चाणक्य नीति-chanakya neeti

चाणक्य नीति- 100+चाणक्य कोट्स

चाणक्य नीति- 100+चाणक्य कोट्स

चाणक्य नीति- 100+चाणक्य कोट्स आपके लिए आचार्य चाणक्य के बेहतरीन विचारों का संकलन है। चाणक्य नीति आज भी भारत में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तक है. आचार्य चाणक्य ने अनुभव के आधार पर सिद्ध और व्यावहारिक जीवन में उपयोगी वचनों का संग्रह चाणक्य नीति chanakya neeti नामक पुस्तक में किया है. परन्तु चाणक्य नीति उन्होंने संस्कृत भाषा में लिखी थी.

जिस कारण वह सर्वसाधारण के लिए पढना कठिन है. इसलिए हमने चाणक्य नीति के चुनिन्दा सौ श्लोकों का हिंदी अर्थ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. चाणक्य के ये सभी विचार व्यवहारिक जीवन में आज भी प्रासंगिक हैं.

चाणक्य नीति- 100+चाणक्य कोट्स
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चाणक्य के 100+ सुविचार/ 100 quotes of Chanakya

1- आपत्तिकाल के लिए धन बचाना चाहिए.धन से भी बढ़कर स्त्री की रक्षा करनी चाहिए. लेकिन धन और स्त्री से भी बढ़कर स्वयं की रक्षा करनी चाहिए.

2- दुष्टा पत्नी, धूर्त मित्र, उत्तर देने वाला नौकर, घर में रहने वाला सांप ये चारों म्रत्यु का दूसरा रूप हैं. इसमें कोई शक नहीं है.

3- जिस देश में न सम्मान हो, न जीविका हो, न ही भाई बंधु हों और न ही जीविका का लाभ हो, वहां निवास नहीं करना चाहिए.

4- काम के समय नौकरों की, दुःख के समय भाइयों की, विपत्ति आने पर मित्रों की और धन- संपत्ति के नाश हो जाने पर पत्नी की परीक्षा होती है.

5- बीमार होने पर, दुःख के समय, अकाल पड़ने पर, शत्रुओं से संकट होने पर, राजा के सामने, और श्मशान में जो साथ देता है, वही बंधु है.

6- नदियों का, शस्त्र धारण करने वालों का, सींग वाले जानवरों का, स्त्रियों का और राजकुल का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए.

7- विष से अमृत को, अशुद्ध पदार्थों से सोने को, नीच व्यक्ति से उत्तम विद्या को एवं दुष्ट कुल से भी गुणवान स्त्री को ग्रहण कर लेना चाहिए.

चाणक्य कोट्स
चाणक्य नीति chanakya neeti

8- जिसका पुत्र उसके वश में हो, स्त्री उसकी इच्छा के अनुरूप आचरण करे, जो थोड़े धन में संतुष्ट हो. उसके लिए स्वर्ग यहीं है.

9- पुत्र वही है जो पितृभक्त है, पिता वही है, जो पालन पोषण करता है. जिस पर विश्वास हो, वही मित्र है. स्त्री वही है जिससे सुख प्राप्त हो.

10- सामने मीठी- मीठी बातें करे और पीठ पीछे काम बिगाड़े. ऐसे मित्र से दूर रहना चाहिए. वह उसी प्रकार है जैसे अन्दर विष और ऊपर से दूध से भरा हुआ घड़ा.

11- कुमित्र पर तो कदापि विश्वास नहीं करना चाहिए. लेकिन सुमित्र पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए. क्योंकि कभी नाराज हो जाने पर वह सारी गुप्त बातें प्रकट कर सकता है.

12- मन में सोचे हुए कार्य को किसी के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए. उस पर मनन करते हुए चुपचाप ही उस कार्य को पूरा करना चाहिए.

