुझे गूंथ रहा है। एक दिन ( मृत्यु के बाद) मैं तुझे गूथूगी। अर्थात सबको एक दिन मिट्टी में ही मिलना है।

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

अर्थ– अनमोल मानव जन्म को तूने ईश्वर भक्ति की बजाय खाने और सोने में गवां दिया।

कबीर के दोहे इन हिन्दी – kabir ke dohe in hindi

 

जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।

तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥

अर्थ- अगर कोई तुम्हारे साथ बुरा करे तो भी तुम उसके साथ अच्छा करो। क्योंकि तुम्हारे द्वारा की गई अच्छाई उसके लिए आत्मग्लानि का कारण बनेगी।

आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।

एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥

अर्थ- जो भी इस संसार में आया है। एक दिन उसको जाना ही पड़ेगा। अच्छे कर्मों के बल पर एक सिंहासन पर चढ़ के जायेगा। दूसरा बुरे कर्मों के बल पर जंजीर से बांध कर जायेगा ।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥

अर्थ– कभी भी काम में टालमटोल नहीं करनी चाहिए। जो कल करना है, आज करो। जो आज करना है उसे अभी कर डालो। क्योंकि कब क्या हो जाये, ये कोई नहीं जानता।

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।

माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥

अर्थ- मांगना मरने के समान है। इसलिए किसी को भीख नहीं मांगनी चाहिए। सतगुरु की शिक्षा यही है कि मांगने से तो मर जाना अच्छा है।

जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।

कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥

अर्थ- जहां अभिमान होता है, वहां विपत्तियां आती हैं। हर बात में शंका करने से रोग उत्पन्न होते है। इन चारों रोगों को मिटाने का केवल धैर्य ही तरीका है।

गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।

हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥

अर्थ- कबीर कहते हैं कि गाली या अपशब्द कष्ट, झगड़ा और मृत्यु तक का माहौल बना देते है। जो इन पर ध्यान नहीं देता वही साधु या सज्जन है। जो गाली देने वाले से उलझता है वह भी नीच बन जाता है।

दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय ।

मुई खाल की स्वांस सो, सार भसम होइ जाय ॥

अर्थ- कमजोरों को कभी सताना नहीं चाहिए। उनकी बददुआ बहुत कष्टकारी होती है। जिस प्रकार लोहार के यहां मृत खाल से बनी धौकनी से निकली हवा से लोहा भी जल जाता है।

दान दिए धन ना घटे, नदी न घाटे नीर ।

अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥

अर्थ- दान देने से कभी धन घटता नहीं है। जिस तरह उपयोग के बाद भी नदी का पानी कभी कम नहीं होता। इसे आप अपनी आँखों से खुद देख सकते हैं। कबीर दास को कहने की जरूरत नहीं।

 famous dohe of kabeerdas

 

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय ।

औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥

अर्थ- बोली ऐसी होनी चाहिए जिससे मन का कष्ट दूर हो जाय। जिससे दूसरों को भी शान्ति मिले, और खुद भी शान्त हो।

हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट ।

बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥

अर्थ- जिसको गुणों की पहचान हो उसी के सामने गुणों को प्रकट करना चाहिए। अन्यथा चुप रहने में ही भलाई है।

कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि करे तन क्षार ।

साधु वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ॥

अर्थ- कभी किसी को कुटिलतापूर्ण वचन नहीं कहने चाहिए। क्योंकि ऐसे वचनों से शरीर अंदर से जल जाता है। जबकि प्रिय वचन अमृत के समान शीतलता प्रदान करते हैं

जग में बैरी कोई नहिं, जो मन शीतल होय ।

यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ॥

अर्थ- अगर मन शान्त है तो संसार में कोई शत्रु नहीं हैं। मनुष्य घमण्ड त्याग दे तो सभी उस पर दया करते हैं।

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय ।

सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय ॥

अर्थ- कबीर कहते हैं कि साधु या सज्जन पुरुष का स्वभाव सूप की तरह होना चाहिए। जिस प्रकार सूप अन्न को रखकर भूसा, तिनका आदि को उड़ा देता है। उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति को सार तत्व ग्रहणकर बाकी चीजों को छोड़ देना चाहिए।

