bihari ke dohe

50 बिहारी के दोहे- Bihari ke dohe in Hindi

दोस्तों ! आज हम आपके लिए 50 बिहारी के दोहे- Bihari ke dohe in Hindi नामक पोस्ट लाए हैं। जिसमें हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बिहारी के दोहों का संकलन अर्थ सहित किया गया है। यह दोहे हिन्दी काव्य के रसिक पाठकों को आनंद की अनुभूति कराएँगे। साथ ही class 10 और अन्य कक्षा के छात्रों के लिए बहुत उपयोगी साबित होंगे।

बिहारी कवि का संछिप्त परिचय

बिहारी मिर्ज़ा राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। इनका जन्म ब्रज में एक उच्च कुलीन ब्राम्हण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था।जिसका वर्णन उन्होंने स्वयं किया है—

जनम लियो द्विजराजकुल, प्रगट भए ब्रज आय।
मेरे हरो कलेश सब, केशव केशवराय ।।

राजा जयसिंह की आज्ञा से इन्होंने सतसई लिखना प्रारम्भ किया। जोकि बिहारी सतसई के नाम से प्रसिद्ध है।

हुकुम पाय जयशाह को, हरिराधिका प्रसाद।
करी बिहारी सतसई, भरी अनेक सवाद।।

इसके दोहे गागर में सागर कहे जाते हैं। इनके दोहों का प्रत्येक शब्द एक गूढ़ अर्थ छिपाए हुए होता है। इसलिए इनके दोहों का सही अर्थ निकालना बहुत कठिन होता है।

इस ग्रंथ में बिहारी ने राधा-कृष्ण पर दोहे, नायिका का नख-शिख वर्णन, प्रेम और विरह वर्णन, नीति के दोहे आदि बहुत विषयों को समाहित किया है। तथापि सतसई शृंगार वर्णन के लिए अधिक प्रसिद्ध है। बिहारी सतसई को ब्रजभाषा के श्रेष्ठतम ग्रंथों में शामिल किया जाता है-

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर।।
ब्रजभाषा बरनी कविन, बहुविधि बुद्धि विलास।
सबकी भूषण सतसई करी बिहारीदास।।

Bihari ke dohe
Bihari ke dohe

बिहारी के दोहे- Bihari ke dohe in Hindi

दीरघ साँस न लेइ दुख, सुखसाईं मति भूल।
दई दई कत करत है, दई दई सुकुबूल।।1।।

अर्थ- दुख में दीर्घ निःश्वास मत लो और सुख में भगवान को मत भूलो। भाग्य-भाग्य क्यों चिल्लाते हो। भाग्य ने जो दिया है, उसे स्वीकार करो।

अपने अपने मत लगे, वाद मचावत शोर।
ज्यों त्यों सेवो सबहिं को, एकै नंदकिशोर।।2।।

अर्थ- संसार में सभी लोग अलग अलग धर्म और मतों का बखान करते हैं। जबकि सबका पालन पोषण एक श्रीकृष्ण ही करते हैं।

तो अनेक अवगुण भरी, चाहै याहि बलाय।
ज्यों पति सम्पति हू बिना, यदुपति राखै जाय।।3।।

अर्थ- संपत्ति अनेक अवगुणों से भरी होती है। इसकी इच्छा करना विपत्तियों को आमंत्रित करना है। अगर भगवान कृष्ण चाहे तो बिना सम्पति के भी सम्मानपूर्वक जीवन जिया जा सकता है।

तौ लगि या मनसदन में, हरि आवैं केहि बाट।
निपट विकट जबलों जूट, खुलै न कपट कपाट।।4।।

अर्थ- इस मन रूपी घर में ईश्वर तब तक नहीं आ सकते। जबतक इस मन के कपट रूपी कपाट जोरों से बंद हैं।