13- जिस प्रकार सभी पर्वतों पर माणिक्य नहीं मिलता, हर हाथी के मस्तक पर मोती नहीं होता. सभी जंगलों में चन्दन के वृक्ष नहीं होते. उसी प्रकार सज्जन पुरुष सब जगह नहीं मिलते.

14- वे माता पिता शत्रु के समान हैं, जिन्होंने अपने बालक को शिक्षा नहीं दी. क्योंकि सभा के बीच वे बालक उसी तरह अच्छे नहीं लगते, जिस प्रकार हंसों के मध्य बगुला.

15- अधिक लाड़- प्यार करने से पुत्र और शिष्य में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं. अतः पुत्र और शिष्य पर कड़ी नजर रखना ही उचित है. ऐसा चाणक्य नीति कहती है.

16- पत्नी का वियोग, अपने लोगों से अपमान, युद्ध में बचा हुआ शत्रु, बुरे राजा की सेवा, दरिद्रता, विपरीत स्वभाव वालों की सभा. ये बिना अग्नि के ही शरीर को जला देते हैं.

चाणक्य के विचार
चाणक्य नीति chanakya neeti

17- नदी किनारे के पेड़, दूसरे के घर में रहने वाली स्त्री, बिना मंत्री का राजा ये सब शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं.

18- ब्राम्हणों का बल विद्या, राजा का बल उसकी सेना, वैश्यों का बल धन एवं शूद्रों का बल उनकी सेवा होती है.

19- वैश्या निर्धन पुरुष को, प्रजा शक्तिहीन राजा को, पक्षी फलहीन पेड़ को और अतिथि भोजन के बाद घर को छोड़ देता है.

20- दुराचारी, बुरी दृष्टि रखने वाला, बुरे स्थान पर रहने वाला और स्वभाव से दुष्ट व्यक्ति जिससे मित्रता करता है, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है.

चाणक्य नीति- chanakya niti | चाणक्य के सौ सुविचार quotes

21- किसके कुल में दोष नहीं है ? किसको रोग ने पीड़ा नहीं दी है ? किसको कष्ट नहीं मिला और कौन सदा सुखी रहता है ? अर्थात ऐसा कोई नहीं है.

22- अच्छा आचरण कुल का परिचय देता है. बोली देश का परिचय देती है. सम्मान स्नेह को प्रकट करता है और शरीर भोजन को प्रकट करता है.

23- कन्या उच्च कुल में देनी चाहिए. पुत्र को विद्याध्ययन में लगाना चाहिए. शत्रु को कष्ट देना चाहिए. मित्र को धर्म में लगाना चाहिए.

24- दुष्ट व्यक्ति और सांप में से चुनना पड़े तो सांप को चुनना चाहिए. क्योंकि सांप तो मृत्यु आने पर ही कटेगा परन्तु दुष्ट पग-पग पर कष्ट देता है.

25- रूप यौवन से संपन्न एवं उच्च कुल में उत्पन्न विद्याहीन पुरुष उसी प्रकार शोभा नहीं पाते जिस प्रकार सुगंध रहित टेसू का फूल.

26- कुल के भले के लिए एक का त्याग कर देना चाहिए. ग्राम के भले के लिए कुल का, जनपद के भले के लिए ग्राम का और अपने भले के लिए पृथ्वी का भी त्याग करना पड़े तो कर देना चाहिए.

27- रूप की अधिकता के कारण सीता हरण हुआ. घमंड के अतिरेक से रावण मारा गया. दान की अति के कारण राजा बली को बंधना पड़ा. अतः अति से बचना चाहिए.

28- दुःख देने वाले बहुत से पुत्रों से क्या लाभ ? कुल को आलम्बन देने वाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है. जो कुल की उन्नति का आधार होता है. ऐसा चाणक्य नीति chanakya neeti में लिखा है.

29- पुत्र को पांच वर्ष तक लाड़ प्यार करना चाहिए. उसके बाद दस वर्षों तक उस पर कड़ी नजर रखनी चाहिए. किन्तु सोलह वर्ष का होने पर पुत्र के साथ मित्र जैसे व्यव्हार करना चाहिए.

