बाबा कीनाराम की जीवनी- Baba Keenaram

बाबा कीनाराम की जीवनी

आज हम भारत के संत की श्रंखला में आपके अघोरेश्वर बाबा कीनाराम की जीवनी लेकर आए हैं। जिन्होंने भारत में छठी शताब्दी में सुप्त हो चुकी अघोर परंपरा को पुनर्जीवित किया। बाबा कीनाराम baba keenaram ने क्रीं कुंड बनारस में अघोर परंपरा की सर्वोच्च गद्दी की स्थापना की।

भारत भूमि सदैव से ही संत महात्माओं की तपस्थली रही है। इस आध्यात्मिक उर्वरा भूमि पर समय समय पर अनेक चमत्कारी संतों ने अवतरित होकर अपने व्यक्तित्व, कृतित्व, और चमत्कारों से जनसामान्य को आल्हादित और आप्लावित किया है।

साथ ही उन्होंने भारत की आध्यात्मिक समृद्धि और संपन्नता को सम्पूर्ण विश्व में उद्घोषित भी किया है। इसी श्रृंखला में अघोर परंपरा को पुनर्जीवित करने वाले बाबा कीनाराम नाम विशेष उल्लेखनीय है।

बाबा कीनाराम अघोरपंथ के उच्च कोटि के सिद्ध संत थे। उनके चमत्कारों की अनेक कथाएं जनसामान्य में प्रचलित हैं। उनकी सिद्धि और क्षमता के बारे में बताने के लिए यह घटना पर्याप्त है–

बाबा कीनाराम की जीवनी
बाबा कीनाराम की जीवनी

काशीनरेश को शाप

तत्कालीन काशीनरेश महाराज चेतसिंह शिवभक्त थे। वे अपने महल में एक शिवालय का निर्माण करा रहे थे। आज उसकी प्राणप्रतिष्ठा थी। सारा राजमहल सजा धजा था। स्वयं महाराज घूम घूम कर सारी व्यवस्था देख रहे थे।

काशी के सभी गणमान्य लोग महल में उपस्थित थे। सारे साधू संत भी बुलाये गए थे। पहरेदारों को सख्त आदेश थे कि कोई अवांछनीय व्यक्ति इस शुभ अवसर पर महल में न आने पाए।

अचानक महाराज चेतसिंह की नजर सामने खड़े एक अस्तव्यस्त वेशभूषा वाले जटाजूट धारी साधू पर पड़ी। उसे देखते ही राजा क्रोधित होकर बोले, “इस नरपिशाच को किसने अंदर आने दिया? इसे तुरंत बाहर निकालो।”

यह सुनकर वह सन्यासी भी क्रोधित हो गया। सन्यासी का मेघगर्जन स्वर पूरे महल में गूंज उठा, “काशीनरेश! तुझे अपनी वीरता और वैभव का घमंड हो गया है। तूने एक अघोरी बाबा का अपमान किया है। अब शीघ्र ही तेरी वीरता और वैभव दोनों का पतन होगा।”

“जिस किले और महल में तू रह रहा है। यहां उल्लू और चमगादड़ रहेंगे। कबूतर बीट करेंगे। काशी में म्लेक्षों का राज होगा। काशी का राजवंश आज के बाद संतानहीन होगा। सदा सर्वदा के लिए, यह एक अघोरी का श्राप है।”

यह कहकर वह अघोरी बाबा हवा के झोंके की तरह गायब हो गया। वह अघोरी कोई और नहीं अघोरेश्वर बाबा कीनाराम थे। महाराज चेतसिंह के निजी सचिव सदानंद बक्शी baba kinaram की शक्तियों से परिचित थे।

वे बाबा के आश्रम पहुंचे और राजा को क्षमा करने की प्रार्थना की। लेकिन कीनाराम बाबा ने कहा कि अब बात जुबान से निकल चुकी है। यह सत्य होकर रहेगी। तब सदानंद ने कहा, “बाबा! हम लोगों का क्या होगा?”