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।

राजा-परजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥

अर्थ- प्रेम न तो बाग में उगता है न ही बाजार में बिकता है। राजा प्रजा जो भी चाहे इसे अभिमान का त्याग कर ले सकता है।

सबते लघुताई भली, लघुता ते सब होय ।

जैसे दूज का चन्द्रमा, शीश नवे सब कोय ॥

अर्थ- छोटा बने रहना ही सबसे अच्छा है। इसी से सब काम होते हैं। जैसे दूज का चंद्रमा छोटा होता है। फिर भी सभी उसे प्रणाम करते हैं।

कहता तो बहुता मिला, गहता मिला न कोय ।

सो कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय ॥

अर्थ- उपदेश देने वाले तो बहुत मिलते हैं। लेकिन खुद उनका पालन करने वाला कोई नहीं मिलता। ऐसे लोगों के उपदेश पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

कबीर के दोहे- kabir ke dohe with hindi meaning

 

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध |

कबीर संगत साधु की, कटै कोटि अपराध ||

अर्थ- एक घड़ी ( ढाई मिनट), आधी घड़ी, या एक पल ही संतों की संगत करने से मनुष्य के करोडों पाप मिट जाते हैं |

ऊँचे कुल की जनमिया, करनी ऊँच न होय |

कनक कलश मद सों भरा, साधु निन्दा कोय ||

अर्थ- अगर किसी के आचरण उच्च नहीं हैं तो उच्च नहीं कहा जायेगा। भले ही उसने ऊंचे कुल में जन्म लिया हो। जिस प्रकार मदिरा से भरा सोने का घड़ा भी सज्जनों द्वारा निंदा का ही पात्र है।

जो कछु आवै सहज में सोई मीठा जान |

कड़वा लगै नीमसा, जामें ऐचातान ||

अर्थ- जो कुछ भी आसानी से मिल जाये वही मीठा और हितकर है। जिसमे खींचातानी हो उसे नीम के समान कड़वा ही समझना चाहिए।

सबही भूमि बनारसी, सब निर गंगा होय |

ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय ||

अर्थ- जिसका मन आत्मज्ञान से निर्मल हो गया है। उसके लिए सारी धरती बनारस की तरह और सब नदियां गंगा की तरह पवित्र हैं।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप |

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ||

अर्थ- न तो अधिक बोलना अच्छा है। न अधिक चुप रहना। न अधिक बरसात अच्छी होती है, न अधिक धूप। अर्थात अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती।

kabirdas ke hindi dohe

 

मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक |

जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक ||

अर्थ- मन के अनुसार हमेशा काम नहीं करना चाहिए। क्योंकि मन के विचार अनेक होते है। मन को अपने अधीन रखने वाले विरले ही होते हैं।

मरूँ पर माँगू नहीं, अपने तन के काज |

परमारथ के कारने, मोहिं न आवै लाज ||

अर्थ- मैं मर भले जाऊं लेकिन अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगूंगा। लेकिन दूसरों के लिए मांगने में मुझे बिल्कुल लज्जा नहीं आती।

सती डिगै तो नीच घर, सूर डिगै तो क्रूर |

साधु डिगै तो सिखर ते, गिरिमय चकनाचूर।।

अर्थ- सती स्त्री अगर अपने आचरण से हटती है तो नीच स्वभाव वालों के घर जाती है। अगर वीर पुरुष आचरण छोड़ता है तो निर्दयी हो जाता है। लेकिन अगर साधु या सज्जन अपने उच्च आचरण से भृष्ट होता है। तो चकनाचूर हो जाता है। अर्थात कुछ नहीं बचता।

सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय |

बिन समझै शब्द गहै, कहु न लाहा लेय ||

अर्थ- शब्दों अर्थात शिक्षा को अच्छी सीखना और विचार करना चाहिए। केवल उसे रट लेने से कोई लाभ नहीं होता।

मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार |

हते पराई आत्मा, जीभ बाँधि तरवार ||

अर्थ- जो लोग बिना विचार किये जो भी मुँह में आता है, बोल देते हैं। वे अपनी जीभ रूपी तलवार से दूसरों को दुख ही पहुंचाते हैं।

