हिन्दू नववर्ष – Hindu New Year

आज हम आपके लिए हिन्दू नववर्ष – Hindu New Year नामक लेख लेकर आये हैं। जो भारतीय परंपराओं एवं त्यौहारों के प्रति आपके विचारों को नया आयाम प्रदान करेगा।

हिन्दू नववर्ष – Hindu New Year

पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में आज हम अपना नववर्ष भूल गए हैं। नई पीढ़ी तो अंग्रेजी नववर्ष को ही अपना नववर्ष मानती है। कदाचित उन्हें पता भी नहीं होगा कि हमारा नववर्ष अलग है। जोकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है।

हमारा देश सदैव से उत्सवधर्मी और वसुधैव कुटुम्बकं की भावना से ओत-प्रोत रहा है। हम दूसरे के उत्सवों में भी पूर्ण मनोयोग से प्रतिभाग करते हैं। आंग्ल नववर्ष को मनाने में कोई बुराई भी नहीं है।

हिन्दू नववर्ष - Hindu New Year
हिन्दू नववर्ष – Hindu New Year

किंतु हमें अपने त्यौहार, अपनी संस्कृति और समृद्ध भारतीय परंपराओं का ज्ञान भी अवश्य होना ही चाहिए। हमें ज्ञान होना चाहिए कि हमारे पूर्वजों द्वारा अंगीकृत प्रत्येक परंपरा के पार्श्व में ठोस तार्किक कारण हैं।

यदि आंग्ल नववर्ष की बात करें तो यह प्रतिवर्ष एक जनवरी को मनाया जाता है। जोकि यूरोपीय देश- काल के अनुसार तो प्रासंगिक हो सकता है, किंतु हमारे लिए नहीं। यह वह समय होता है जब ठंड अपने चरम पर होती है।

सृष्टि का प्रत्येक जीव सर्दी से व्याकुल होता है। पतझड़ के इस मौसम में प्राकृतिक सुषमा का कहीं नामोनिशान नहीं होता। गरीबों के लिए अपने परिवार को ठंड से बचाने के महती प्रयत्न के अलावा उत्सव के लिए अवकाश नहीं होता। 

अन्नदाता किसान के लिए भी यह उत्सव का समय नहीं होता क्योंकि न तो इस समय फसल कटती है न ही उत्सव हेतु कोई अन्य समुचित कारण होता है।

जबकि हमारा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। जो प्रायः मार्च के महीने में होता है। यह बसंत का समय होता है। चतुर्दिक नवपुष्पित एवं पल्लवित हरीतिमा प्रस्फुटित होती है। जिसे देख मन आनंदित एवं आल्हादित होता है। यह उत्सव का समय है।

चार माह के अथक परिश्रम एवं स्वेदसिंचन के फलस्वरूप प्राप्त अन्नधन किसान के घर आता है। यह उत्सव का समय है।

धार्मिक दृष्टि से मातृशक्ति की आराधना का समय भी यही होता है। कन्यापूजन के द्वारा हम प्रकृति का आभार प्रकट करते हैं। यह उत्सव का समय है।

धार्मिक पहलू अनेक हैं यथा- इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारम्भ की थी। ज्योतिष के अनुसार इसी दिन  समस्त ग्रह- नक्षत्रों के परिक्रमण एवं परिभ्रमण प्रारम्भ किया था आदि-आदि। परंतु आज हम केवल व्यवहारिक एवं सामाजिक पहलुओं पर ही बात करेंगे।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की नववर्ष पर यह कविता अत्यंत प्रासंगिक है–

हिन्दू नववर्ष पर कविता

ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।
है अपनी ये तो रीत नहीं, 
है अपना ये त्यौहार नहीं।।

धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा गहरा है।
बाग बाजारों की सरहद पर, 
सर्द हवा का पहरा है।।

सूना है प्रकृति का आंगन,
कुछ रंग नहीं, उमंग नहीं।
हर कोई है घर में दुबका हुआ,
नववर्ष का ये कोई ढंग नहीं।।

चंद मास अभी इंतजार करो,
निज मन में तनिक विचार करो।
नए साल नया कुछ हो तो सही,
क्यों नकल में सारी अक्ल बही।।

उल्लास मन्द है जन मन का,
आयी है अभी बहार नहीं।
ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।।

ये धुंध कुहासा छटने दो,
रातों का राज्य सिमटने दो।
प्रकृति का रूप निखरने दो,
फागुन का रंग बिखरने दो।।

प्रकृति दुल्हन का रूप धार,
जब स्नेह सुधा बरसाएगी।
शस्य- श्यामला धरती माता,
घर-घर खुशहाली लाएगी।।

जब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि,
नववर्ष मनाया जाएगा।
आर्यावर्त की पुण्यभूमि पर,
जयगान सुनाया जाएगा।।

युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध,
नववर्ष हमारा हो प्रसिद्ध।
आर्यों की कीर्ति सदा- सदा,
नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।।

अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिए कोई उधार नहीं।
ये नववर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।
है अपनी ये तो रीत नहीं, 
है अपना ये त्यौहार नहीं।।

हिन्दू नववर्ष नामक इस लेख का उद्देश्य अंग्रेजी नववर्ष की कमियां बताना अथवा उसे मनाने से रोकना कदापि नहीं है। वरन मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि आपको अपने हिन्दू नववर्ष का भी ज्ञान होना चाहिए।

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