जप माला छापा तिलक, सरै न एकौ काम।
मन कांचे नाचे वृथा, सांचे रांचे राम।।5।।

अर्थ- जप, माला, छापा, तिलक आदि आडंबरों से कुछ नहीं होता है। यदि मन एकाग्र नहीं है, कच्चा है तो नाचना बेकार है। क्योंकि राम तो केवल सच्चे हृदय वाले व्यक्ति को ही मिलते हैं।

जगत जनायो जिन सकल, सो हरि जान्यो नाहि।
ज्यों आंखन जग देखिए, आंख न देखी जाहि।।6।।

अर्थ- जिन भगवान ने सारा संसार बनाया है, वे दिखाई नहीं पड़ते। जिस प्रकार आंख से सारा संसार देखा जाता है। लेकिन अपनी आंख को नहीं देखा जा सकता।

कोऊ कोटिक संग्रहों, कोऊ लाख हजार।
मो सम्पति यदुपति सदा, विपति विदारनहार।।7।।

अर्थ- कोई करोङों की संपत्ति इकट्ठा करता है तो लाखों, हजारों की। लेकिन मेरी संपत्ति तो भगवान श्रीकृष्ण हैं। जो सभी विपत्तियों को नष्ट कर देते हैं।

प्रलयकरन बरसन लगे, जुरि जलधर इकसाथ।
सुरपति गर्व हरो हरषि, गिरिधर गिरिधर हाथ।।8

अर्थ- इंद्र की इच्छा से ब्रज में प्रलय करने के लिए जब सारे बादल एकजुट होकर बारिश करने लगे। तब गिरिधर (श्रीकृष्ण) ने अपने हाथ पर गोवर्धन पर्वत धारण करके सबकी रक्षा और इंद्र का गर्वहरण किया था।

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
उहि खाए बौरायजग, यह पाए बौराय।।9

अर्थ- सोने (कनक) में धतूरे (कनक) से सौ गुनी अधिक मादकता होती है। क्योंकि धतूरे को खाने से आदमी नशे में आता है, जबकि सोने को पाने से ही आदमी मदहोश हो जाता है।

बड़े न हूजे गुणन बिनु, बिरद बड़ाई पाय।
क़हत धतूरे सो कनक, गहनो गढ्यो न जायँ।।10

अर्थ- बिना गुण के केवल बड़े नाम के सहारे बड़ा नहीं बना जा सकता। जैसे धतूरे को भी कनक (सोना) कहा जाता है। लेकिन उससे गहना नहीं बनाया जा सकता।

bihari ke dohe class 10

वे न यहाँ नागर बड़े, जिन आदर तो आव।
फूल्यो अनफूल्यो भयों, गंवई गाँव गुलाव ।।11

अर्थ- हे गुलाब, यहाँ वे लोग नहीं हैं। जिन्हें तुम्हारी सुंदरता की कद्र है। गाँव में तो तुम्हारा फूलना और न फूलना एक ही समान है। अर्थात् मूर्खों के बीच गुणवान की भी कोई कद्र नहीं होती है।

मूँड़ चढ़ाएहू रहै, परो पीठ कच भार।
गरे परे पहँ राखिए, तऊ हीय पर हार।।12

अर्थ- सिर पर चढ़ने के कारण बालों को पीछे अर्थात् पीठ पर धकेल दिया जाता है। जबकि गले लगने के कारण हार को हृदय पर स्थान दिया जाता है। कहने का अर्थ है कि घमंड दिखाकर किसी से बड़े बनने की बजाय प्रेम दिखाकर उसके बराबर बनने वाले को हृदय में स्थान मिलता है।

जनम जलधि पानिप अमल, तो जग आव अपार।
रहै गुणी ह्वै गर परयो, भलो न मुक्ताहार।।13

अर्थ- समुद्र में जनम हुआ है, निर्मल रूप है, संसार में मूल्यवान और सम्मान है। ऐसे गुणवान होकर भी दूसरों की गले में पड़े रहने के कारण मोती की महत्ता भी कम हो जाती है।कहने का तात्पर्य यह है कि किसी दूसरे पर आश्रित हो जाने पर गुणी लोगों का सम्मान भी घट जाता है।