30- उपद्रव होने पर, शत्रु का आक्रमण होने पर, अकाल होने पर और दुष्टों की संगति होने पर जो भाग जाता है, वही जीवित रहता है.

31- जहाँ मूर्खों का सम्मान नहीं होता, जहाँ भली प्रकार अन्न का संचय होता है. जहाँ पति-पत्नी में झगड़ा नहीं होता, वहां लक्ष्मी स्वयं आकर निवास करती हैं. ऐसा चाणक्य नीति chanakya neeti में कहा गया है.

32- आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पांच बातें जब मनुष्य गर्भ में रहता है, तभी लिख दी जाती हैं.

33- जिस धर्म में दया न हो, उसे छोड़ देना चाहिए. विद्याहीन गुरु को छोड़ देना चाहिए. हमेशा क्रोध करने वाली पत्नी को छोड़ देना चाहिए. जिनसे प्रेम न हो, ऐसे बंधुओं को छोड़ देना चाहिए.

chanakya quotes in hindi
चाणक्य नीति chanakya neeti

34- यह समय कैसा है ? मेरे मित्र कौन हैं ? यह देश कैसा है ? मेरा आय-व्यय कैसा है ? मैं कौन हूँ ? मेरी ताकत क्या है ? व्यक्ति को इसका बार- बार विचार करते रहना चाहिए.

35- ब्राम्हण,क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि है. सभी वर्णों का गुरु ब्राम्हण है. स्त्रियों का गुरु उनका पति है और अतिथि सबका गुरु है.

36- जिस प्रकार स्वर्ण की परीक्षा घिसकर, काटकर, तपाकर और पीटकर चार प्रकार से होती है. उसी प्रकार दान, शील, गुण और कर्म से पुरुष की परीक्षा होती है. ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है.

37- भय से तब तक डरना चाहिए जब तक वह सामने न आ जाय. जब भय सामने आ जाये तो उसका बिना डरे सामना करना चाहिए.

38- एक ही माता से, एक ही समय, एक ही नक्षत्र में जन्म लेने वाले सभी लोग गुण और कर्म में समान नहीं होते. जैसे बेर के फल और कांटे एक ही पेड़ से उत्पन्न होने के बावजूद एक समान नहीं होते.

39- मूर्ख विद्वानों से, निर्धन धनवानों से, चरित्रहीन स्त्रियाँ कुलीन स्त्रियों से और विधवा सुहागिनों से सदैव द्वेष रखती हैं।

40- आलस्य करने से विद्या नष्ट हो जाती है. दूसरे के हाथ में गया धन नष्ट हो जाता है. बीज की कमी से खेत नष्ट हो जाता है. सेनापति के बिना सेना नष्ट हो जाती है.

41- काम के समान रोग नहीं, मोह के समान शत्रु नहीं, क्रोध के समान दूसरी आग नहीं और ज्ञान के समान कोई सुख नहीं है.

42- जवानी, धन-संपत्ति, प्रभुता और अविवेक इन चारों में से एक भी अनर्थ का कारण है. जहाँ चारों एकत्र हो जाएँ तो फिर कहना ही क्या है ?

43- राजा, वैश्या, यमराज, अग्नि, चोर, बालक, याचक और परपीड़क ये आठों दूसरे के दुःख को नहीं जानते.

44- आहार, निद्रा, भय, मैथुन ये सब मनुष्यों और पशुओं में समान ही होते हैं. मनुष्यों में केवल ज्ञान ही विशेष है. ज्ञान से रहित मनुष्य पशु के ही समान है.

45- यदि पत्नी है. घर में धन-लक्ष्मी भी है. विनयी और गुणवान पुत्र है, तो फिर स्वर्ग में इससे अधिक क्या है ?

46- कुंदरू तुरंत ही बुद्धि को हर लेता है और वच शीघ्र ही बुद्धि प्रदान करती है. स्त्री तुरंत ही शक्ति हर लेती है और दूध तुरंत ही शक्ति देता है.

