Akbar- Birbal Story- कुंआ और पानी

कहानियों की श्रृंखला में आज प्रस्तुत है Akbar- Birbal Story- कुंआ और पानी। जो बीरबल की हाजिरजवाबी और बुद्धिमत्ता का सुंदर उदाहरण है।

Akbar- Birbal Story- कुंआ और पानी

पुराने समय में खेतों की सिंचाई आज की तरह ट्यूबवेल आदि मानव निर्मित संसाधनों से नहीं होती थी। उस समय सिचाई का साधन या तो बरसात का जल था या फिर कुआं।

बरसात का कोई भरोसा नहीं था। अतः जिसके खेत के पास कुआं होता था। उसकी फसल बढ़िया होती थी। लेकिन उस समय कुआं खुदवाना काफी खर्चीला काम था।

मनोहर भी एक किसान था। अच्छी सिंचाई न होने के कारण हर साल उसकी फसल बढ़िया नहीं हो पाती थी। वह मेहनती और आशावादी था। वह सोचता कि काश ! मेरे खेतों के पास भी कोई कुंआ होता तो मेरी भी फसल अच्छी होती।

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वह अपने खेतों के आस पास प्रतिदिन कुआं खोजता कि शायद कोई पुराना कुआं मिट्टी से दब गया हो। अगर ऐसा कोई कुआं मिल जाये तो मेरी तो लाटरी लग जाये।

भगवान की कृपा देखिए, ढूंढते ढूंढते एक दिन उसे अपने खेत के पड़ोस में एक दबा हुआ कुआं मिल ही गया। बड़े उत्साह से उसने कुएं को साफ किया और पानी निकालकर सिंचाई करने की तैयारी करने लगा।

तभी पड़ोस के गांव का मोहन उसके पास आया और बोला, “यह कुआं मेरा है। मेरे दादाजी ने इसे खुदवाया था। बाद में यह मिट्टी में दब गया। इस पर मेरा हक है। तुम इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते।”

मनोहर बहुत निराश हुआ। लेकिन वह मोहन का कुछ बिगड़ नहीं सकता था। क्योंकी मोहन धूर्त और दबंग था। मनोहर ने उससे कहा, “यह कुआं तुम्हारे किसी काम का नहीं है। तुम्हारे खेत भी यहां नहीं हैं। यह कुआं मुझे दे दो।”

मोहन बोला, “कुएं की कीमत दे दो और कुआं ले लो।” उसने कुएं की कीमत सौ स्वर्ण मुद्राएं बतायीं। ये रकम मनोहर के लिए बहुत अधिक थी। फिर भी उसने कहा, “मुझे कल तक का समय दो। मैं तुम्हें सौ स्वर्ण मुद्राएँ लाकर दूंगा।”

मोहन ने कहा कि ठीक है। मनोहर सोच विचार करता घर पहुंचा। मित्रों, रिश्तेदारों से मांगकर और खुद की बचत की सारी जमापूंजी मिलाकर उसने जैसे तैसे सौ स्वर्ण मुद्राएं इकट्ठी कीं।

दूसरे दिन उसने वे मुद्राएँ ले जाकर मोहन को दे दीं। मोहन धूर्तता से हंसकर बोला, “आज से यह कुआं तुम्हारा हुआ।” मनोहर बहुत खुश हुआ। वह सुखी जीवन के सपने देखने लगा।

कुछ दिन बाद वह फसलों की सिंचाई करने खेत पहुंचा। जैसे ही वह कुएं के पास पानी निकालने गया वैसे ही मोहन फिर वहां आ पहुंचा। उसने कहा, “खबरदार ! जो कुएं के पानी को हाथ भी लगाया।”

मनोहर हैरानी से बोला, “यह कुआं तो तुमने मुझे बेंच दिया था। तो फिर अब क्यों रोकते हो ? क्या तुम्हारे मन में बेईमानी आ गयी है ?

मोहन ने जवाब दिया, “ऐसा नहीं है। मैंने कुआं बेचा है,इस बात से मैं इनकार नहीं कर रहा हूँ। लेकिन मैंने केवल कुआं बेचा है उसका पानी नहीं बेचा। पानी के लिए तुमको और स्वर्ण मुद्राएं देनी पड़ेंगी।”

इस बात पर दोनों में झगड़ा होने लगा। मोहन तो था ही झगड़ालू, उससे निपटने के लिए मनोहर को राजदरबार की शरण लेनी पड़ी। अपनी समस्या लेकर वह बादशाह अकबर के दरबार में पहुंचा।

अकबर ने पूरा मामला सुना तो उनका सिर चकरा गया। उन्हें मोहन की धूर्तता साफ समझ आ रही थी। किन्तु कोई तर्कपूर्ण हल समझ नहीं आ रहा था। हारकर उन्होंने बीरबल से मामला सुलझाने को कहा।

बीरबल ने मोहन से कहा, “तुम्हारी बात सही और तर्कपूर्ण है। लेकिन जब तुमने कुआं बेच दिया है तो तुम्हारा पानी मनोहर के कुएं में क्या कर रहा है ? कुआं बेचने के बाद जितने दिनतक पानी कुएं में रहा है। उतने दिन का प्रतिदिन की दस स्वर्णमुद्रा के हिसाब से तुम्हें मनोहर को किराया देना होगा।”

यह सुनकर मोहन की सारी चालाकी हवा हो गयी। उसने अपनी गलती मान ली।

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