नहिं पावस रितुराज यह, तज तरुवर मति भूल।
अपतभये बिन पाय हैं, क्यों न बदल फल फूल।।14

अर्थ- हे वृक्ष, यह वर्षा ऋतु नहीं बल्कि बसंत ऋतु है। इसमें बिना पुराने पत्तों को त्यागे नए फल फूल नहीं मिलेंगे। अर्थात् बिना त्याग के इस संसार में कुछ अच्छा प्राप्त नहिं किया जा सकता।

को छूटो यहि जाल परि, मत कुरंग अकुलाय।
ज्यों ज्यों सुरझ भज्यो चहै, त्यों त्यों उरझो जायँ।।15

अर्थ- इस मायारूपी संसार के जाल में फँसकर बहुत आतुरता दिखाना ठीक नहीं है। अगर कोई सोचता है कि कामनाओं की पूर्ति करके इस जाल को सुलझाया जा सकता है। तो वह ग़लत है, इससे यह और उलझता जाता है।

दिन दस आदर पायके, करले आप बखान।
ज्यों लगि काक सराधपख, त्यों लगि तव सन्मान।।16

अर्थ- हे कौवे, दस दिन सम्मान और आदर पाकर अभिमान मत करो। क्योंकि जब तक श्राद्ध पक्ष है तुम्हारा सम्मान भी तभी तक है। यानी थोड़ी प्रभुता पाकर अभिमान नहिं करना चाहिए।

मरत प्यास पिंजरा परयो, सुआ समय के फेर।
आदर दे दे बोलियतु, बायस बलि की बेर।।17

अर्थ- समय के फेर से तोता पिंजरे में प्यास मरता है और श्राद्ध पक्ष में कौवों को सम्मान देकर भोजन कराया जाता है। सब समय का फेर होता है।

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास एहि काल।
अली कली ही सों बिंध्यो, आगे कौन हवाल।।18

अर्थ- न तो अभी पराग है, न फूलों में मधु आया है। न ही कलियाँ ही विकसित हुई हैं। फिर भी भँवर कलियों में अटक गया है तो आगे क्या होगा?

संगति दोष लगे सबनि, कहते साँचे बैन।
कुटिल बंक भ्रूसंग से, कुटिल बंक गति नैन।।19

अर्थ- संगति से सबको दोष उत्पन्न हो जाते हैं, यह सच्ची बात है। जैसे टेढ़ी भौंह के कारण नेत्र भी टेढ़े हो गये हैं।

समय समय सुंदर सबै, रूप कुरूप न कोय।
मन की रुचि जेती जितै, तिन तेती रुचि होय।।20

अर्थ- समय के अनुसार सब सुंदर लगते है। इस संसार में कोई न तो रूपवान है न ही कोई कुरूप है। जिसकी रुचि या प्रेम जिसकी तरफ़ होता है। उसे वही सुंदर लगने लगता है।

bihari ke dohe

को कहि सके बड़ेन सों, लखी बड़ीयो भूल।
दीने दई गुलाब की, इन डारन यह फूल।।21

अर्थ- बड़े या सामर्थ्यवान लोगों को कौन उनकी गलती बताने का साहस कर सकता है। जैसे विधाता ने गुलाब के कोमल फूल को कँटीली डालियों में उत्पन्न किया है। लेकिन इस बात के लिए कौन विधाता को दोष देने का साहस कर सकता है।

बुरे बुराई जो तजें, तौ मन खरो सकात।
ज्यों निकलंक मयंक लखि, गिनैं लोग उत्पात।।22

अर्थ- बुरे लोग यदि बुराई छोड़ भी दें तो भी मन उनसे डरता है। जिस प्रकार कलंक रहित चंद्रमा दिखना अशुभ होता है।