कागा काको धन हरै, कोयल काको देत |

मीठा शब्द सुनाय को, जग अपनो करि लेत ||

अर्थ- कौवा किसका धन छीनता है, जो लोग उससे चिढ़ते हैं। कोयल कहाँ कुछ देती है, केवल मीठे शब्दों के प्रभाव से संसार को अपने वश में कर लेती है।

काल काल तत्काल है, बुरा न करिये कोय |

अन्बोवे लुनता नहीं, बोवे तुनता होय ||

अर्थ- काल मानव को तत्काल ही निगलना चाहता है। जो नहीं बोया गया वह काटने को नहीं मिलता। मानव जो बोता है, वही काटता है।

देह खेह होय जागती, कौन कहेगा देह |

निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह ||

अर्थ- मरने के बाद कौन तुमसे देने को कहेगा? इसलिए जीवन में परोपकार करो। यही जीवन का फल है।

कबीरदास के दोहे | 75 famous dohe of Kabir

 

जो उगै सो आथवै, फूले सो कुम्हिलाय |

जो चुने सो ढ़हि पड़ै, जनमें सो मरि जाय ||

अर्थ- जो उगता है, वह डूबता भी है। जो खिलता है वह सूखता भी है। जो बनाया जाता है, वह बिगड़ता भी है। जो जन्म लेता है, वह मरता जरूर है।

कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल |

दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूल ||

अर्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि यह संसार सेमल फूल की तरह ज्यादा दिन नहीं टिकता। इसलिए थोड़े दिनों के इस जीवन में झूठी शान में मत भूले रहो।

बालपन भोले गया, और जुवा महमंत |

वृद्धपने आलस गयो, चला जरन्ते अन्त ||

अर्थ- बचपन भोलेपन में और जवानी मस्ती में बीत गयी। बुढापा आलस्य में गुजर गया। अब चिता पर जलने की बारी आ गयी।

बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावे थाल |

आवन जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी का नाल ||

अर्थ- बेटा पैदा होने पर इतना खुश होकर थाली क्यों बज रहे हो ? नाली के कीड़ों की तरह इस संसार मे में आना जाना लगा ही रहता है।

बहते को मत बहन दो, कर गहि ऐचहु ठौर |

कहो सुन्यो मानौ नहीं, शब्द कहो दुइ और ||

अर्थ- कोई पथभृष्ट हो जाये तो उसे हाथ पकड़कर सही रास्ते पर लाना चाहिए। वो कुछ भी कहे मानना नहीं चाहिए। बल्कि चार बात और सुनाना चाहिए।

 

सहज सहज सब कोउ कहै, सहज न चीन्है कोय |

जो सहजै विषया तजै, सहज कहावै सोय ||

अर्थ- सभी अपने आपको सरल कहते हैं। लेकिन सही अर्थों में सरल या सहज वही है। जिसने विषय वासनाओं का त्याग कर दिया है।

 

कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाव |

भावै गुरु की भक्ति करू, भावै विषय कमाव ||

अर्थ- कबीर कहते हैं कि मनुष्य के पास मन तो एक ही है। जिसकी जहां इच्छा हो, वहां अपने मन को लगाए। जिसे गुरु की भक्ति पसंद हो, वह गुरुभक्ति में अपने मन को लगाए। जिसे विषय-वासनाओं में रुचि हो। वह अपने मन को वहां लगाए।

 

कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु |

विष की बेली परिहरो, अमृत का फल चाखु ||

अर्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि मन एक मतवाले हाथी के समान है। जिस प्रकार हाथी को वश में करने के लिए अंकुश की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार मन रूपी मदमस्त हाथी को  ज्ञान के अंकुश से अपने वश में रखना चाहिए।

ऐसा करने वाला विषय वासनाओं की विष बेल से बचकर ज्ञान और भक्ति के अमृत फल का स्वाद पाता है।

 

मनवा तो फूला फिरै, कहै जो करूँ धरम |

कोटि करम सिर पै चढ़े, चेति न देखे मरम ||

अर्थ- व्यक्ति मन में घमंड का भाव रखकर कहता है कि मैं बहुत धर्म करता हूँ। लेकिन वह यह ध्यान नहीं देता कि उसके सिर पर कई जन्मो के कर्म की गठरी लदी हुई है।