बाबा ने उत्तर दिया, “जब तक तुम्हारे वंश के लोग अपने नाम के साथ ‘आनंद’ शब्द लगाते रहेंगे। तब तक तुम्हारा वंश अनादि काल तक चलता रहेगा। कालांतर में उन्हीं के वंशज डॉ0 संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।”

अब काशीनरेश का हाल सुनिये। थोड़े समय बाद अंग्रेजों ने काशी पर हमला किया। जिसमें महाराज चेत सिंह को शिवाले का किला छोड़ कर भागना पड़ा। काशी पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। वह महल निर्जन और सुनसान हो गया। वहां सचमुच उल्लू और चमगादड़ रहने लगे।

आज भी वहां इन्हीं पक्षियों का डेरा है। बाबा कीनाराम के श्राप के अनुसार ही काशी का राजवंश संतान के लिए तरस गया। लगभग 200 वर्षों तक काशी राजवंश गोद ले लेकर चलता रहा।

बाद के राजाओं ने बहुत हवन, अनुष्ठान कराए। सिद्धों, संतों से शापमुक्ति की प्रार्थना की। लेकिन कोई शाप का प्रभाव खत्म नहीं कर पाया। कालांतर में काशी के सर्वाधिक योग्य, जनप्रिय एवं भक्त राजा विभूतिनारायण सिंह ने बाबा कीनाराम के उत्तराधिकारी महासिद्ध अघोरेश्वर भगवान राम के चरणों में बैठकर शापमुक्ति की प्रार्थना की।

द्रवित होकर उन्होंने शाप के प्रभाव को कुछ कम कर दिया और कहा, “इसी गद्दी पर ग्यारहवें उत्तराधिकारी के रूप में स्वयं बाबा कीनाराम 9 वर्ष की अवस्था में आरूढ़ होंगे। जब वे तीस वर्ष के होंगे। तब उनकी कृपा से काशी राजवंश शापमुक्त होगा।

वह दिन 10 फरवरी सन 1978 को आया। जब महाराज बाबा सिद्धार्थ गौतम अघोरपंथ की सर्वोच्च गद्दी पर मात्र 9 वर्ष की अवस्था में विभूषित हुए। उसके बाद सन 2000 में काशी राजवंश शापमुक्त हुआ। 200 वर्ष बाद पहली संतान का जन्म हुआ।

ऐसे चमत्कारी सिद्ध संत बाबा कीनाराम की जीवनी का अध्ययन आज की इस पोस्ट में हम करेंगे।

बाबा कीनाराम का प्रारम्भिक जीवन-aghori baba story in hindi

कीनाराम बाबा का जन्म सन 1601 में उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद के रामगढ़ नामक ग्राम में एक कुलीन क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। खाली समय में वे अपने मित्रों के साथ रामधुन गाते थे।

बारह वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह कर दिया गया और तीन वर्ष बाद गौना निश्चित हुआ। गौने की पूर्वसंध्या पर इन्होंने अपनी माँ से दूध-भात खाने के लिए मांगा। उस समय दूध भात खाना अशुभ माना जाता था।

जोकि मृतक संस्कार के बाद खाया जाता था। माँ के मना करने के बाद भी उन्होंने हठ करके दूध भात खाया। अगले दिन उनकी पत्नी की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ। समाचार से पता चला कि उनकी पत्नी की मृत्यु एक दिन पूर्व सायंकाल में ही हो चुकी थी।

पूरा गांव आश्चर्यचकित था कि घर पर बैठे बैठे कीनाराम को पत्नी की मृत्यु की जानकारी कैसे हो गयी? कुछ समय बाद घरवाले फिर से विवाह के लिए दबाव डालने लगे। जिससे परेशान होकर बाबा कीनाराम ने घर छोड़ दिया।

सन्यासी जीवन- बाबा कीनाराम की जीवनी

घर छोड़ने के बाद वे घूमते हुए गाजीपुर जिले के कारों ग्राम जोकि अब बलिया जिले में है, वहां पहुंचे। वहां रामानुजी परंपरा के संत शिवराम की बड़ी प्रसिद्धि थी। कीनाराम जी उनकी सेवा में जुट गए और उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की।

एक दिन शिवराम जी ने इन्हें पूजा सामग्री लेकर गंगातट पर चलने को कहा। कीनाराम जी सामग्री लेकर गंगातट से थोड़ी दूर बैठ गए। थोड़ी देर में गंगा का जल बढ़कर उनके पैरों तक पहुंच गया। यह चमत्कार देखकर शिवरामजी ने इनको दीक्षा दी दी।