47- नाई के घर पर बाल बनवाने वाला, पत्थर पर से लेकर चन्दन लगाने वाला, अपना रूप जल में देखने वाला यदि इंद्र भी हो तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है.

48- सांप के दांत में, मक्खी के सर में और बिच्छू के पूँछ में विष रहता है. परन्तु दुष्ट लोगों के सभी अंगों में विष भरा रहता है.

49- अन्न और जल के समान कोई दान नहीं है. द्वादशी से बढ़कर कोई तिथि नहीं है. गायत्री से बड़ा कोई मंत्र नहीं और माता से बड़ा कोई देवता नहीं है.

50- शक्तिहीन पुरुष सज्जन बन जाता है. निर्धन व्यक्ति ब्रम्हचारी बन जाता है. रोगी देवभक्त बन जाता है और वृद्धा स्त्री पतिव्रता बन जाती है.

51- यदि लोभ है तो दूसरे दोष की क्या आवश्यकता ? यदि चुगलखोरी की आदत है तो पाप की क्या आवश्यकता ? यदि सत्यता है तो तप की क्या आवश्यकता ? यदि मन स्वच्छ है तो तीर्थों से क्या ? यदि सज्जनता है तो दुसरे गुणों से क्या ? यदि यश है तो आभूषणों से क्या ? यदि अच्छी विद्या है तो धन से क्या और यदि अपयश है तो मृत्यु की क्या आवश्यकता ?

52- उपकार के बदले में उपकार करना चाहिए और हिंसा के बदले में हिंसा. इसमें कोई दोष नहीं. क्योंकि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यव्हार उचित ही है.

53- पुस्तकों में लिखी विद्या और दूसरों के हाथ में गया धन जरूरत पड़ने पर काम नहीं आता.

54- सभी जगह गुणों की पूजा होती है संपत्ति की नहीं. जिस प्रकार द्वितीया का कलंक रहित चंद्रमा पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र से अधिक पूज्य होता है.

55- स्वर्णमृग न तो पहले किसी ने बनाया न तो देखा न ही सुना. फिर भी श्रीराम को उसकी लालसा हुई. सच ही है की विनाश के समय बुद्धि विपरीत हो जाती है.

56- वैसे तो बंधन बहुत हैं. लेकिन प्रेम का बंधन सबसे अलग है. लकड़ी को छेदने में कुशल भंवरा कमल की कोमल पंखुड़ियों में कैद हो जाता है. ऐसा 100+चाणक्य कोट्स का कथन है.

57- मलिन वस्त्र वाले, गंदे दांत वाले, ज्यादा भोजन करने वाले, कड़वा बोलने वाले, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोने वाले को लक्ष्मी छोड़ देती हैं. चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों.

58- अन्याय से अर्जित किया हुआ धन दस वर्षों तक रहता है. ग्यारहवें वर्ष वह मूलधन सहित नष्ट हो जाता है.

59- अग्नि, जल, स्त्री, मूर्ख, सर्प, राजकुल इनसे सदैव सावधानी से व्यवहार करना चाहिए. क्योंकि ये मृत्यु के कारण बनते हैं.

60- राजा धर्मात्मा हो तो प्रजा भी धर्मात्मा होती है. राजा पापी हो तो प्रजा भी पापी, रजा सम हो तो प्रजा भी सम होती है. क्योंकि जैसा राजा होगा वैसी ही प्रजा भी होगी.

61- जो बीत गया उसका दुःख और भविष्य की चिंता नहीं करनी चाहिए. समझदार लोग वर्तमान काल के अनुसार व्यवहार करते हैं. ऐसा चाणक्य नीति में लिखा है.

62- धन के प्रयोग में, विद्या ग्रहण में, भोजन में तथा लोक व्यवहार में जो लज्जा का त्याग कर देता है. वही सुखी होता है.