 

महमंता मन मारि ले, घट ही माहीं घेर |

जबही चालै पीठ दे, आँकुस दै दै फेर ||

अर्थ- इस चंचल मन को शरीर के अंदर ही घेर कर वश में कर लेना चाहिए। जब भी यह घूमकर विषय वासनाओं की ओर भागने लगे। ज्ञान के अंकुश के द्वारा इसे वापस मोड़ लेना चाहिए।

 

मन पंछी तब लग उड़ै, विषय वासना माहिं |

ज्ञान बाज के झपट में, जब लगि आवै नाहिं ||

अर्थ- मन रूपी यह पक्षी विषय वासना रूपी आकाश में तभी तक उड़ता है। जब तक यह ज्ञान रूपी बाज की पकड़ में नहीं आता। अर्थात ज्ञान प्राप्त हो जाने पर मन विषय वासनाओं की ओर नहीं जाता।

 

जीवन में मरना भला, जो मरि जानै कोय |

मरना पहिले जो मरै, अजय अमर सो होय ||

अर्थ- अगर कोई मरना चाहे तो जीवन में ही मर जाना चाहिए। कहने का अर्थ है कि जिंदा रहते ही सभी प्रकार के मोह और अभिमान को मार देना चाहिए। जो इस प्रकार मरता है, वह सदा के लिए अजर अमर हो जाता है।

 

भक्त मरे क्या रोइये, जो अपने घर जाय |

रोइये साकट बपुरे, हाटों हाट बिकाय ||

अर्थ- भक्त और संतों की मृत्यु पर रोने की क्या जरूरत ? वे तो अपने घर अर्थात परमात्मा के पास जा रहे हैं। रोना तो इन सांसारिक लोगों की मृत्यु पर चाहिए। जो मरने के बाद फिर से चौरासी लाख योनियों के बाजार में बिकने जा रहे हैं।

 

जब लग आस शरीर की, मिरतक हुआ न जाय |

काया माया मन तजै, चौड़े रहा बजाय ||

अर्थ- जब तक इस शरीर से आसक्ति और आशा है। तब तक मन का अज्ञान नहीं मिट सकता। अगर इस शरीर से मोह मिट जाय तो ज्ञान प्राप्ति में देर नहीं।

 

स्वारथ सूखा लाकड़ा, छाँह बिहूना सूल |

पीपल परमारथ भजो, सुखसागर को मूल ||

अर्थ- अपना स्वार्थ तो ऐसी सूखी लकड़ी के समान है। जिसमें छाया नहीं होती। जोकि कष्ट ही देता है। जबकि परोपकार पीपल के वृक्ष की तरह है। जो सदा छाया रूपी सुख ही देता है। 

पूत पियारो पिता कू, गोहनी लागो धाई ।
लोभ मिठाई हाथ दे , आपन गयो भुलाई ।।

अर्थ- पिता का प्यारा पुत्र जब उनसे लिपटता है। तो प्रेमवश पिता उसे कुछ मिठाई दे देते है। जिसके बाद पुत्र उन्हें भूलकर मिठाई खाने लगता है। यही हाल जीव का है। ईश्वर थोड़ा सा सुख देते हैं तो वह उन्हें भूल जाता है।

सब काहू का लीजिए, साचा असद निहार।
पच्छपात न कीजिये, कहै कबीर विचार।।

अर्थ- सबके बोले सत्य को निर्विकार भाव से सुनना चाहिए। कबीरदास जी कहते हैं कि पक्षपात नहीं करना चाहिए।

कबीर हरि सबको भजै, हरि को भजै न कोय।
जब लग आस शरीर की, तब लग दास न होय।।

अर्थ- कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर सबको याद करते हैं। परन्तु ईश्वर को कोई याद नहीं रखता है। जब तक शरीर क्षमतावान रहता है। तब तक मनुष्य ईश्वर की भक्ति नहीं करता।

पतिब्रता मैली भली, गले कांच को मोति।
सब सखियन में यों दिपै, ज्यों रबि शशि की ज्योति।।

