durga aarti- दुर्गा जी की तीन प्रसिद्ध आरती

durga aarti

आरती- चालीसा की श्रृंखला में आज हम आपके लिए durga aarti- दुर्गा जी की तीन प्रसिद्ध आरती लेकर आये हैं। जिसमे माँ दुर्गा की तीनों प्रसिद्ध आरतियों का संग्रह, दुर्गा आरती विधि और आरती के महत्व एवं फल का विस्तृत वर्णन किया गया है।

1- जय अम्बे गौरी- durga aarti

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुम को निस दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी।। जय अम्बे गौरी

माँग सिन्दूर विराजत टीको मृग मद को । मैया टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना चन्द्रबदन नीको।। जय अम्बे गौरी

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजे। मैया रक्ताम्बर राजे।
रक्त पुष्प गले माला कण्ठन पर साजे।। जय अम्बे गौरी

केहरि वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी। मैया खड्ग खप्पर धारी।
सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दुख हारी।। जय अम्बे गौरी

कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती। मैया नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति।।जय अम्बे गौरी

शम्भु निशम्भु बिदारे महिषासुर घाती। मैया महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती।। जय अम्बे गौरी

चण्ड मुण्ड संहारे शोणित बीज हरे। मैया शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे सुर भयहीन करे।। जय अम्बे गौरी

ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी। मैया तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी।। जय अम्बे गौरी

चौंसठ योगिन गावत नृत्य करत भैरों। मैया नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा अरु बाजत डमरू।। जय अम्बे गौरी

तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता। मैया तुम ही हो भर्ता।
भक्तन की दुख हर्ता सुख सम्पति कर्ता।। जय अम्बे गौरी

भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी। मैया वर मुद्रा धारी।
मन वाँछित फल पावत सेवत नर नारी।। जय अम्बे गौरी

कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती। मैया अगर कपूर बाती।
श्री माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योती।। बोलो जय अम्बे गौरी

माँ अम्बे की आरती जो कोई नर गावे| मैया जो कोई नर गावे।।
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे।। जय अम्बे गौरी

2- अम्बे, तू है जगदम्बे काली- durga aarti lyrics

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अम्बे, तू है जगदम्बे काली।
जय दुर्गे खप्पर वाली
तेरे ही गुण गाए भारती।
हो मैय्या, हम सब उतारे तेरी आरती।।

तेरे जगत के भक्तजनों पर भीर पड़ी है भारी।
दानव दलपर टूट पड़ो माँ करके सिंह सवारी।
सौ सौ सिंहो से भी बलशाली
मैया अष्ट भुजाओं वाली
दुःखियों के दुखड़े निवारती
हो मैय्या हम सब उतारे तेरी आरती।।

मां बेटे का है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता।
सब पे करुणा बरसाने वाली
अमृत बरसाने वाली
दुःखियों के दुखड़े निवारती
हो मैय्या हम सब उतारे तेरी आरती।।

नहीं मांगते धन और दौलत, ना चाँदी ना सोना
हम तो मांगे तेरे मन में एक छोटा सा कोना
सबकी बिगड़ी बनाने वाली
लाज बचाने वाली
सतियों के सत् को सवांरती
हो मैय्या हम सब उतारे तेरी आरती।।

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाये भारती
हो मैय्या हम सब उतारे तेरी आरती।।

3- जगजननी जय! जय- durga maa aarti

जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय।।

जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

तू विधि-वधू, रमा तू , उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वांछाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

दश विद्या, नव दुर्गा, नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी, धारा॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

मूलाधार निवासिनि, इह-पर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमले तू वरदे॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले! वेदत्रयी॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

हम अति दीन दु:खी माँ! विपत जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी! चरण शरण दीजै॥
जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !

जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय !
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय।।

आरती का महत्व/ फल

आरती पूजा के अंत में की जाती है। देवी देवता के पूजन में यदि कोई गलती हो गयी हो, या कुछ भूल गए हों। तो आरती कर लेने से वह क्षमा हो जाती है। स्कन्दपुराण में लिखा है–

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् कृतं पूजनं हरेः।
सर्वे सम्पूर्णतामेति कृते नीराजने शिवे।।

अर्थात- देवता का पूजन यदि बिना मन्त्र और क्रिया के भी किया जाय तो भी केवल आरती कर लेने से वह पूर्ण हो जाता है।

दुर्गा आरती विधि

पद्मपुराण में लिखा है कि आरती हमेशा कपूर या घी में भीगी रुई की बत्तियों से की जानी चाहिए। बत्तियों की संख्या विषम अर्थात एक, तीन, पांच, सात आदि होनी चाहिए। आरती में घण्टा, घड़ियाल, शंख आदि वाद्ययंत्रों का प्रयोग करना चाहिए।

मां की आरती लय के साथ गानी चाहिए। आरती के अंत में जयकारा अवश्य लगाना चाहिए। उसके बाद सभी उपस्थित लोगों को पूर्ण श्रद्धा से आरती लेनी चाहिए।

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