नवनागरि तन मुलक लहि, यौवन आमिल ज़ोर।
घटि बढ़िते बढ़ि घटि रक़म, करी और की और।।23

अर्थ- यौवन रूपी अधिकारी ने युवती के शरीर रूपी नए नगर को पाकर अपने बल और क्षमता द्वारा वस्तुओं को घटा बढ़ा डाला। अर्थात् बचपना हटा दिया, आँख की चतुराई, केश, नितम्ब, स्तन को बढ़ा दिया। कमर को घटा दिया। भाव-भंगिमा, चाल-चलन को कुछ का कुछ कर डाला।

अपने अँग के जानिक, यौवन नृपति प्रबीन।
स्तन नयन नितम्ब को, बड़ो इजाफा कीन।।24

अर्थ- चतुर यौवन राजा ने अपने सहायक जानकर स्तन, नयन और नितम्बों में बहुत वृद्धि की अर्थात् नायिका के यौवन में वृद्धि हुई।

सोहत ओढ़े पीट पट स्याम सलोने गात।
मनहु नीलमनि शैलपर, आतप परयो प्रभात।25

अर्थ- श्रीकृष्ण जी अपने साँवले शरीर पर पीला वस्त्र ओढ़े हुए हैं। वह उसी प्रकार सोभायमान हो रहा है। जिसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो नीली मणियों के पर्वत पर सुबह की धूप पड़ रही हो।

अधर धरत हरि के परत, ओठ दीठ पट ज्योति।
हरित बाँस की बाँसुरी,इंद्रधनुष रँग होति।।26

अर्थ- जब श्रीकृष्ण अपने होठों पर बाँसुरी धारण करते हैं तो उस समय आँख, होंठ और उनके पीले वस्त्र के प्रकाश से हरे बाँस की बाँसुरी इंद्र्धनुष के समान दिखने लगती है।

शीश मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल।
यहि बानिक मो मन बस्यो, सदा बिहारीलाल।।27

अर्थ- सिर पर मुकुट, कमर में काछनी, हाथ में मुरली और गले में माला। श्रीकृष्ण की यह छवि बिहारीलाल के मन में सदा बसी रहे।

मेरी भवबाधा हरो, राधा नागरि सोइ।
जा तनु की झाँई पड़े, स्याम हरित दुति होइ।।28

अर्थ- वे राधा रानी मेरी जनम मरण की बाधा को दूर करें। जिनके गोरे शरीर की छाया पड़ने से साँवले श्रीकृष्ण की छवि हरी दिखने लगती है। अथवा जिनकी छायामात्र को देखकर श्रीकृष्ण प्रसन्न (हरित) हो जाते हैं।

खरी भीरहू भेदिके, कितहूँ ह्वै इत आय।
फिरै दीठि जुरि दीठसों, सबकी दीठ बचाय।।29

अर्थ- कितनी भी भीड़ हो, प्रेमिका की दृष्टि अपने प्रेमी को ढूँढ ही लेती है। अपने प्रियतम की दृष्टि से मिलकर और दूसरों की दृष्टि से बचकर फिर वापस आ जाती है।

क़हत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौनमें करती है, नैननि में सब बात।।30

अर्थ- लोगों से भरे घर में प्रियतम से कुछ कहना, मना करना, प्रेम प्रदर्शित करना, प्रसन्न होना, नाराज होना और लजाना ये सारे कार्य नायिका बिना बोले आँखों के इशारे से ही करती है।

चलत घरै घर घरतऊ, घरी न घर ठहराति।
समुझि उही घर को चलै, भूल उही घर जाति।।31

अर्थ- कृष्ण के प्रेम में एक गोपी इतनी मतिभ्रमित हो गयी है कि घर भर में ही घूम रही है। साथ ही घड़ी भर के लिए भी विश्राम नहीं करती है। बार बार जान समझकर भी उसी घर में जाती है और भूलकर भी उसी घर में ही जाती है। अर्थात् प्रेम में उसे कुछ भी सुध नहीं है।