63- विदेश में विद्या मित्र है. घर में पत्नी मित्र है. रोगी की मित्र औषधि है और मृत व्यक्ति का मित्र धर्म है.

64- दूसरी स्त्रियों को माता के समान, दूसरे के धन को धेले के समान और सब जीवों को अपने समान देखता है. उसी का देखना सार्थक है.

65- देवता को चढ़ाए गये धन और गुरु के धन की चोरी करता है. परस्त्रीगमन करता है और सब प्राणियों के धन से निर्वाह करता है. ऐसा ब्राम्हण चंडाल कहलाता है.

66- काम, क्रोध, लोभ, स्वादिष्ट भोजन, श्रृंगार, मनोरंजन, अधिक निद्रा और अधिक सेवा ये आठ काम विद्यार्थियों के लिए वर्जित हैं.

67- कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने पर विष्णु पृथ्वी को, पांच हजार वर्ष बीतने पर गंगा जी जल को, 2500 वर्ष बीतने पर ग्राम देवता ग्राम को छोड़ कर चले जाते हैं.

68- भाग्य भिखारी को राजा, राजा को भिखारी, धनी को निर्धन और निर्धन को धनवान बना सकता है.

69- यदि सुख चाहे तो विद्या का त्याग कर दे. यदि विद्या चाहे तो सुख का त्याग कर दे. क्योकि सुखार्थी को विद्या और विद्यार्थी को सुख कहाँ मिलता है ?

70- गुणवान व्यक्ति दरिद्र भी हो तो सुन्दर लगता है. पुराने वस्त्र भी साफ़ होने पर सुन्दर लगते हैं. गर्म होने पर बासी भोजन भी स्वादिष्ट लगता है. चरित्रवान व्यक्ति कुरूप भी हो तो सुन्दर लगता है.

71- राजा, सांप, शेर, बर्रे, बालक, दूसरे का कुत्ता और मूर्ख ये सात यदि सोते हों तो इन्हें नहीं जगाना चाहिए.

चाणक्य नीति- 100+चाणक्य कोट्स
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72- विद्यार्थी, सेवक, यात्री, भूखा, भयाकुल, भंडारी और द्वारपाल ये सात यदि सोते भी हों तो इन्हें जगा देना चाहिए.

73- सब औषधियों में अमृता (गुरूच), सब सुखों में भोजन, सब इन्द्रियों में आँख और सब अंगों में सिर श्रेष्ठ है.

74- असंतोषी ब्राम्हण, संतोषी राजा, लज्जावान वैश्या और लज्जाहीन कुलीन स्त्री नष्ट हो जाती है.

75- न शांति के समान दूसरा तप है. न संतोष के समान दूसरा सुख. न तृष्णा से बड़ी व्याधि है, न दया से बड़ा धर्म.

76- तेल लगाने पर, चिता का धुंआ लगने पर, स्त्री प्रसंग करने पर, बाल कटाने पर मनुष्य जब तक स्नान नहीं करता. तब तक चांडाल बना रहता है अर्थात अशुद्ध रहता है.

77- दीपक अन्धकार को खा जाता है और काजल उत्पन्न करता है. सत्य ही है जो जैसा अन्न खाता है वैसी ही उसकी संतान होती है.

78- जिसके पास धन है, उसी के मित्र होते हैं. वही पुरुष गिना जाता है और वही जीवित रहता है.

79- अधिक सीधे स्वभाव का होना भी बुरा है. जंगल में सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्ष खड़े रहते हैं.

80- अपनी स्त्री, भोजन और धन से संतुष्ट रहना चाहिए. लेकिन पढाई, जप और दान में कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए.

81- ऋण लेने वाला पिता, व्यभिचारिणी माता, सुंदर स्त्री और मूर्ख पुत्र ये चारों शत्रु के समान हैं.

82- अपने राज्य में हुए पाप को राजा और राजा के किये पाप को पुरोहित भोगता है. स्त्री के किये हुए पाप को पति और शिष्य के किये पाप को गुरु भोगता है.