अर्थ- चरित्रवान महिला कम रूपवान या गरीब ही क्यों न हो। वह सभी महिलाओं के बीच में सूर्य और चंद्रमा के समान चमकती है।

जो रोऊँ तो बल घटै, हसूं तो राम रिसाइ।
मन ही माहि बिसूरना, ज्यों घुन काठी खाइ।।

अर्थ- इस संसार में अगर मैं रोऊँ तो शक्ति का ह्रास होता है। अगर हंसता हूँ तो ईश्वर रुष्ट होते हैं कि मैं इस माया में रम गया हूँ। इसलिए मुझे मन ही मन में कष्ट सहन करना है। जैसे घुन अंदर ही अंदर लकड़ी को खा जाता है।

राम पियारा छाड़ि करि, करै आन का जाप।
बेस्या केरा पूत ज्यूं, कहै कौन सूं बाप।।

अर्थ- राम (ब्रम्ह) को छोड़कर मनुष्य तू किसी और का जाप करता है। तू तो उस वेश्या के पुत्र की तरह है जिसे अपने सच्चे पिता का ज्ञान नहीं होता।

रिद्धि सिद्धि मांगूं नहीं, मांगूं तुम सों यह।
निशदिन दर्शन साधु को, प्रभु कबीर कहुँ देय।।

अर्थ- हे ईश्वर, मैं तुमसे रिद्धि-सिद्धि नहीं मांगता हूं। हे प्रभु मुझे केवल रोज सज्जनों के दर्शन दीजिये।

साईं आगे साँच है, साईं साँच सुहाय।
चाहे बोले केस रख, चाहे देत मुंडाय।।

अर्थ- भगवान सत्य को सामने रखते हैं। भगवान को सत्य ही अच्छा लगता है। सत्य चाहे साधारण प्राणी का हो, चाहे किसी सन्यासी का।

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय।
अब के बिछड़े न मिले, दूर पड़ेंगे जाय।।

अर्थ- कबीर दास पत्ते और वृक्ष का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि इसी प्रकार इस संसार में एक बार मृत्यु के पश्चाद फिर से मिलन होना संभव नहीं है।

तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय।
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय।।

अर्थ- जो व्यक्ति तीर और तलवार से लड़ता है, वह सच्चा वीर नही है। सच्चा वीर तो वह है जो सांसारिक माया मोह से लड़कर उसे त्यागकर भक्ति करता है।

जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहारि।
राम नाम रसना बसै, लीजै जनम सुधारि।।

अर्थ- जिस क्षण साधुपुरुष का दर्शन होता है, वह क्षण धन्य है। क्योंकि उस क्षण जीभ पर राम नाम आता है और जीवन सुधर जाता है।

कबिरा सोता क्या करे, जागो जपो मुरार।
एक दिन है सोवना, लम्बे पाँव पसार।।

अर्थ- कबीर कहते हैं कि हे मानव सोकर अपना जीवन व्यर्थ मत करो। जागो और ईश्वर का नाम जपो। क्योंकि एक दिन तो पाँव पसारकर सोना (मृत्यु) ही है।

कबिरा लोहा एक है, गढ़ने में है फेर।
ताही का बख्तर बने, ताही की शमशेर।।

अर्थ- कबीर कहते हैं कि लोहा एक ही होता है। उसी से जान लेने वाली तलवार और उसी से ही जान बचाने वाला कवच भी बनता है। उसी प्रकार ईश्वर का बनाया इंसान सज्जन भी बन सकता है और दुर्जन भी।

उज्ज्वल पहिरे कापड़ा, पान सुपारी खाय।
एक हरी के नाम बिनु, बंधा जमपुरी जाय।।

अर्थ- साफ सुथरे वस्त्र पहने है और खान पान भी अच्छा है। किंतु ईश्वर के नामजप के बिना यमपाश में बंधना पड़ता है।

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिये, रहै एक की एक।।

अर्थ- कबीर कहते हैं कि गाली या दुर्वचन जब कोई कहता है तब वह एक ही होता है। लेकिन जब उसका जवाब दिया जाता है। तो वह अनेक हो जाती है। इसलिए गाली के जवाब में कभी पलटकर गाली नहीं देनी चाहिए।

 

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