बीजाराम की मुक्ति- baba kinaram

बाबा ने कुछ समय वहां रहकर के साधनाएं कीं। पत्नी की मृत्यु के बाद जब संत शिवराम ने पुनर्विवाह किया तो बाबा कीनाराम ने उन्हें छोड़ दिया। भ्रमण करते हुए बाबा नईडीह नामक गांव में पहुंचे। वहां एक बुढ़िया के लड़के को लगान न दे पाने के कारण जमींदार के आदमी पकड़ ले गए थे।

लाचार वृद्धा का दुख बाबा से देखा नहीं गया। वे उसके लड़के को छुड़ाने जमींदार के पास पहुंच गए। जमींदार ने कहा कि मेरा लगान दे दीजिए, लड़का ले जाइए। बाबा बोले, “जहां लड़का बैठा है, उसके नीचे खोदो। तुम्हें तुम्हारे लगान से कई गुना अधिक धन मिल जाएगा।

सचमुच वहां सोने की अशर्फियों का ढेर निकला। जमींदार बाबा के चरणों में नतमस्तक हो गया। लड़के को छोड़ दिया गया। बुढ़िया ने अपने लड़के को बाबा की सेवा में सौंप दिया। वही लड़का आगे चलकर बाबा बीजाराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ और बाबा का उत्तराधिकारी बना।

भगवान दत्तात्रेय के दर्शन

वहां से आगे बढ़ते हुए बाबा गिरनार पर्वत पर पहुंचे। जो औघडपंथी संतों की पुण्य तपोभूमि मानी जाती है। यहीं साक्षात शिव के अवतार महागुरु दत्तात्रेय जी ने baba kinaram को दर्शन दिए। इससे पूर्व दत्तात्रेय जी ने गुरु गोरखनाथ को भी यहीं दर्शन दिए थे।

जूनागढ़ के नवाब का मानमर्दन- बाबा कीनाराम की जीवनी

गिरनार पर्वत से लौटते हुए बाबा जूनागढ़ रियासत में पहुंचे। वहां का नवाब बहुत घमंडी था। उसने अपने राज्य में भिक्षा मांगने प्रतिबंधित कर रखा था। भिक्षुकों को वह जेल में डाल देता था। वहां पहुंचकर बाबा ने बीजाराम को भिक्षा मांगने भेजा।

लेकिन नवाब के आदेशानुसार सैनिकों ने उन्हें कालकोठरी में डाल दिया। बीजाराम के न लौटने पर बाबा कीनाराम स्वयं भिक्षा मांगने गए। उन्हें भी पकड़कर कालकोठरी में डाल दिया गया।

वहां पहले से ही बहुत से संत महात्मा और फकीर बंद थे। सबको चलाने के लिए एक चक्की दी जाती थी। बाबा को भी एक चक्की दी गयी। बाबा ने अपनी छड़ी चक्की पर मारी और चक्की अपने आप चलने लगी।

इसी तरह वहां लगी 981 चक्कियां बाबा ने एक साथ चला दीं। यह देखकर पहरेदारों ने नवाब को सूचना दी। यह देखकर नवाब ने बाबा को मुक्त कर उनसे क्षमा याचना की। बाबा ने उससे सभी संतों-फकीरों को छोड़ने को कहा।

साथ ही बाबा ने उससे वचन लिया कि आज के बाद प्रत्येक मांगने वाले को ढाई पाव आटा राज्य की ओर से दिया जाएगा।

क्रीं कुंड-अघोरी बाबा

जूनागढ़ से चलकर बाबा कीनाराम उत्तराखंड के जंगलों में पहुंचे। वहां विभिन्न स्थलों पर बाबा ने कई वर्षों तक साधनाएं कीं। तत्पश्चात वे वाराणसी के क्रीं कुंड में पहुंचे और यहां धूनी रमाई।

क्रीं कुंड को बहुत ही सिद्ध स्थल माना जाता है। एक बार बाबा कालूराम ने कहा था कि यहां सभी तीर्थों का वास है। क्रीं कुंड में ही बाबा कीनाराम ने अघोरपंथ की सर्वोच्च गद्दी स्थापित की। यहां बाबा की जलाई हुई धूनी आज भी प्रज्वलित है।

यहां स्थित कुंड में स्नान करने से सभी प्रकार के चर्म रोग दूर होते हैं, ऐसी मान्यता है। क्रींकुण्ड में स्नान करने और बाबा की समाधि के दर्शन करने के लिए लोगों का तांता लगा रहता है।