83- जैसी होनी होती है, वैसी ही बुद्धि, उपाय और सहायक मिल जाते हैं.

 चाणक्य के वचन
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84- राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, सास और जन्म देने वाली मां इन पांच को माता कहते हैं.

85- जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत संस्कार करने वाला, विद्या देने वाला, अन्न आदि के द्वारा पालन करने वाला और भय से बचाने वाला. ये पांच पिता कहे जाते हैं. ऐसा 100+चाणक्य कोट्स का वचन है.

86- धन का नाश, मन का कष्ट, पत्नी का चरित्र, नीच वचन और अपना अपमान. बुद्धिमान पुरुष को यह किसी से नहीं कहना चाहिए.

87- दो ब्राम्हणों के बीच, ब्राम्हण और अग्नि के बीच अर्थात यज्ञ के बीच, पति-पत्नी के बीच, मालिक और नौकर के बीच, हल और बैल के बीच कभी नहीं पड़ना चाहिए.

88- अग्नि, गुरु, ब्राम्हण, गाय, कुमारी कन्या,वृद्ध और बालक को कभी पैर से नहीं छूना चाहिए.

89- अधम पुरुष धन की इच्छा रखते हैं. मध्यम पुरुष धन और सम्मान की और उत्तम पुरुष केवल सम्मान की इच्छा रखते हैं.

90- बुढ़ापे में स्त्री का मरना, बंधुओं के हाथ में धन का जाना, दूसरों के आश्रित भोजन ये तीनों बातें दुखदायक हैं.

91- गुणहीन की सुन्दरता व्यर्थ है, चरित्रहीन का कुल व्यर्थ है. सिद्धि के बिना विद्या व्यर्थ है और उपभोग के बिना धन व्यर्थ है.

92- संसार में विद्वान् की ही प्रसंशा होती है. विद्वान को ही आदर मिलता है. विद्या से सब कुछ मिलता है. सब स्थानों पर विद्या की ही पूजा होती है.

93- यज्ञ में यदि अन्न का प्रयोग न हो तो राज्य को, मंत्र का प्रयोग न हो तो ऋत्विजों को और दान न हो तो यजमान को जलाता है. इस प्रकार के यज्ञ से बड़ा कोई शत्रु नहीं है.

94- लालची लोगों का शत्रु याचक होता है, मूर्खों का शत्रु समझाने वाला होता है. चरित्रहीन स्त्रियों का शत्रु उनका पति होता है और चोरों का शत्रु चंद्रमा अर्थात प्रकाश होता है.

95- जिन लोगों के पास न विद्या है न तप है, न दान है न चरित्र है. न गुण है न धर्म ही है, ऐसे लोग पशु के समान हैं.

96- जिसके बुद्धि है, बल भी उसी के पास है. जैसे वन में बलवान शेर भी बुद्धिमान खरगोश के द्वारा मारा जाता है.

97- अन्न से दसगुना गुण आटे में, आटे से दसगुना दूध में, दूध से आठगुना मांस में और मांस से दसगुना घी में गुण होता है.

98- प्राणी गुणों के कारण सम्मानित होते हैं ऊंचे आसन पर बैठने से नहीं. जैसे ऊंची छत पर बैठने से कौवा गरुण नहीं हो जाता.

99- वस्तु की योग्यता और अयोग्यता व्यक्ति की पात्रता पर निर्भर होती है. जैसे अमृत के योग्य न होने के कारण राहु को सिर कटाना पड़ा और विष पीकर भी शंकर नीलकंठ कहलाये. ऐसा चाणक्य नीति- 100+चाणक्य कोट्स में लिखा है.

100- जो गुरु शिष्य को एक भी अक्षर का उपदेश देता है, पृथ्वी पर ऐसी कोई वस्तु नहीं, जिसे देकर शिष्य ऋण मुक्त हो सके.

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