जात मरी बिछुरत घरी, जल सफरी की रीति।
क्षणभर होत खरी खरी, अरी जरी यह रीति।।32

अर्थ- एक सखी कहती है कि मछली एक क्षण के लिए भी जल से अलग होते ही मर जाती है।यही उसकी रीति है। हमारी यह प्रीति दिन प्रतिदिन बढ़कर हमें जला रही है। परंतु हमारे प्राण नहीं छूट रहे हैं।

यश अपयश देखत नहीं, देखत साँवलगात।
कहाकरौंलालच भरे, चपल नैन चलि जात।।33

अर्थ- एक गोपी कहती है कि हे सखी ! मैं क्या करूँ, मेरे यह नैन यश-अपयश कुछ नहिं देखते। केवल साँवरे (कृष्ण) की ओर ही बार बार चले जाते हैं।

तोपर वारों उरवसी, सुन राधिके सुजान।
तू मोहन के उरवसी, है उरवसी समान।।34

अर्थ- हे राधे, तुम इतनी सुंदर हो कि मैं तुमपर उर्वशी अप्सरा को बलिहारी करती हूँ। तुम मोहन के मन में लक्ष्मी के ही समान बसती हो।

छुटत न पैयत क्षणकवश, नेहनगर यह चाल।
मारे फिर फिर मारियत, खूनी फिरत खुसाल।।35

अर्थ- इस प्रेमनगर की यह ख़ासियत है की इसमें एक क्षण को भी छुटकारा नहीं मिलता। प्रेम में मरा हुआ बार बार मारा जाता है और खूनी (प्रेमी) खुशीसे घूमता है।

जो चाहत चटक न घटै, मैलो होय न मित्त।
रज राजस न छुवाइये, नेह चीकने चित्त।।36

अर्थ- अगर तुम चाहते हो कि मित्रता के प्रेम की चमक कभी कम न हो और मित्र का मन भी मैला न हो तो प्रेम के चिकने चित्त पर रजोगुण (अभिमान) धूल न पड़ने देना।

पावक झरतैं मेहझर, दाहक दुसह विशेषि।
दहै देह वके परस, याहि दृगनकी देषि।।37

अर्थ- हे सखी, अग्नि की लपटों से अधिक इस मेघ की झर-झर जलाती है।क्योंकि अग्नि तो केवल स्पर्श करने से ही जलाती है। जबकि यह मेघ की झर तो देखने मात्र से हृदय में आग लगा देती है।

बर जीते सर मैन के, ऐसे देखे मैन।
हरनी के नैनानते, हरनी के यह नैन।।38

अर्थ- हे श्रीकृष्ण, आपके इन नेत्रों ने बलपूर्वक कामदेव के बाणों को भी जीत लिया है। ऐसे नेत्र मैंने कभी नहीं देखे। यह आपके नेत्र हिरणी के नेत्रों से भी अधिक सुंदर हैं।

कोटि यतन कोहू करै, परै न प्रकृतिहि बीच।
नलबल जल ऊँचे चढ़इ, अंत नीच को नीच।।39

अर्थ- कोई कितना भी प्रयास कर ले, किंतु जो प्राकृतिक स्वभाव है उसमें परिवर्तन नहीं होता है। जिस प्रकार फुहारे के प्रभाव से जल ऊपर को चढ़ता है। किंतु बाद में फिर नीचे आ जाता है। उसी प्रकार नीच व्यक्ति की नीचता नहीं जाती है।

तंत्रीनाद कवित्तरस, सरस राग रतिरंग।
अनबूड़े बूड़े तरे, जे बूड़े सब अंग।।40

अर्थ- वीना की ध्वनि, कविता का रस, सरस राग, नृत्य आदि में जो नहि डूबे हैं, वे डूबे के समान हैं। अर्थात् वे नीरस हैं। जो इनमें सर्वांग डूबे हैं अर्थात् रसिकजन वेही संसार से तर जाते हैं।