बाबा का व्यक्तित्व

कीनाराम बाबा बहुत ही सरलस्वभाव के थे। दूसरों के दुख से वे बड़ी जल्दी द्रवित हो जाते थे। वे शीघ्र ही उसके दुखों को दूर करने के उपाय बता देते थे। शिव के समान आशुतोष और शिव के समान ही क्रोधी।

कीनाराम बाबा का कृतित्व

यही औघड़ों का स्वभाव है। प्रसन्न हो जायें तो सब कुछ दे दें। नाराज हो जाएं तो जो है वह भी छीन लें। लेकिन बाबा ने काशीनरेश के अलावा और किसी का अहित नहीं किया। अपने जीवनकाल में उन्होंने न जाने कितने रोगियों को रोगमुक्त किया। कितनों की समस्याएं दूर कीं। कई मृत लोगों के परिजनों के रुदन से द्रवित होकर उन्हें पुनर्जीवित किया।

एक जनश्रुति है कि एक बार एक निःसंतान महिला भक्तशिरोमणि तुलसीदासजी के पास पुत्र की याचना हेतु पहुंची। तुलसीदासजी ने बताया कि तुम्हारे भाग्य में संतानसुख नहीं है। अतः तुम्हे संतान नहीं हो सकती।

वह महिला बाबा कीनाराम baba keenaram के पास पहुंची। बाबा ने अपनी छड़ी पांच बार उसके माथे से छुआई। जिसके फलस्वरूप उसके पांच पुत्र हुए। तभी से यह कहावत प्रचिलित हो गयी कि “जो न कर सकें राम। वह करें कीनाराम।”

अघोरपंथ और अघोरी- बाबा कीनाराम की जीवनी

अघोरपंथ वस्तुतः साधना की सबसे जटिल पद्धतियों में से एक है। साथ ही यह सबसे सरलतम भी है। इसमें साधक को केवल प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करना होता है। यह सरलतम इसलिए है कि इसमें साधक को जगत की प्रत्येक वस्तु को शिव रूप में स्वीकार करना होता है।

जटिलतम इसलिए कि प्रकृति से तादात्म्य एवं हर अच्छी बुरी चीज को शिव स्वरूप मानकर स्वीकार करना और अंगीकार करना बहुत ही कठिन है। संभवतः सभी पंथों में अघोरी ही है जो प्रकृति पर पूर्ण नियंत्रण रखता है।

इसीलिए अघोरी का कहा गया एक एक वाक्य अक्षरसः सत्य होता है। अघोरी के दिये गए शाप या आशीर्वाद को काटने का सामर्थ्य अघोरेश्वर भगवान शिव के अतिरिक्त अन्य किसी में नहीं।

पांचवी छठी शताब्दी के बाद सुप्तावस्था में चली गयी अघोर परंपरा को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करने का श्रेय बाबा कीनाराम को जाता है। बाद के वर्षों में कुछ तथाकथित अघोरियों ने समाज में अपने कृत्यों से जनमानस में अघोर परम्परा एवं अघोरियों के लिए भय का वातावरण बनाया।

इस विषय पर विश्वनाथ प्रसाद अस्थाना जिन्होंने साठ साल तक अघोरपंथ को बारीकी से समझा और अघोरपंथ पर कई विश्वप्रसिद्ध पुस्तकें भी लिखीं। उनके विचार इस प्रकार हैं-
“अघोरी मदारियों की तरह तमाशा नहीं दिखाते। न ही वे चमत्कारों का दिखावा करते हैं। अघोरी तो संकल्पमात्र से विधि के विधान को बदल देता है। तथापि उनका एकमात्र उद्देश्य जनसामान्य की सेवा और दुखों को दूर करना होता है।”

वह पाखंड और चमत्कार से दूर रहता है। यह और बात है कि काल के प्रवाह में उसके द्वारा जनकल्याण के लिए सहज ही कुछ ऐसे कार्य हो जाते हैं जिन्हें आमजन चमत्कारों की संज्ञा देते हैं।”

बाबा कीनाराम की मृत्यु

170 वर्षों तक जनकल्याण के लिए अनेक लीलाएं करने के बाद बाबा कीनाराम ने सन 1770 में समाधि ले ली।

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2 thoughts on “बाबा कीनाराम की जीवनी- Baba Keenaram”

  1. Ajad Raghuwanshi

    I am from Ramgarh. This is beautiful post about Baba Kinaram biography. This help people to know about real meaning of sant. This is good attempt to share info about a real sant.

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