50 बिहारी के दोहे

कैसे छोटे नरनसों, सरत बड़न के काम।
मढ़ो दमामों जात है, कहिं चूहे के चाम।।41

अर्थ- छोटे लोगों से बड़ों के काम नहीं हो सकते। जिस प्रकार जिस प्रकार चूहे के चमड़े से ऊँट पर रखने वाला नगाड़ा नहीं मढ़ा जा सकता है।

ओछे बड़े न हुइ सकें, लगि सतरोहे बैन।
दीरघ होइ न नेकहू, फारि निहारे नैन।।42

अर्थ- छोटे लोग छोटे ही रहेंगे, वे केवल बड़ी बड़ी बातें करने से बड़े नहीं हो सकते। जिस प्रकार आँखें फाड़ फाड़ कर देखने से नेत्र बड़े नहीं हो जाते।

मीत न नीति गलीत ह्वै, जो धरिए धन जोरि।
खाए खरचे जो बचे, तो जोरिए करोरि।।43

भावार्थ- हे मित्र ! नीति यह नहिं कहती कि अपनी दुर्दशा करके धन बचाओ। सही नीति यह है कि खाने और खर्च करने के बाद जो बचे उसका संग्रह करना चाहिए।

बसय बुराई जासु तन, ताहीं को सन्मान।
भलो भलो कहि छाँड़िए, खोटे ग्रह जप दान।।44

अर्थ- बिहारी कहते हैं कि जो बुरा होता है लोग उसी को सम्मान देते हैं। जैसे जो ग्रह अच्छे फल देते हैं, उनको लोग अच्छा कहकर छोड़ देते हैं। लेकिन बुरा फल देने वाले ग्रहों के निम्मित्त पूजा पाठ, जप, दान आदि करते हैं।

कहैं यहै श्रुति स्मृतिनसों, सबै सयाने लोग।
तीन दबावत निकसहीं, राजा पातिक रोग।।45

अर्थ- वेद, पुराण और बुद्धिमान लोग सभी यही कहते हैं कि राजा, पाप और रोग यह तीनों कमजोर लोगों को ही दबाते हैं।

संगति सुमति न पावहीं, परे कुमति के धंध।
राखो मेल कपूर में, हींग न होय सुगंध।।46

अर्थ- अगर एक बार बुद्धि कुमति के जाल में फँस जाती है। तो फिर वह सत्संगति से भी नहीं सुधर पाती। जिस प्रकार हींग को कपूर में मिलाकर भी रख दो तो भी उसकी गंध नहिं जाती।

अरे परेखो क्यों करै, तुही बिलोक बिचारि।
केहि नर केहि सर राखिए, खरे बढ़े पर पारि।।47

अर्थ- इस बात की परीक्षा क्या करना ? तुम ख़ुद ही विचार कर देख लो। इस संसार में बढ़ते हुए (प्रभावशाली) ऐसे कौन लोग हैं, जो किसी नियम या मर्यादा का पालन करते हैं।

या अनुरागी चित्त की, गति समझै नहिं कोय।
ज्यों ज्यों बूड़े स्याम रँग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।।48

अर्थ- इस प्रेमी मन की स्थिति कोई नहीं समझता है। यह श्रीकृष्ण के काले रँग में जितना डूबता है, उतना ही उज्ज्वल होता जाता है।

नितप्रति एक तहीं रहत, वैसवरन मन एक।
चहियत युगलकिशोर लखि, लोचन युगल अनेक।।49

अर्थ- एक ही वर्ण मन के द्वारा राधा कृष्ण की युगल जोड़ी को दो नेत्रों से देखना सम्भव नहीं है। इसके लिए अनेक जोड़ी नेत्रों की आवश्यकता है।

छुटी न शिशुता की झलक, झलक्यो यौवन अंग।
दीपति देह दुहून मिलि, दिपति ताफता रँग।।

अर्थ- नायिका में अभी लड़कपन नहीं गया है और अंगों में यौवन का प्रारम्भ हो चुका है। लड़कपन और यौवन के इस अद्भुत संयोग से नायिका की देह धूप छाँव के मिश्रित रँग के समान चमक रही है।

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